<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486</id><updated>2012-01-15T14:46:05.719+05:30</updated><category term='वेडिंग-रिंग्स डे (३ फरवरी)'/><category term='विश्व संगीत दिवस (21 जून )'/><category term='उत्सवी परम्परा'/><category term='मदर्स डे (मई का दूसरा रविवार)'/><category term='स्वतंत्रता दिवस'/><category term='तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई )'/><category term='विश्व शरणार्थी दिवस (20 जून)'/><category term='जीवन वृत्त: आकांक्षा यादव'/><category term='अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च)'/><category term='गोवर्धन पूजा'/><category term='विश्व नृत्य दिवस(29 अप्रैल)'/><category term='ओनम'/><category term='फादर्स-डे (जून का तीसरा 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(22 अप्रैल)'/><category term='गुरु पूर्णिमा'/><category term='फ्रेंडशिप-डे (अगस्त का प्रथम रविवार)'/><category term='जीवन वृत्त: कृष्ण कुमार यादव'/><category term='कजरी'/><category term='ओणम'/><category term='डाटर्स -डे ( सितम्बर का चौथा रविवार)'/><title type='text'>उत्सव के रंग</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' 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src="http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TRQx9sBiNDI/AAAAAAAAA0k/fNWd9coqBMg/s400/christmas1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:+0;"&gt;क्रिसमस&lt;/span&gt; शब्‍द का जन्‍म क्राईस्‍टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्‍टस् मास’ शब्‍द से हुआ है। ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। यह प्रभु के पुत्र जीसस क्राइस्‍ट के जन्‍म दिन को याद करने के लिए पूरे विश्‍व में 25 दिसम्‍बर को मनाया जाता है यह ईसाइयों के सबसे महत्‍वपूर्ण त्‍यौहारों में से एक है। इस दिन भारत व अधिकांश अन्‍य देशों में सार्वजनिक अवकाश रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्राइस्‍ट के जन्‍म के संबंध में नए टेस्‍टामेंट के अनुसार व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्‍म देगी तथा बच्‍चे का नाम जीसस रखा जाएगा। व‍ह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्‍य की कोई सीमाएं नहीं होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवदूत गैब्रियल, जोसफ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्‍चे को जन्‍म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्‍याग न करे। जिस रात को जीसस का जन्‍म हुआ, उस समय लागू नियमों के अनुसार अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्‍ते में थे। उन्‍होंने एक अस्‍तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्‍म दिया तथा उसे एक नांद में लिटा दिया। इस प्रकार प्रभु के पुत्र जीसस का जन्‍म हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस समारोह अर्धरात्रि के समय के बाद, जिसे समारोह का एक अनिवार्य भाग माना जाता है, शुरू होते हैं। इसके बाद मनोरंजन किया जाता है। सुंदर रंगीन वस्‍त्र पहने बच्‍चे ड्रम्‍स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्‍ट्रा के साथ चमकीली छडियां लिए हुए सामूहिक नृत्‍य करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेंट बेनेडिक्‍ट उर्फ सान्‍ता क्‍लाज़, लाल व सफेद ड्रेस पहने हुए, एक वृद्ध मोटा पौराणिक चरित्र है, जो रेन्डियर पर सवार होता है, तथा समारोहों में, विशेष कर बच्‍चों के लिए एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह बच्‍चों को प्‍यार करता है तथा उनके लिए चाकलेट, उपहार व अन्‍य वांछित वस्‍तुएं लाता है, जिन्‍हें वह संभवत: रात के समय उनके जुराबों में रख देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं। वे प्‍यार व भाई चारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस ट्री अपने वैभव के लिए पूरे विश्‍व में लोकप्रिय है। लोग अपने घरों को पेड़ों से सजाते हैं तथा हर कोने में मिसलटों को टांगते हैं। चर्च मास के बाद, लोग मित्रवत् रूप से एक दूसरे के घर जाते हैं तथा दावत करते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं व उपहार देते हैं। वे शांति व भाईचारे का संदेश फैलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में विशेषकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत जोश व उत्‍साह के साथ मनाया जाता है। इनमें से अधिकांश चर्च भारत में ब्रि‍टिश व पुर्तगाली शासन के दौरान स्‍‍थापित किए गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ कैथेड्रिल, और आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च आफ सेंट फ्रांसिस आफ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जांस चर्च इन विल्‍डरनेस और हिमाचल में क्राइस्‍ट चर्च, सांता क्‍लाज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्‍ट चर्च तथा माउन्‍ट मेरी चर्च महाराष्‍ट्र में, तमिलनाडु में क्राइस्‍ट द किंग चर्च व वेलान्‍कन्‍नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च व कानपुर मेमोरियल चर्च उत्‍तर प्रदेश में शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;क्रिसमस पर्व पर आप सभी को बधाई और शुभकामनाएं !!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bharat.gov.in/knowindia/festivlas_christmas.php"&gt;साभार :bharat.gov.in&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-501712049322272926?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/501712049322272926/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=501712049322272926' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/501712049322272926'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/501712049322272926'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='प्‍यार व भाईचारे का संदेश देता क्रिसमस पर्व'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TRQx9sBiNDI/AAAAAAAAA0k/fNWd9coqBMg/s72-c/christmas1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-1760969066054394193</id><published>2011-08-31T13:10:00.000+05:30</published><updated>2011-08-31T13:11:02.535+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईद'/><title type='text'>मुहब्बत व प्यार एवं कौमी मकजहती और खुशी का इजहार है ईद</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/SrepJoCf4vI/AAAAAAAAAPU/NLvHxggsyeQ/s1600-h/eid_21_15%5B1%5D.gif"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 188px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5383957862376530674" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/SrepJoCf4vI/AAAAAAAAAPU/NLvHxggsyeQ/s320/eid_21_15%5B1%5D.gif" /&gt;&lt;/a&gt;यूं तो रमजान का पूरा महीना रहमत, मगफिरत और नर्क से छुटकारे का है, लेकिन जो लोग शराबी हैं, माता-पिता का कहना नहीं मानते हैं, आपस में लड़ते हैं और दिल में कीना रखते हैं, उनकी इस महीने में भी मगफिरत व बख्शिस नहीं होती है। हर्ष के मैदान में रोजेदारों को पुकार कर कहा जाता है कि उठो और जन्नत के आठ दरवाजों में से एक खास दरवाजे [रैय्यान] से जन्नत में दाखिल हो जाओ। यह वह दरवाजा है जिसमें मगफिरत व बख्शिस नहीं दिए जाने वाले प्रवेश नहीं कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमजान वो महीना है जिसमें इंसानों की सारी मनुष्यता के लिए हिदायत बनाकर रौशनी हासिल करने के लिए कुरान नाजील फरमाया गया है। कुरान वो किताब है जिसके द्वारा इंसान सच और झूठ में, न्याय और अन्याय में, हक व बातिल में, कुर्फ में इमान में, इंसानियत और शैतानियत में फर्क करना सीखते हैं। रमजान के अंदर अल्लाह की तरफ से तमाम मुसलमानों के ऊपर रोजा फर्ज किया गया है। कुराण कहता है-ऐ इमान वालों, तुम पर जिस तरह रोजा फर्ज किया गया है ठीक उसी तरह उन्मतों पर भी रोजा फरमाया गया है ताकि तुम परहेजगार बन सको। रमजान का सबसे अहम अमल रोजा है। सूर्योदय के पूर्व से सूर्यास्त होने तक अपने बनाने वाले अल्लाह की एक इच्छा के अनुसार जायज खाने-पीने से और दिल की ख्वाइश से बच-बचाकर इंसान यह अभ्यास करता है कि वे पूरी जिंदगी में अपने अल्लाह के कहने के मुताबिक ही चले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमजान में रोजे के साथ-साथ रात में मुसलमान रोजाना तराबीह की बीस रकत नमाज में पूरा कुरान सुनते हैं। ये दुनिया भर की हर मज्जिद में अमल सुन्नत जानकर अदा की जाती है। इसकी फजीलत हदीस में आई है कि जो ईमान व ऐहतसाब के साथ ये नमाज तरबीह की अदा करेगा उसके पिछले तमाम गुनाहों को माफ कर दिया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमतौर पर आम मुसलमान ईद की पूर्व रात को चांद की रात के नाम से जानते हैं लेकिन कुरान में इस रात की बड़ी अहमियत होती है। हदीस के अनुसार इसका अर्थ है कि फरिश्ते आसमान पर इस रात को बातें करते हैं कि लैलतुल जाइजा [इनाम की रात] यानी पूरे रमजान जो अल्लाह के बंदों ने दिनों में रोजा रखकर और रातों में तराबीह पढ़कर अपने अल्लाह का हुकूम पूरा किया है, आज की रात उन्हें इनाम और बदले में अल्लाहताला उनकी बख्शिस व मगफिरत फरमाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ईद अरबी शब्द है जिसका अर्थ है कि बार-बार लौटकर आने वाली खुशी। ईद में दो रकत नमाज वाजिब शुक्राने के तौर पर तमाम मुसलमान अदा करते हैं। वैसे मुसलमान से अल्लाहताला खुश हो जाते हैं और रमजान के दौरान अच्छी तरह नमाज अदा करने वाले रोजदार को अल्लाहताला से रजा व खुशी हासिल हो जाती है। इसी शुक्राने में ईद की नमाज अदा की जाती है। ईद वाले दिन सदक-ए-फितर हर साहिबे हैसियत मुसलमानों पर वाजिब है। अपने तमाम घर वालों की तरफ से पौने दो किलो गेहूं या उसकी कीमत के बराबर रकम गरीब, मिस्कीन, नादार में तकसीत कर दें ताकि हर मुसलमान खुशी और मुसर्रत के साथ ईद की खुशियों में अपना हिस्सा भी हासिल कर सकें। ईद के दिन आसमान में फरिश्ते आपस में बातें करते है कि अल्लाह ताला ने सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत के साथ क्या मामला किया? उन्हें जबाव मिलता है, मेहनत करने वाले को उनकी पूरी-पूरी मजदूरी दे दी जाती है जो अल्लाह की रजा व खुशनुदी की शक्ल में उस दिन लोगों को अता की जाती है। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे महीने के रोजे के बाद अल्लाह का शुक्र अदा करने और अपनी अदा अजरत अल्लाहताला से लेने के लिए ईद की नमाज अदा की जाती है क्योंकि अल्लाह ईद के दिन सारे रोजदारों की मगफिरत फरमाकर निजात का परवाना अताए फरमाता है। ईद की नमाज हमारे रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सुन्नत है और हमसब पर वाजिब है। इस दिन एक दूसरे से मुहब्बत व प्यार एवं कौमी मकजहती और खुशी का इजहार किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;[प्रस्तुति-ब्रजेश नंदन माधुर्य]&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-1760969066054394193?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/1760969066054394193/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=1760969066054394193' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1760969066054394193'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1760969066054394193'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/08/blog-post_31.html' title='मुहब्बत व प्यार एवं कौमी मकजहती और खुशी का इजहार है ईद'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/SrepJoCf4vI/AAAAAAAAAPU/NLvHxggsyeQ/s72-c/eid_21_15%5B1%5D.gif' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-6275578193735690104</id><published>2011-08-22T07:00:00.000+05:30</published><updated>2011-08-22T07:00:02.587+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण-जन्माष्टमी'/><title type='text'>श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बधाइयाँ</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THzLy_sOgeI/AAAAAAAAAp4/lYB5qnJ2ZSw/s1600/89427-krishna.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5511504120945476066" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 324px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THzLy_sOgeI/AAAAAAAAAp4/lYB5qnJ2ZSw/s400/89427-krishna.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;श्री कृष्णजन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आज के दिन मथुरापहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जाता है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकृष्णजन्माष्टमीका व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना गया है। इस दिन उपवास रखें तथा अन्न का सेवन न करें। समाज के सभी वर्ग भगवान श्रीकृष्ण के प्रादुर्भाव-महोत्सव को अपनी साम‌र्थ्य के अनुसार उत्साहपूर्वक मनाएं। गौतमीतंत्रमें यह निर्देश है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपवास: प्रकर्तव्योन भोक्तव्यंकदाचन।&lt;br /&gt;कृष्णजन्मदिनेयस्तुभुड्क्तेसतुनराधम:।&lt;br /&gt;निवसेन्नरकेघोरेयावदाभूतसम्प्लवम्॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमीर-गरीब सभी लोग यथाशक्ति-यथासंभव उपचारों से योगेश्वर कृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। जब तक उत्सव सम्पन्न न हो जाए तब तक भोजन कदापि न करें। जो वैष्णव कृष्णाष्टमी के दिन भोजन करता है, वह निश्चय ही नराधम है। उसे प्रलय होने तक घोर नरक में रहना पडता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धार्मिक गृहस्थोंके घर के पूजागृह तथा मंदिरों में श्रीकृष्ण-लीला की झांकियां सजाई जाती हैं। भगवान के श्रीविग्रहका शृंगार करके उसे झूला झुलाया जाता है। श्रद्धालु स्त्री-पुरुष मध्यरात्रि तक पूर्ण उपवास रखते हैं। अर्धरात्रिके समय शंख तथा घंटों के निनाद से श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा शालिग्राम का दूध, दही, शहद, यमुनाजल आदि से अभिषेक होता है। तदोपरांत श्रीविग्रहका षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। कुछ लोग रात के बारह बजे गर्भ से जन्म लेने के प्रतीक स्वरूप खीरा चीर कर बालगोपाल की आविर्भाव-लीला करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्मग्रंथों में जन्माष्टमी की रात्रि में जागरण का विधान भी बताया गया है। कृष्णाष्टमी की रात में भगवान के नाम का संकीर्तन या उनके मंत्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ॐनमोभगवतेवासुदेवायका जाप अथवा श्रीकृष्णावतारकी कथा का श्रवण करें। श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए रात भर जगने से उनका सामीप्य तथा अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। जन्मोत्सव के पश्चात घी की बत्ती, कपूर आदि से आरती करें तथा भगवान को भोग में निवेदित खाद्य पदार्थो को प्रसाद के रूप में वितरित करके अंत में स्वयं भी उसको ग्रहण करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जन्माष्टमी का व्रत करने वाले वैष्णव प्रात:काल नित्यकर्मो से निवृत्त हो जाने के बाद इस प्रकार संकल्प करें-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ॐविष्णुíवष्णुíवष्णु:अद्य शर्वरीनामसंवत्सरेसूर्येदक्षिणायनेवर्षतरैभाद्रपदमासेकृष्णपक्षेश्रीकृष्णजन्माष्टम्यांतिथौभौमवासरेअमुकनामाहं(अमुक की जगह अपना नाम बोलें) मम चतुर्वर्गसिद्धिद्वारा श्रीकृष्णदेवप्रीतयेजन्माष्टमीव्रताङ्गत्वेनश्रीकृष्णदेवस्ययथामिलितोपचारै:पूजनंकरिष्ये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो जन्माष्टमी के व्रत में पूरे दिन उपवास रखने का नियम है, परंतु इसमें असमर्थ फलाहार कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भविष्यपुराणके जन्माष्टमीव्रत-माहात्म्यमें यह कहा गया है कि जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सवकिया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराजके अनुष्ठान से सभी को परम श्रेय की प्राप्ति होती है। व्रतकत्र्ताभगवत्कृपाका भागी बनकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अन्त में वैकुंठ जाता है। कृष्णाष्टमी का व्रत करने वाले के सब क्लेश दूर हो जाते हैं। दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है। गृहस्थोंको पूर्वोक्त द्वादशाक्षरमंत्र से दूसरे दिन प्रात:हवन करके व्रत का पारण करना चाहिए। जिन परिवारों में कलह-क्लेश के कारण अशांति का वातावरण हो, वहां घर के लोग जन्माष्टमी का व्रत करने के साथ इस मंत्र का अधिकाधिक जप करें-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्णायवासुदेवायहरयेपरमात्मने।&lt;br /&gt;प्रणतक्लेशनाशायगोविन्दायनमोनम:॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर्युक्त मंत्र का नित्य जाप करते हुए सच्चिदानंदघनश्रीकृष्ण की आराधना करें। इससे परिवार में खुशियां वापस लौट आएंगी। घर में विवाद और विघटन दूर होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्तिहटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनिबजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A5%80"&gt;साभार : विकिपीडिया &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;!! कृष्ण जन्माष्टमी की आप सभी को बधाइयाँ !!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-6275578193735690104?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/6275578193735690104/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=6275578193735690104' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6275578193735690104'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6275578193735690104'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बधाइयाँ'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THzLy_sOgeI/AAAAAAAAAp4/lYB5qnJ2ZSw/s72-c/89427-krishna.gif' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-1532435480524448022</id><published>2011-07-18T13:22:00.000+05:30</published><updated>2011-07-18T13:23:41.405+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रावण मास'/><title type='text'>सावन की बेला आ गई...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE6OS-XNeNI/AAAAAAAAAoM/1BMbK756TnU/s1600/sapera-dance[1].jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; FLOAT: left; HEIGHT: 316px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5498488651695093970" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE6OS-XNeNI/AAAAAAAAAoM/1BMbK756TnU/s400/sapera-dance%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;सावन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; मास की अपनी महत्ता है। सावन मास को श्रावण भी कहा जाता है। यह महीना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान भक्ति, आराधना तथा प्रकृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। श्रावण मास त्रिदेव और पंच देवों में प्रधान भगवान शिव की भक्ति को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मास में विधिपूर्वक शिव उपासना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यता है कि देव-दानव द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकले हलाहल यानि जहर का असर देव-दानव सहित पूरा जगत सहन नहीं कर पाया। तब सभी ने भगवान शंकर से प्रार्थना की। भगवान शंकर ने पूरे जगत की रक्षा और कल्याण के लिए उस जहर को पीना स्वीकार किया। विष पीकर शंकर नीलकंठ कहलाए। मान्यता है कि भगवान शंकर ने विष पान से हुई दाह की शांति के लिए समुद्र मंथन से ही निकले चंद्रमा को अपने सिर पर धारण किया। यह भी धार्मिक मान्यता है कि इस विष के प्रभाव को शांत करने के लिए भगवान शंकर ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया। इसी धारणा को आगे बढ़ाते हुए भगवान शंकराचार्य ने ज्योर्तिलिंग रामेश्वरम पर गंगा जल चढ़ाकर जगत को शिव के जलाभिषेक का महत्व बताया।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान श्रावण मास में ही किया था। धार्मिक दृष्टि से यही कारण है कि इस मास में &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE6LA4-O_dI/AAAAAAAAAoE/et2yw5VyFG8/s1600/shiva-aum[1].jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 187px; FLOAT: left; HEIGHT: 194px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5498485042475630034" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE6LA4-O_dI/AAAAAAAAAoE/et2yw5VyFG8/s400/shiva-aum%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;शिव आराधना का विशेष महत्व है। यह काल शिव भक्ति का पुण्य काल माना जाता है। शिव भक्तों द्वारा पूरी श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ भगवान शिव की पूजा-अर्चना, अभिषेक, जलाभिषेक, बिल्वपत्र सहित अनेक प्रकार से की जाती है। इस काल में शिव की उपासना भौतिक सुखों को देने वाली होती है। व्यावहारिक रुप से देखें तो भगवान शंकर द्वारा विष पीकर कंठ में रखना और उससे हुई दाह के शमन के लिए गंगा और चंद्रमा को अपनी जटाओं और सिर पर धारण करना इस बात का प्रतीक है कि मानव को अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। खास तौर पर कटु वचन से बचना चाहिए, जो कंठ से ही बाहर आते हैं और व्यावहारिक जीवन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। किंतु कटु वचन पर संयम तभी हो सकता है, जब व्यक्ति मन को काबू में रखने के साथ ही बुद्धि और ज्ञान का सदुपयोग करे। शंकर की जटाओं में विराजित गंगा ज्ञान की सूचक है और चंद्रमा मन और विवेक का। गंगा और चंद्रमा को भगवान शंकर ने उसी स्थान पर रखा है जहां मानव का भी विचार केन्द्र यानि मस्तिष्क होता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;सावन मास के दौरान ही कई प्रमुख त्योहार जैसे- हरियाली अमावस्या, नागपंचमी तथा रक्षा बंधन आदि भी आते हैं। सावन में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है इसलिए यह भी कहा जाता कि यह महीना प्रकृति को समझने व उसके निकट जाने का है। सावन की रिमझिम बारिश और प्राकृतिक वातावरण बरबस में मन में उल्लास व उमंग भर देती है। सावन में ही महिलाएं कजरी-गायन कर खूब रंग बिखेरती हैं. सावन का महीना पूरी तरह से शिव तथा प्रकृति को समर्पित है. तो आप भी हर-हर महादेव के जयकारे के साथ गाइए- सावन आया झूम के !!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-1532435480524448022?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/1532435480524448022/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=1532435480524448022' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1532435480524448022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1532435480524448022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='सावन की बेला आ गई...'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE6OS-XNeNI/AAAAAAAAAoM/1BMbK756TnU/s72-c/sapera-dance%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-4653154082415078005</id><published>2011-06-26T16:00:00.000+05:30</published><updated>2011-06-26T16:00:00.487+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस (26 जून)'/><title type='text'>नशे को बोलें..ना-ना-ना</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TCX-TBslDAI/AAAAAAAAAjM/SEwCg9tPMc0/s1600/300px-Smoking_Crack%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; FLOAT: left; HEIGHT: 225px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487071323847199746" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TCX-TBslDAI/AAAAAAAAAjM/SEwCg9tPMc0/s320/300px-Smoking_Crack%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;मादक पदार्थों व नशीली वस्तुओं के निवारण हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसंबर, 1987 को प्रस्ताव संख्या 42/112 पारित कर हर वर्ष 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस मानाने का निर्णय लिया. यह एक तरफ लोगों में चेतना फैलाता है, वहीँ नशे के लती लोगों के उपचार की दिशा में भी सोचता है.इस वर्ष का विषय है- ''स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें." आजकी पोस्ट इसी विषय पर-&lt;br /&gt;**********************************************************************&lt;br /&gt;मादक पदार्थों के नशे की लत आज के युवाओं में तेजी से फ़ैल रही है. कई बार फैशन की खातिर दोस्तों के उकसावे पर लिए गए ये मादक पदार्थ अक्सर जानलेवा होते हैं. कुछ बच्चे तो फेविकोल, तरल इरेज़र, पेट्रोल कि गंध और स्वाद से आकर्षित होते हैं और कई बार कम उम्र के बच्चे आयोडेक्स, वोलिनी जैसी दवाओं को सूंघकर इसका आनंद उठाते हैं. कुछ मामलों में इन्हें ब्रेड पर लगाकर खाने के भी उदहारण देखे गए हैं. मजाक-मजाक और जिज्ञासावश किये गए ये प्रयोग कब कोरेक्स, कोदेन, ऐल्प्राजोलम, अल्प्राक्स, कैनेबिस जैसे दवाओं को भी घेरे में ले लेते हैं, पता ही नहीं चलता. फिर स्कूल-कालेजों य पास पड़ोस में गलत संगति के दोस्तों के साथ ही गुटखा, सिगरेट, शराब, गांजा, भांग, अफीम और धूम्रपान सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं के सेवन की ओर अपने आप कदम बढ़ जाते हैं. पहले उन्हें मादक पदार्थ फ्री में उपलब्ध कराकर इसका लती बनाया जाता है और फिर लती बनने पर वे इसके लिए चोरी से लेकर अपराध तक करने को तैयार हो जाते हैं.नशे के लिए उपयोग में लाई जानी वाली सुइयाँ HIV का कारण भी बनती हैं, जो अंतत: एड्स का रूप धारण कर लेती हैं. कई बार तो बच्चे घर के ही सदस्यों से नशे की आदत सीखते हैं. उन्हें लगता है कि जो बड़े कर रहे हैं, वह ठीक है और फिर वे भी घर में ही चोरी आरंभ कर देते हैं. चिकित्सकीय आधार पर देखें तो अफीम, हेरोइन, चरस, कोकीन, तथा स्मैक जैसे मादक पदार्थों से व्यक्ति वास्तव में अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है एवं पागल तथा सुप्तावस्था में हो जाता है। ये ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ है जिनकी लत के प्रभाव में व्यक्ति अपराध तक कर बैठता है। मामला सिर्फ स्वास्थ्य से नहीं अपितु अपराध से भी जुड़ा हुआ है. कहा भी गया है कि जीवन अनमोल है। नशे के सेवन से यह अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में भारत हेरोइन का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है और ऐसा लगता है कि वह खुद भी अफीम पोस्त का उत्पादन करता है. गौरतलब है कि अफीम से ही हेरोइन बनती है. अपने देश के कुछ भागों में धड़ल्ले से अफीम की खेती की जाती है और पारंपरिक तौर पर इसके बीज 'पोस्तो' से सब्जी भी बने जाती है. पर जैसे-जैसे इसका उपयोग एक मादक पदार्थ के रूप में आरंभ हुआ, यह खतरनाक रूप अख्तियार करता गया. वर्ष 2001 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में भारतीय पुरुषों में अफीम सेवन की उच्च दर 12 से 60 साल की उम्र तक के लोगों में 0.7 प्रतिशत प्रति माह देखी गई. इसी प्रकार 2001 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार ही 12 से 60 वर्ष की पुरुष आबादी में भांग का सेवन करने वालों की दर महीने के हिसाब से तीन प्रतिशत मादक पदार्थ और अपराध मामलों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय [यूएनओडीसी] की रिपोर्ट के ही अनुसार भारत में जिस अफीम को हेरोइन में तब्दील नहीं किया जाता उसका दो तिहाई हिस्सा पांच देशों में इस्तेमाल होता है। ईरान 42 प्रतिशत, अफगानिस्तान सात प्रतिशत, पाकिस्तान सात प्रतिशत, भारत छह प्रतिशत और रूस में इसका पांच प्रतिशत इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2008 में 17 मीट्रिक टन हेरोइन की खपत की और वर्तमान में उसकी अफीम की खपत अनुमानत: 65 से 70 मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। कुल वैश्विक उपभोग का छह प्रतिशत भारत में होने का मतलब कि भारत में 1500 से 2000 हेक्टेयर में अफीम की अवैध खेती होती है, जो वाकई चिंताजनक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नशे से मुक्ति के लिए समय-समय पर सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएं पहल करती रहती हैं. पर इसके लिए स्वयं व्यक्ति और परिवार जनों की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है. अभिभावकों को अक्सर सुझाव दिया जाता है कि वे अपने बच्चों पर नजर रखें और उनके नए मित्र दिखाई देने, क्षणिक उत्तेजना या चिडचिडापन होने, जेब खर्च बढने, देर रात्रि घर लौटने, थकावट, बेचैनी, अर्द्धनिद्राग्रस्त रहने, बोझिल पलकें, आँखों में चमक व चेहरे पर भावशून्यता, आँखों की लाली छिपाने के लिए बराबर धूप के चश्मे का प्रयोग करते रहने, उल्टियाँ होने, निरोधक शक्ति कम हो जाने के कारण अक्सर बीमार रहने, परिवार के सदस्यों से दूर-दूर रहने, भूख न लगने व वजन के निरंतर गिरने, नींद न आने, खांसी के दौरे पड़ने, अल्पकालीन स्मृति में ह्रास, त्वचा पर चकते पड़ जाने, उंगलियों के पोरों पर जले का निशान होने, बाँहों पर सुई के निशान दिखाई देने, ड्रग न मिलने पर आंखों-नाक से पानी बहने-शरीर में दर्द-खांसी-उल्टी व बेचैनी होने, व्यक्तिगत सफाई पर ध्यान न देने, बाल-कपड़े अस्त व्यस्त रहने, नाखून बढे रहने, शौचालय में देर तक रहने, घरेलू सामानों के एक-एक कर गायब होते जाने आदत के तौर पर झूठ बोलने, तर्क-वितर्क करने, रात में उठकर सिगरेट पीने, मिठाईयों के प्रति आकर्षण बढ जाने, शैक्षिक उपलब्धियों में लगातार गिरावट आते जाने, स्कूल कालेज में उपस्थिति कम होते जाने, प्रायः जल्दबाजी में घर से बाहर चले जाने एवं कपडों पर सिगरेट के जले छिद्र दिखाई देने जैसे लक्षणों के दिखने पर सतर्क हो जाएँ. यह बच्चों के मादक-पदार्थों का व्यसनी होने की निशानी है. यही नहीं यदि उनके व्यक्तिगत सामान में अचानक माचिस,मोमबत्ती,सिगरेट का तम्बाकू, 3 इंच लम्बी शीशे की ट्यूब,एल्मूनियम फॉयल, सिरिंज, हल्का भूरा सफेद पाउडर मिलता है तो निश्चित जान लें कि वह ड्रग्स का शिकार है और तत्काल इस सम्बन्ध में कदम उठाने की जरुरत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मादक पदार्थों और नशा के सम्बन्ध में जागरूकता के लिए तमाम दिवस, मसलन- 31 मई को अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध दिवस, 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस, गाँधी जयंती पर 2 से 8 अक्टूबर मद्यनिषेध सप्ताह और 18दिसम्बर को मद्य निषेध दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है. मादक पदार्थों का नशा सिर्फ स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि सामाजिक-आर्थिक-पारिवारिक- मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है. जरुरत इससे भागने की नहीं इसे समझने व इसके निवारण की है. मात्र दिवसों पर ही नहीं हर दिन इसके बारे में सोचने की जरुरत है अन्यथा देश की युवा पीढ़ी को यह दीमक की तरह खोखला कर देगा.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-4653154082415078005?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/4653154082415078005/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=4653154082415078005' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4653154082415078005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4653154082415078005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/06/blog-post_26.html' title='नशे को बोलें..ना-ना-ना'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TCX-TBslDAI/AAAAAAAAAjM/SEwCg9tPMc0/s72-c/300px-Smoking_Crack%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-7355621006926561135</id><published>2011-06-20T18:18:00.000+05:30</published><updated>2011-06-20T18:18:56.248+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व शरणार्थी दिवस (20 जून)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>शरणार्थियों के लिए कुछ करने का दिन : विश्व शरणार्थी दिवस</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;दुनिया के कई देश आज भी हिंसा की लपटों में जल रहे हैं. आंतरिक कलह और हिंसा का ऐसा मंजर है कि इन देशों के नागरिकों को दूसरे देशों में जाकर पनाह लेनी पड़ती है. बढ़ती आबादी और कम होते संसाधनों की वजह से कई गरीब देशों की जनता को पलायन करना पड़ रहा है. आज विश्व के कई देशों में पलायन का दौर बदस्तूर जारी है लेकिन अपना देश छोड़कर किसी और देश की पनाह लेना आसान काम नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी इंसान अपने घर में किसी दूसरे को पसंद नहीं करता तो भला एक देश किसी दूसरे देश के नागरिकों को अपने देश में कैसे रहने दे? अपनेपन की कमी और विदेश नीतियों की कमी की वजह से रिफ्यूजी(Refugee) लोगों को कई तरह के अत्याचारों का सामना करना पड़ता है. किसी दूसरे के घर में पनाह लेने की रिफ्यूजियों(Refugee) को भारी कीमत चुकानी पड़ती है. कभी कभी तो जानमाल,रेप और हत्या तक हो जाती है और अक्सर रिफ्यूजी(Refugee) लोगों को जासूस समझ जेलों में ठूंस दिया जाता है. म्यांमार, मलेशिया, सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान, युनान, ट्युनिशिया आदि की जनता ने हाल ही में भारी संख्या में अपने देश से पलायन किया है लेकिन जिन जगह इन्होंने पनाह ली वह भी इनके लिए मुसीबत की जगह ही बनें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारी मात्रा में पलायन और कम संसाधनों की वजह से कई बार आश्रय देने वाले देश अतिरिक्त बोझ लेने से बचने के लिए रिफ्यूजियों को पनाह देने से कतराते हैं और जब रिफ्यूजी नहीं मानते तो उन पर जो अत्याचार होते हैं वह सभी मानवाधिकारों(Human Rights) की धज्जियां उड़ा देते हैं. हाल ही में कांगो(Democratic Republic of the Congo) नामक देश से हुए पलायन में 500,000 लोगों ने दूसरी जगह जाकर शरण ली लेकिन वहां पर भी आर्मी और कुछ असामाजिक तत्वों ने ऐसा घिनौना खेल खेला कि इंसानियत शर्मसार हो गई. एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां हजारों की तादाद में महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्याओं की बात सामने आई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त उस घटना और दर्द का अंशमात्र है जो रिफ्यूजियों के साथ होता है. संयुक्त राष्ट्र(United Nations) ने इस विषय की गंभीरता को समझते हुए हर वर्ष 20 जून को विश्व रिफ्यूजी दिवस(World Refugee Day) मनाने का निर्णय किया. 04 दिसम्बर 2000 को यह घोषणा की गई जिसे 20 जून, 2001 से लागू कर दिया गया. इस दिन को मनाने का मुख्य कारण लोगों में जागरुकता फैलानी है कि कोई भी इंसान “अमान्य” नहीं होता फिर चाहे वह किसी भी देश का हो. एकता और समंवय की भावना रखते हुए हमें सभी को मान्यता देनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र की संस्था युएनएचसीआर(United Nations High Commissioner for Refugees) रिफ्यूजी लोगों की सहायता करती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर विश्व ने जल्द ही इस तरफ अपना ध्यान आकर्षित नहीं किया तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे वैसे अभी भी हालात कोई खास अच्छे नहीं हैं. कागजी स्तर पर तो काफी काम हुआ है अब जरुरत है कुछ जमीनी स्तर पर काम करने की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://days.jagranjunction.com/2011/06/20/world-refugee-day/"&gt;साभार : जागरण junction&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-7355621006926561135?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/7355621006926561135/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=7355621006926561135' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7355621006926561135'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7355621006926561135'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='शरणार्थियों के लिए कुछ करने का दिन : विश्व शरणार्थी दिवस'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-3675162091582825033</id><published>2011-05-31T08:00:00.001+05:30</published><updated>2011-05-31T08:00:00.334+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई )'/><title type='text'>मानवीय सभ्यता को लीलता तम्बाकू (विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChOs7v7NWI/AAAAAAAAAlI/U01KvL3l8Cs/s1600/World%2520No%2520Tobacco%2520Day%5B1%5D%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 223px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487722679810864482" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChOs7v7NWI/AAAAAAAAAlI/U01KvL3l8Cs/s320/World%2520No%2520Tobacco%2520Day%5B1%5D%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;आज 31 मई को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस है।&lt;/strong&gt; मई माह की भी अपनी महिमा है. मजदूर दिवस से आरंभ होकर यह तम्बाकू निषेध दिवस पर ख़त्म हो जाता है. यह दिवस तो सरकारें हर साल मनाती हैं, यहाँ तक कि दुनिया के 170 राष्ट्रों ने व्यापक तम्बाकू नियंत्रण संधि पर हस्ताक्षर भी किये हैं पर वास्तव में इस सम्बन्ध में कोई ठोस पहल नहीं की जाती है. इसके पीछे राजस्व नुकसान से लेकर कार्पोरेट जगत के निहित तत्व तक शामिल हैं, जिनकी सरकारों में जबरदस्त घुसपैठ होती है. ऐसे में तम्बाकू के धुँए का यह जहर धीरे-धीरे सुरसा के मुँह की तरह पूरी दुनिया को निगलने पर आमदा है. गौरतलब है कि 450 ग्राम तम्बाकू में निकोटीन की मात्रा लगभग 22.8 ग्राम होती है। इसकी 6 ग्राम मात्रा से एक कुत्ता 3 मिनट में मर जाता है। तम्बाकू के प्रयोग से अनेक दंत रोग, मंदाग्नि रोग हो जाता है। आंखों की ज्योति कम हो सकती है तो दुष्प्रभाव रूप में व्यक्ति बहरा व अन्धा तक हो जाता है। तम्बाकू के निकोटीन से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, रक्त संचार मंद पड़ जाता है।फेफड़ों की टीबी तो इसका सीधा प्रभाव देखा जा सकता है. यही नहीं तम्बाकू के सेवन से व्यक्ति नपुंसक भी हो सकता है। कहना गलत न होगा कि तम्बाकू का नियमित सेवन धीरे-धीरे व्यक्ति को मृत्यु के करीब ला देता है और वह असमय ही काल-कवलित हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अकेले भारत में हर साल लगभद आठ लाख मौतें तम्बाकू से होने वाली बीमारियों के कारण होती हैं।आज बच्चे-बूढ़े-जवान से लेकर पुरुष-नारी तक सभी वर्गों में तम्बाकू की लत देखी जा सकती है. कभी फैशन में तो,कभी नशे के चस्के में और कई बार थकान मिटाने या गम भुलाने की आड़ में भी इसे लिया जा रहा है. घर में बड़ों द्वारा लिए जा रहा तम्बाकू कब छोटों के पास पहुँच जाता है, पता ही नहीं चलता. दुर्भाग्यवश भारत में धर्म की आड में भी तम्बाकू का स्वाद लेने वालों की कमी नहीं है. गौरतलब है कि आयुर्वेद के चरक तथा सुश्रुत जैसे हजारों वर्ष पूर्व रचे गए ग्रन्थों में धूम्रपान का विधान है। वैसे, वहाँ पर उसका वर्णन औषधि के रूप में हुआ है, जैसे कहा गया है कि आम के सूखे पत्ते को चिलम जैसी किसी उपकरण में रखकर धुआं खींचने से गले के रोगों में आराम होता है। दमा तथा श्वास संबंधी रोगों में वासा (अडूसा) के सूखे पत्तों को चिलम में रखकर पीना एक प्रभावशाली उपाय माना गया है। आज भी ऐसे लोग मिल जायेंगे जो तम्बाकू को दवा बताते हैं. पवित्र तीर्थस्थलों पर धूनी पर बैठकर सुलफा, गांजा अथवा तम्बाकू के दम लगाने वालों तथाकथित बाबाओं की तो पूरी फ़ौज ही भरी पड़ी है. सरकारी दफ्तरों में तम्बाकू या धूम्रपान का सेवन करते पकड़े गए तमाम लोगों ने इसे अपने पक्ष में उपयोग किया है. पर ऐसे लोग उस पक्ष को भूल जाते हैं, जहाँ स्कन्दपुराण में कहा गया है कि-"स्वधर्म का आचरण करके जो पुण्य प्राप्त किया जाता है, वह धूम्रपान से नष्ट हो जाता है। इस कारण समस्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि को इसका सेवन कदापि नहीं करना चाहिए।''&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इधर हाल के वर्षों में जिस तरह से इसने तेजी से महिलाओं को चंगुल में लेना आरंभ किया है, वह पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक बन चुका है. अधिकतर महिलाओं का यह नशा उनकी अगली पीढ़ी में भी जा रहा है क्योंकि मातृत्व की स्थिति में इसका बुरा असर बच्चों पर पड़ना तय है. अब तो महिलाओं के लिए बाकायदा अलग से तम्बाकू उत्पाद भी बनने लगे हैं. स्कूल जाते लड़के-लड़कियां कम उम्र में ही इनका लुत्फ़ उठाने लगे हैं. उस पर से विज्ञापनों की चकाचौंध भी उन्हें इसका स्वाद लेने की तरफ अग्रसर करती है. फिल्मों-धारावाहिकों में जिस धड़ल्ले से नायक-नायिकाएं तम्बाकू वाले सिगरेट या सिगार को स्टाइल में पीते नजर आते हैं, वह नवयुवकों-नवयुवतियों पर गहरा असर डालता है. ऐसे में यह पता होते हुए भी कि यह स्वस्थ्य के अनुकूल नहीं है, यह स्टेट्स सिम्बल या फैशन का प्रतीक बन जाता है. प्रथम विश्व युद्ध के बाद घाटे की भरपाई और बदलते मूल्यों के चक्कर में पहली बार व्यावसायिक कंपनियों ने तम्बाकू उत्पादों की बिक्री के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करना आरंभ किया. लारीवार्ड कंपनी ने पहल करते हुए पहली बार तम्बाकू उत्पादों के विज्ञापन हेतु सर्वप्रथम 1919 में महिलाओं के चित्रों का उपयोग किया। इसके अगले साल ही सिगरेट को नारी- स्वतंत्रता के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया। 1927 के दौर में तो बाकायदा मार्लबोरो ब्रांड में सिगरेट को फैशन व दुबलेपन से जोड़ कर पेश किया गया. इसी के साथ ही कई नामी-गिरामी कंपनियों ने तमाम अभिनेत्रियों को तम्बाकू उत्पादों के कैम्पेन से जोड़ना आरंभ किया। बाद के वर्षों में जैसे -जैसे नारी-स्वातंत्र्य के नारे बुलंद होते गए, स्लिम होने को फैशन-स्टेटमेंट माना जाने लगा, इन कंपनियों ने भी इसे भुनाना आरंभ कर दिया. फिलिप मौरिस कंपनी ने 60 के दशक में बाकायदा वर्जिनिया स्लिम्स नाम से मार्केटिंग अभियान आरंभ किया,जिसकी पंच लाइन थी -'यू हैव कम ए लांग वे बेबी.' इसके बाद तो लगभग हर कंपनी ही तम्बाकू उत्पादों के प्रचार के लिए नारी माडलों व फ़िल्मी नायिकाओं का इस्तेमाल कर रही है. ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पूरा पिछला वर्ष तम्बाकू निषेध दिवस पर महिलाओं पर फोकस किया जाना महत्वपूर्ण व प्रासंगिक भी है. गौरतलब है कि भारत की कुल जितनी आबादी है, लगभग उतने ही लोग दुनिया में धूम्रपान करने वाले भी हैं, अर्थात 1 अरब से ज्यादा. इस 1 अरब में धूम्रपान करने वाली करीब 20 फीसदी महिलाएं भी शामिल हैं. आज महिलाओं में धूम्रपान का यह शौक भारत में भी बखूबी देखने को मिलता है. यह अक्सर या तो हाई सोसाईटी में या समाज के निचले तबके में बखूबी देखने को मिलता है. आंकड़े गवाह हैं कि भारत में करीब 1.4 फीसदी महिलायें धूम्रपान और करीब 8.4 फीसदी महिलायें खाने योग्य तम्बाकू का सेवन करती है। ऐसे में तम्बाकू सेवन से उनमें तमाम रोग व विकार उत्पन्न होते हैं. इनमें श्वांस सम्बन्धी बीमारी, फेफड़े का कैंसर, दिल का दौरा, निमोनिया, माहवारी सम्बंधित समस्याएं एवं प्रजनन विकार जैसी बीमारियाँ शामिल हैं. यही नहीं तम्बाकू का नियमित सेवन करने वाली महिलाओं में अक्सर पूर्व-प्रसव भी देखा गया हाई तथा पैदा होने वाले बच्चे औसत वजन से लगभग 400-500 ग्राम कम के पैदा होते हैं. इसके साथ ही तम्बाकू सेवन करने वाली महिलाओं में गर्भपात की दर भी सामान्य महिलाओं की तुलना में 95 फीसदी ज्यादा होती है।वाकई आज जरुरत है कि इस ओर गंभीर पहल की जाय. इन्हीं सबके चलते विश्व स्वास्थ्य संगठन अब तम्बाकू-उत्पादों का भ्रामक बाजारीकरण, जिसमें परोक्ष-अपरोक्ष रूप में तम्बाकू कंपनियों द्वारा प्रायोजित किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम पर प्रतिबन्ध लगाना भी शामिल है, के बारे में भी सोच रहा है. जानकर आश्चर्य होगा कि तम्बाकू कंपनियाँ हर साल विज्ञापन पर करीब दस अरब रूपये खर्च करतीं हैं. पर बेहतर होगा कि सरकारों और संगठनों की बजाय इस सम्बन्ध में अपने घर और उससे पहले खुद से शुरुआत की जाय ताकि तम्बाकू की यह विषबेल समय से पहले ही सभ्यताओं को न लील ले. क्योंकि Active रूप में जहाँ यह खुद के लिए घातक है, वही Passive रूप में हमारे परिवेश, परिवार, समाज और अंतत: पूरी सभ्यता को लीलने के लिए तैयार बैठी है !!&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://kkyadav.blogspot.com/"&gt;&lt;strong&gt;कृष्ण कुमार यादव&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-3675162091582825033?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/3675162091582825033/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=3675162091582825033' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3675162091582825033'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3675162091582825033'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='मानवीय सभ्यता को लीलता तम्बाकू (विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष)'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChOs7v7NWI/AAAAAAAAAlI/U01KvL3l8Cs/s72-c/World%2520No%2520Tobacco%2520Day%5B1%5D%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-6276981698845182315</id><published>2011-04-01T07:46:00.001+05:30</published><updated>2011-05-11T13:00:20.543+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अप्रैल फूल (1 अप्रैल)'/><title type='text'>अप्रैल फूल बनना है क्या</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-MpIomsh8sPw/TZU0ptFRz6I/AAAAAAAAA7Y/kA7cjjnLZeA/s1600/April-Fool-s-Day-.png"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 332px; FLOAT: left; HEIGHT: 331px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5590432403531354018" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-MpIomsh8sPw/TZU0ptFRz6I/AAAAAAAAA7Y/kA7cjjnLZeA/s400/April-Fool-s-Day-.png" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color:#000099;"&gt;अप्रैल फूल दिवस पश्चिमी देशों में हर साल पहली अप्रैल को मनाया जाता है. विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार कभी-कभी ऑल फूल्स डे के रूप में जाना जाने वाला यह दिन, 1 अप्रैल एक आधिकारिक छुट्टी का दिन नहीं है लेकिन इसे व्यापक रूप से एक ऐसे दिन के रूप में जाना और मनाया जाता है जब एक दूसरे के साथ व्यावाहारिक मजाक और सामान्य तौर पर मूर्खतापूर्ण हरकतें की जाती हैं. इस दिन दोस्तों, परिजनों, शिक्षकों, पड़ोसियों, सहकर्मियों आदि के साथ अनेक प्रकार की शरारतपूर्ण हरकतें और अन्य व्यावहारिक मजाक किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य होता है बेवकूफ और अनाड़ी लोगों को शर्मिंदा करना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पारंपरिक तौर पर कुछ देशों जैसे न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में इस तरह के मजाक केवल दोपहर तक ही किये जाते हैं, और अगर कोई दोपहर के बाद किसी तरह की कोशिश करता है तो उसे "अप्रैल फूल" कहा जाता है. ऐसा इसीलिये किया जाता है क्योंकि ब्रिटेन के अखबार जो अप्रैल फूल पर मुख्य पृष्ठ निकालते हैं वे ऐसा सिर्फ पहले (सुबह के) एडिशन के लिए ही करते हैं. इसके अलावा फ्रांस, आयरलैंड, इटली, दक्षिण कोरिया, जापान रूस, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्राजील, कनाडा और अमेरिका में जोक्स का सिलसिला दिन भर चलता रहता है. 1 अप्रैल और मूर्खता के बीच सबसे पहला दर्ज किया गया संबंध चॉसर के कैंटरबरी टेल्स (1392) में पाया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोम, मध्य यूरोप और हिंदू समुदाय में 20 मार्च से लेकर 5 अप्रैल तक नया साल मनाया जाता है। इस दौरान बसंत ऋतु होती है। जूनियल कैलेंडर ने एक अप्रैल से नया साल माना जोकि सन् 1582 तक मनाया गया। इसके बाद पोप ग्रेगी 13वें ने ग्रेगियन कैलेंडर बनाया। इसके अनुसार एक जनवरी को नया साल घोषित किया गया। कई देशों ने सन 1660 में ग्रेगीयन कैलेंडर स्वीकार कर लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जर्मनी, दनिश और नार्वे में सन् 1700 और इंग्लैंड में 1759 में एक जनवरी को नए साल के रूप में स्वीकार किया गया। फ्रांस के लोगों को लगा की साल का पहला दिन बदलकर उन्हें मूर्ख बनाया गया है और पुराने कैलेंडर के नववर्ष को उन्होंने मूर्ख दिवस घोषित कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अप्रैल फूल दिवस की एक बानगी देखें कि जीमेल (gmail) के 1 अप्रैल को लांच होने को एक मज़ाक समझा गया था, क्योंकि गूगल पारंपरिक तौर पर हर 1 अप्रैल को अप्रैल फूल्स डे के होक्स जारी करती है, और घोषित किया गया 1 जीबी का ऑनलाइन स्टोरेज उस समय मौजूदा ऑनलाइन ईमेल सेवा के लिए बहुत ही ज्यादा था .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो पूरी दुनिया में ही अप्रैल-फूल का प्रचलन बढ़ चला है, सो भारत भी अछूता नहीं. हर कोई एक दिन पहले से ही तैयारी करने लगता है कि किसे-किसे मूर्ख बनाना है, और कैसे बनाना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िलहाल अप्रैल फूल दिवस का लुत्फ़ उठायें, पर किसी कि भावनाएं आहत करने से बचें. बकौल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. वीरेन्द्र यादव इस दिन हार्ट पेशेंट का खास ख्याल रखें। उन्होंने कहा कि कई बार गंभीर मजाक से भावनाओं के उतार-चढ़ाव के कारण कोरोनरी में अवरोध पैदा होता है। यदि कोरोनरी धमनियों में पहले से ही समस्या हो तो समस्या गंभीर हो जाती है। इस स्थिति में धमनियों के अंदर की चिकनी सतह खुरदरी हो जाती है। इससे वहां पर कोलेस्ट्रॉल सरीखा तत्व जमा होने लगता है। खून जमना शुरू हो जाता है। यह हृदय के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है।किसी का मजाक उड़ाने की बजाय मजाक-मजाक में नई सीख सिखाएं तो इस दिन का भरपूर आनंद लिया जा सकता है.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-6276981698845182315?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/6276981698845182315/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=6276981698845182315' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6276981698845182315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6276981698845182315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='अप्रैल फूल बनना है क्या'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-MpIomsh8sPw/TZU0ptFRz6I/AAAAAAAAA7Y/kA7cjjnLZeA/s72-c/April-Fool-s-Day-.png' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-1562142474221014071</id><published>2011-03-08T13:10:00.000+05:30</published><updated>2011-03-08T13:10:36.435+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के 101 साल</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-i2FCleu8D0w/TXXc8rfHQ_I/AAAAAAAAA5c/zhWBxIZ-Y9Y/s1600/women-s-day-greeting-cards.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5581610248219083762" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 243px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-i2FCleu8D0w/TXXc8rfHQ_I/AAAAAAAAA5c/zhWBxIZ-Y9Y/s400/women-s-day-greeting-cards.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरूआत 1900 के आरंभ में हुई थी। वर्ष 1908 में न्यूयार्क की एक कपड़ा मिल में काम करने वाली करीब 15 हजार महिलाओं ने काम के घंटे कम करने, बेहतर तनख्वाह और वोट का अधिकार देने के लिए प्रदर्शन किया था। इसी क्रम में 1909 में अमेरिका की ही सोशलिस्ट पार्टी ने पहली बार ''नेशनल वुमन-डे'' मनाया था। &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का फैसला किया गया और 1911 में पहली बार 19 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; इसे सशक्तिकरण का रूप देने हेतु ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैलियों में हिस्सा लिया. बाद में वर्ष 1913 में महिला दिवस की तारीख 8 मार्च कर दी गई। तब से हर 8 मार्च को विश्व भर में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है.इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के 101 साल पूरे हो गए. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आप सभी को शुभकामनायें !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-1562142474221014071?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/1562142474221014071/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=1562142474221014071' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1562142474221014071'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1562142474221014071'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/03/101.html' title='अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के 101 साल'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-i2FCleu8D0w/TXXc8rfHQ_I/AAAAAAAAA5c/zhWBxIZ-Y9Y/s72-c/women-s-day-greeting-cards.gif' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-2905637655552082919</id><published>2011-02-08T09:12:00.000+05:30</published><updated>2011-02-08T09:13:00.912+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वसंत पंचमी'/><title type='text'>ऋतुराज का आगमन : वसंत पंचमी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TVC7IsrZ8gI/AAAAAAAAA3U/TGR05ofORUY/s1600/5928B_vasant4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5571158497163866626" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TVC7IsrZ8gI/AAAAAAAAA3U/TGR05ofORUY/s400/5928B_vasant4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; वसंत पंचमी एक ओर जहां ऋतुराज के आगमन का दिन है, वहीं यह विद्या की देवी और वीणावादिनी सरस्वती की पूजा का भी दिन है। इस ऋतु में मन में उल्लास और मस्ती छा जाती है और उमंग भर देने वाले कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे शरद ऋतु की विदाई के साथ ही पेड़-पौधों और प्राणियों में नवजीवन का संचार होता है। प्रकृति नख से शिख तक सजी नजर आती है और तितलियां तथा भंवरे फूलों पर मंडराकर मस्ती का गुंजन गान करते दिखाई देते हैं। हर ओर मादकता का आलम रहता है। आयुर्वेद में वसंत को स्वास्थ्य के लिए हितकर माना गया है। हालांकि इस दौरान हवा में उड़ते पराग कणों से एलर्जी खासकर आंखों की एलर्जी से पीड़ित लोगों की समस्या बढ़ भी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वसंत पंचमी को त्योहार के रूप में मनाए जाने के पीछे कई तरह की मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसीलिए इस दिन विद्या तथा संगीत की देवी की पूजा की जाती है। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने का चलन है, क्योंकि वसंत में सरसों पर आने वाले पीले फूलों से समूची धरती पीली नजर आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वसंत पंचमी के पीछे एक मान्यता यह भी है कि इसी दिन भागीरथ की तपस्या के चलते गंगा का अवतरण हुआ था, जिससे समूची धरती खुशहाल हो गई। माघ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पंचमी पर गंगा स्नान का काफी महत्व है।&lt;br /&gt;पुराणों के अनुसार एक मान्यता यह भी है कि वसंत पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार सरस्वती की पूजा की थी और तब से वसंत पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा करने का विधान हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन काल में वसंत पंचमी का दिन मदनोत्सव और वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस दिन स्त्रियां अपने पति की पूजा कामदेव के रूप में करती थीं। वसंत पंचमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव हदय में प्रेम एवं आकर्षण का संचार किया था और तभी से यह दिन वसंतोत्सव तथा मदनोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। वसंत पंचमी इस बात का संकेत देती है कि धरती से अब शरद की विदाई हो चुकी है और ऐसी ऋतु आ चुकी है जो जीव जंतुओं तथा पेड़ पौधों में नवजीवन का संचार कर देगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वसंत में मादकता और कामुकता संबंधी कई तरह के शारीरिक परिवर्तन देखने को मिलते हैं जिसका आयुर्वेद में व्यापक वर्णन है। महर्षियों और मनीषियों ने कहा है कि वसंत पंचमी को पूरी श्रद्धा से सरस्वती की पूजा करनी चाहिए। बच्चों को इस दिन अक्षर ज्ञान कराना और बोलना सिखाना शुभ माना जाता है। वसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहा जाता है जो सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने का परिचायक है। इस दिन पतंग उड़ाने की भी परंपरा है जो मनुष्य के मन में भरे उल्लास को प्रकट करने का माध्यम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#666600;"&gt;साभार : हिंदुस्तान / चित्र साभार : वेबदुनिया&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-2905637655552082919?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/2905637655552082919/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=2905637655552082919' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2905637655552082919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2905637655552082919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='ऋतुराज का आगमन : वसंत पंचमी'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TVC7IsrZ8gI/AAAAAAAAA3U/TGR05ofORUY/s72-c/5928B_vasant4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-7925450830553576488</id><published>2010-12-25T08:00:00.001+05:30</published><updated>2011-12-25T08:28:09.223+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिसमस'/><title type='text'>क्रिसमस की कहानी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TRQx9sBiNDI/AAAAAAAAA0k/fNWd9coqBMg/s1600/christmas1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554119176314041394" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 125px; CURSOR: hand; HEIGHT: 188px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TRQx9sBiNDI/AAAAAAAAA0k/fNWd9coqBMg/s400/christmas1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span class=""&gt;क्रिसमस&lt;/span&gt; शब्‍द का जन्‍म क्राईस्‍टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्‍टस् मास’ शब्‍द से हुआ है। ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। यह प्रभु के पुत्र जीसस क्राइस्‍ट के जन्‍म दिन को याद करने के लिए पूरे विश्‍व में 25 दिसम्‍बर को मनाया जाता है यह ईसाइयों के सबसे महत्‍वपूर्ण त्‍यौहारों में से एक है। इस दिन भारत व अधिकांश अन्‍य देशों में सार्वजनिक अवकाश रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्राइस्‍ट के जन्‍म के संबंध में नए टेस्‍टामेंट के अनुसार व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्‍म देगी तथा बच्‍चे का नाम जीसस रखा जाएगा। व‍ह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्‍य की कोई सीमाएं नहीं होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवदूत गैब्रियल, जोसफ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्‍चे को जन्‍म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्‍याग न करे। जिस रात को जीसस का जन्‍म हुआ, उस समय लागू नियमों के अनुसार अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्‍ते में थे। उन्‍होंने एक अस्‍तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्‍म दिया तथा उसे एक नांद में लिटा दिया। इस प्रकार प्रभु के पुत्र जीसस का जन्‍म हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस समारोह अर्धरात्रि के समय के बाद, जिसे समारोह का एक अनिवार्य भाग माना जाता है, शुरू होते हैं। इसके बाद मनोरंजन किया जाता है। सुंदर रंगीन वस्‍त्र पहने बच्‍चे ड्रम्‍स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्‍ट्रा के साथ चमकीली छडियां लिए हुए सामूहिक नृत्‍य करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेंट बेनेडिक्‍ट उर्फ सान्‍ता क्‍लाज़, लाल व सफेद ड्रेस पहने हुए, एक वृद्ध मोटा पौराणिक चरित्र है, जो रेन्डियर पर सवार होता है, तथा समारोहों में, विशेष कर बच्‍चों के लिए एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह बच्‍चों को प्‍यार करता है तथा उनके लिए चाकलेट, उपहार व अन्‍य वांछित वस्‍तुएं लाता है, जिन्‍हें वह संभवत: रात के समय उनके जुराबों में रख देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं। वे प्‍यार व भाई चारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस ट्री अपने वैभव के लिए पूरे विश्‍व में लोकप्रिय है। लोग अपने घरों को पेड़ों से सजाते हैं तथा हर कोने में मिसलटों को टांगते हैं। चर्च मास के बाद, लोग मित्रवत् रूप से एक दूसरे के घर जाते हैं तथा दावत करते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं व उपहार देते हैं। वे शांति व भाईचारे का संदेश फैलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में विशेषकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत जोश व उत्‍साह के साथ मनाया जाता है। इनमें से अधिकांश चर्च भारत में ब्रि‍टिश व पुर्तगाली शासन के दौरान स्‍‍थापित किए गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ कैथेड्रिल, और आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च आफ सेंट फ्रांसिस आफ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जांस चर्च इन विल्‍डरनेस और हिमाचल में क्राइस्‍ट चर्च, सांता क्‍लाज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्‍ट चर्च तथा माउन्‍ट मेरी चर्च महाराष्‍ट्र में, तमिलनाडु में क्राइस्‍ट द किंग चर्च व वेलान्‍कन्‍नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च व कानपुर मेमोरियल चर्च उत्‍तर प्रदेश में शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bharat.gov.in/knowindia/festivlas_christmas.php"&gt;साभार :bharat.gov.in&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-7925450830553576488?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/7925450830553576488/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=7925450830553576488' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7925450830553576488'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7925450830553576488'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='क्रिसमस की कहानी'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TRQx9sBiNDI/AAAAAAAAA0k/fNWd9coqBMg/s72-c/christmas1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-807019447050727504</id><published>2010-11-15T11:30:00.000+05:30</published><updated>2010-11-15T11:30:06.693+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आई लव टू राइट डे (15 नवम्बर)'/><title type='text'>आई लव टू राइट डे</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/THTUypXR_II/AAAAAAAAAqk/O7kZH-Trco0/s1600/pen.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5509262210743008386" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 216px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/THTUypXR_II/AAAAAAAAAqk/O7kZH-Trco0/s320/pen.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लिखना हममें से अधिकतर की अभिरुचियों में शामिल है। कई मित्र अक्सर पूछते भी हैं कि इस अभिरुचि के क्या मायने हैं ?...इन्टरनेट संस्कृति ने कहीं न कहीं पढने और लिखने को प्रभावित किया है, पर पुस्तक में मुद्रित शब्दों को पढने का जो आनंद है, अन्यत्र कहीं नहीं. इसके सहारे न जाने कितनी दूर-दूर कि यात्रायें ख़त्म हो जाती हैं और कभी-कभी तो पूरी रात भी बिना पलक झपकाए किसी पुस्तक को पढ़कर ख़त्म करने का सुख ही कुछ और है.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;.....खैर आज इसकी चर्चा का विशेष कारण है. 15 नवम्बर को 'आई लव टू राइट डे' मनाया जाता है. वर्ष 2002 में यह सर्वप्रथम मनाया गया और इसकी परिकल्पना मूलत: डेलवारे के लेखक जॉन रिडले ने की थी. इस पहल को स्वीकारते हुए डेलवारे के गवर्नर रुथ एन. मिनर ने 15 नवम्बर को आधिकारिक रूप से 'आई लव टू राइट डे' मनाये जाने की घोषणा की, जिसे बाद में पेनसेलवेनिया और फ्लोरिडा ने भी स्वीकार लिया. इसके तहत स्कूलों, लाइब्रेरी, कम्युनिटी सेंटर्स, बुक स्टोर्स इत्यादि में तमाम तरह की लेखन गतिविधियों का आयोजन किया गया. वस्तुत: इसका उद्देश्य हर आयु-वर्ग के लोगों को विभिन्न विधाओं- निबंध, पत्र, कहानी इत्यादि लिखने के लिए प्रवृत्त करना है......तो चलिए कुछ लिखते हैं, रचते हैं और फिर गुनते हैं। लेखन को समर्पित इस दिवस की ढेरों शुभकामनायें !!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-807019447050727504?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/807019447050727504/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=807019447050727504' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/807019447050727504'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/807019447050727504'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/11/blog-post_15.html' title='आई लव टू राइट डे'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/THTUypXR_II/AAAAAAAAAqk/O7kZH-Trco0/s72-c/pen.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-7579838809823202916</id><published>2010-11-05T07:03:00.002+05:30</published><updated>2010-11-05T07:03:00.401+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीपावली'/><title type='text'>विभिन्न रूप हैं दीपावली के</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TL60OJsLr7I/AAAAAAAAAw0/PtbGEr-MtlY/s1600/diwali+7.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5530055547669950386" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 244px; CURSOR: hand; HEIGHT: 244px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TL60OJsLr7I/AAAAAAAAAw0/PtbGEr-MtlY/s400/diwali+7.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े माॅल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल आॅफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। त्यौहार सामाजिक सदाशयता के परिचायक हैं न कि हैसियत दर्शाने के। त्यौहार हमें जीवन के राग-द्वेष से ऊपर उठाकर एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीपावली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्यौहार है जिसका बेसब्री से इंतजार किया जाता है। दीपावली माने 'दीपकों की पंक्ति'. दीपावली पर्व के पीछे मान्यता है कि रावण- वध के बीस दिन पश्चात भगवान राम अनुज लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ चैदह वर्षों के वनवास पश्चात अयोध्या वापस लौटे थे। जिस दिन श्री राम अयोध्या लौटे, उस रात्रि कार्तिक मास की अमावस्या थी अर्थात आकाश में चाँद बिल्कुल नहीं दिखाई देता था। ऐसे माहौल में नगरवासियों ने भगवान राम के स्वागत मंे पूरी अयोध्या को दीपों के प्रकाश से जगमग करके मानो धरती पर ही सितारों को उतार दिया। तभी से दीपावली का त्यौहार मनाने की परम्परा चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज भी दीपावली के दिन भगवान राम, लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अपनी वनवास स्थली चित्रकूट मंे विचरण कर श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। यही कारण है कि दीपावली के दिन लाखों श्रद्धालु चित्रकूट मंे मंदाकिनी नदी में डुबकी लगाकर कामद्गिरि की परिक्रमा करते हैं और दीप दान करते हैं। दीपावली के संबंध में एक प्रसिद्ध मान्यतानुसार मूलतः यह यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते। दीपावली पर रंग- बिरंगी आतिशबाजी, लजीज पकवान एवं मनोरंजन के जो विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभ्यता के विकास के साथ यह त्यौहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मी जी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है। गणेश जी को दीपावली पूजा में मंचासीन करने में शैव-सम्प्रदाय का काफी योगदान है। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेश जी को प्रतिष्ठित किया। यदि तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन् ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अतः कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा। दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णु जी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया हैै। दीपावली से जुड़ी एक अन्य मान्यतानुसार राजा बालि ने देवताओं के साथ देवी लक्ष्मी को भी बन्दी बना लिया। देवी लक्ष्मी को मुक्त कराने भगवान विष्णु ने वामन का रूप धरा और देवी को मुक्त कराया। इस अवसर पर राजा बालि ने भगवान विष्णु से वरदान लिया था कि जो व्यक्ति धनतेरस, नरक-चतुर्दशी व अमावस्या को दीपक जलाएगा उस पर लक्ष्मी की कृपा होगी। तभी से इन तीनों पर्वांे पर दीपक जलाया जाता है और दीपावली के दिन ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक के देवता व विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन धन एवं ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी की दीपक जलाकर पूजा की जाती है और प्रतीकात्मक रूप में लोग सोने-चांदी व बर्तन खरीदते हैं। धनतेरस के अगले दिन अर्थात कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाने की परंपरा है। पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था। नरक चतुर्दशी पर घरों की धुलाई-सफाई करने के बाद दीपक जलाकर दरिद्रता की विदाई की जाती है। वस्तुतः इस दिन दस महाविद्या में से एक अलक्ष्मी (धूमावती) की जयंती होती है। अलक्ष्मी दरिद्रता की प्रतीक हैं, इसीलिए चतुर्दशी को उनकी विदाई कर अगले दिन अमावस्या को दस महाविद्या की देवी कमलासीन माँ लक्ष्मी (देवी कमला) की पूजा की जाती है। नरक चतुर्दशी को ‘छोटी दीपावली’ भी कहा जाता है। दीपावली के दिन लोग लईया, खील, गट्टा, लड्डू इत्यादि प्रसाद के लिए खरीदते हैं और शाम होते ही वंदनवार व रंगोली सजाकर लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं और फिर पूरे घर में दीप जलाकर माँ लक्ष्मी का आवाह्न करते हैं। व्यापारी वर्ग पारंपरिक रूप से दीपावली के दिन ही नई हिसाब-बही बनाता है और किसान अपने खेतों पर दीपक जलाकर अच्छी फसल होने की कामना करते हंै। इसके बाद खुशियों के पटाखों के बीच एक-दूसरे से मिलने और उपहार व मिठाईयों की सौगात देने का सिलसिला चलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीपावली का त्यौहार इस बात का प्रतीक है कि हम इन दीपों से निकलने वाली ज्योति से सिर्फ अपना घर ही रोशन न करें वरन् इस रोशनी में अपने हृदय को भी आलोकित करें और समाज को राह दिखाएं। दीपक सिर्फ दीपावली का ही प्रतीक नही वरन् भारतीय सभ्यता में इसके प्रकाश को इतना पवित्र माना गया है कि मांगलिक कार्यों से लेकर भगवान की आरती तक इसका प्रयोग अनिवार्य है। यहाँ तक कि परिवार में किसी की गंभीर अस्वस्थता अथवा मरणासन्न स्थिति होने पर दीपक बुझ जाने को अपशकुन भी माना जाता है। अगर हम इतिहास के गर्भ में झांककर देखें तो सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और मोहनज़ोदड़ो की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे व मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की श्रृंखला थी। इसमें कोई शक नहीं कि दीपकों का आविर्भाव सभ्यता के साथ ही हो चुका था, पर दीपावली का जन-जीवन में पर्व रूप में आरम्भ श्री राम के अयोध्या आगमन से ही हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के विभिन्न राज्यों में इस त्यौहार को विभिन्न रूपों मे मनाया जाता है। वनवास पश्चात श्री राम के अयोध्या आगमन को उनका दूसरा जन्म मान केरल में कुछ अदिवासी जातियां दीपावली को राम के जन्म-दिवस के रूप में मनाती हंै। गुजरात में नमक को साक्षात् लक्ष्मी का प्रतीक मान दीपावली के दिन नमक खरीदना व बेचना शुभ माना जाता है तो राजस्थान में दीपावली के दिन घर मंे एक कमरे को सजाकर व रेशम के गद्दे बिछाकर मेहमानों की तरह बिल्ली का स्वागत किया जाता है। बिल्ली के समक्ष खाने हेतु तमाम मिठाईयाँ व खीर इत्यादि रख दी जाती हंै। यदि इस दिन बिल्ली सारी खीर खा जाये तो इसे वर्ष भर के लिए शुभ व साक्षात् लक्ष्मी का आगमन माना जाता है। उत्तरांचल के थारू आदिवासी अपने मृत पूर्वजों के साथ दीपावली मनाते हैं तो हिमाचल प्रदेश में कुछ आदिवासी जातियां इस दिन यक्ष पूजा करती हैं। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में दीपावली को काली पूजा के रूप में मनाया जाता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को आज ही के दिन माँ काली ने दर्शन दिए थे, अतः इस दिन बंगाली समाज में काली पूजा का विधान है। यहाँ पर यह तथ्य गौर करने लायक है कि दशहरा-दीपावली के दौरान पूर्वी भारत के क्षेत्रों में देवी के रौद्र रूपों को पूजा जाता है, वहीं उत्तरी व दक्षिण भारत में देवी के सौम्य रूपों अर्थात लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा माँ की पूजा की जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि दीपावली का सम्बन्ध सिर्फ हिन्दुओं से ही रहा है वरन् दीपावली के दिन ही भगवान महावीर के निर्वाण प्राप्ति के चलते जैन समाज दीपावली को निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है तो सिक्खों के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर की स्थापना एवं गुरू हरगोविंद सिंह की रिहाई दीपावली के दिन होने के कारण इसका महत्व सिक्खों के लिए भी बढ़ जाता है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी वर्ष 1833 में दीपावली के दिन ही प्राण त्यागे थे। देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी दीपावली का त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। वर्ष 2005 में ब्रिटिश संसद में दीपावली-पर्व के उत्सव पर भारतीय नृत्य, संगीत, रंगोली, संस्कृत मंत्रों के उच्चारण व हिन्दू देवी-देवताओं की उपासना का आयोजन किया गया। ब्रिटेन के करीब सात लाख हिंदू इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं। सन् 2004 में तो ब्रिटेन ने इस पर्व पर डाक-टिकट भी जारी किया था।&lt;br /&gt;भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी धनदेवी लक्ष्मी के कई नाम और रूप मिलते हैं। धनतेरस को लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्राकट्य का दिन माना जाता है। भारतीय परम्परा उल्लू को लक्ष्मी जी का वाहन मानती है पर तमाम भारतीय ग्रन्थों में कुछ अन्य वाहनों का भी उल्लेख है। महालक्ष्मी स्त्रोत में गरूड़ तो अथर्ववेद के वैवर्त ने हाथी को लक्ष्मी जी का वाहन बताया गया है। प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी एथेना का वाहन भी उल्लू है। लेकिन प्राचीन यूनान में धन सम्पदा की देवी के तौर पर ूपजी जाने वाली ‘हेरा‘ का वाहन मयूर है। तमाम देशों में लक्ष्मी पूजन के पुरातात्विक प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। कम्बोडिया में मिली एक मूर्ति में शेषनाग पर आराम कर रहे विष्णुजी के पैर एक महिला दबा रही है, जो लक्ष्मी है। कम्बोडिया में ही लक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा भी मिली है। प्राचानी यूनानी सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति उत्कीर्ण है। रोम के लम्पकश से प्राप्त एक चाँदी की थाली पर भी लक्ष्मी की आकृति है। इसी प्रकार श्रीलंका के पोलेरूमा में पुरातात्विक खनन के दौरान अन्य भारतीय देवी-देवताओं के साथ-साथ लक्ष्मी की मूर्ति प्राप्त हुई थी। नेपाल, थाईलैण्ड, जावा, सुमात्रा, मारीशस, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका, जापान इत्यादि देशों में धन की देवी की पूजा की जाती है। यूनान में आइरीन, रोम में डिआ लुक्री, प्राचीन रोम में देवी फार्चूना, तो ग्रीक परम्परा में दमित्री को धन की देवी रूप में पूजा जाता है। जिस तरह भारतीय संस्कृति में लक्ष्मी-काली-सरस्वती का धार्मिक महत्व है, उसी प्रकार यूरोप में एथेना-मिनर्वा-एलोरा का महत्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोस-कोस पर बदले भाषा, कोस-कोस पर बदले बानी-वाले भारतीय समाज में एक ही त्यौहार को मनाने के अन्दाज में स्थान परिवर्तन के साथ कुछ न कुछ परिवर्तन दिख ही जाता है। वक्त के साथ दीपावली का स्वरूप भी बदला है। पारम्परिक सरसों के तेल की दीपमालायें न सिर्फ प्रकाश व उल्लास का प्रतीक होती हैं बल्कि उनकी टिमटिमाती रोशनी के मोह में घरों के आसपास के तमाम कीट-पतंगे भी मर जाते हैं, जिससे बीमारियों पर अंकुश लगता है। इसके अलावा देशी घी और सरसों के तेल के दीपकों का जलाया जाना वातावरण के लिए वैसे ही उत्तम है जैसे जड़ी-बूटियां युक्त हवन सामग्री से किया गया हवन। पर वर्तमान में जिस प्रकार बल्बों और झालरों का प्रचलन बढ़ रहा है, वह दीपावली के परम्परागत स्वरूप के ठीक उलटा है। एक ओर कोई व्यक्ति बीमार है तो दूसरी ओर अन्य लोग बिना उसके स्वास्थ्य की परवाह किए लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं, एक व्यक्ति समाज में अपनी हैसियत दिखाने हेतु हजारों रुपये के पटाखे फोड़ रहा है तो दूसरी ओर न जाने कितने लोग सिर्फ एक समय का खाना खाकर पूरा दिन बिता देते हैं। एक अनुमानानुसार हर साल दीपावली की रात पूरे देश में करीब तीन हजार करोड़ रूपये के पटाखे जला दिए जाते हैं और करोड़ांे रूपये जुए में लुटा दिए जाते हैं। क्या हमारी अंतश्चेतना यह नहीं कहती कि करोड़ों रुपये के पटाखे छोड़ने के बजाय भूखे-नंगे लोगों हेतु कुछ प्रबन्ध किए जायें? क्या पटाखे फोड़कर व जोर से लाउडस्पीकर बजाकर हम पर्यावरण को प्रदूषित नहीं कर रहे हैं? त्यौहार के नाम पर सब छूट है के बहाने अपने को शराब के नशे में डुबोकर मारपीट व अभद्रता करना कहाँ तक जायज है? निश्चिततः इन सभी प्रश्नों का जवाब अगर समय रहते नहीं दिया गया तो अगली पीढ़ियाँ शायद त्यौहारों की वास्तविक परिभाषा ही भूल जायें। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.kkyadav.blogspot.com/"&gt;&lt;strong&gt;कृष्ण कुमार यादव&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-7579838809823202916?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/7579838809823202916/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=7579838809823202916' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7579838809823202916'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7579838809823202916'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='विभिन्न रूप हैं दीपावली के'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TL60OJsLr7I/AAAAAAAAAw0/PtbGEr-MtlY/s72-c/diwali+7.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-4926820902720309506</id><published>2010-10-13T08:00:00.000+05:30</published><updated>2010-10-13T08:00:00.127+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दशहरा'/><title type='text'>मैसूर का दशहरा और 'गोम्बे हब्बा' (गुड़ियों का उत्सव)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TLP7dnhNZYI/AAAAAAAAAvU/ehgqF-nk2Kw/s1600/BOMBE-MANE.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5527037653956781442" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TLP7dnhNZYI/AAAAAAAAAvU/ehgqF-nk2Kw/s400/BOMBE-MANE.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मैसूर में दशहरे की परंपराओं के साथ यहां का 'गोम्बे हब्बा' (गुड़ियों का उत्सव) विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। यह परंपरा मैसूरवासियों के लिए खासी महत्वपूर्ण रही है। यह उसी समय से चली आ रही है जिस समय वाडेयार राजघराने के शासक मैसूर की सत्ता पर आसीन थे। इस नजरिए से मैसूरवासियों की संवेदनाएं तथा बेहतर भावनाएं भी इस परंपरा के साथ काफी करीबी से जुड़ी हुई हैं। बहरहाल, इन दिनों गुड़ियों के मेले को पहले की तरह राजकीय घराने का पृष्ठपोषण न मिल पाने से इसके आकर्षण में कुछ कमी जरूर दिखने लगी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि गोम्बे हब्बा नवरात्रि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो मैसूर के साथ ही लगभग पूरे राज्य में काफी पसंद किया जाता है। दशहरे के मौके पर प्रत्येक घर में गुड़ियों का मेला जरूर देखने को मिल जाता है। मैसूर पैलेस बोर्ड के अधिकारियों के मुताबिक, इस परंपरा में काफी गहरा अर्थ छिपा है। गोम्बे हब्बा के तहत नौ गुड़ियों की सजावट की जाती है जो देवी दुर्गा या चामुंडेश्वरी के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन नौ गुड़ियों में महिलाओं की हस्तकला दक्षता की झलक भी मिलती है। कलात्मक रूप से देखा जाए तो पुराने मैसूर में इन गुड़ियों की काफी बारीक सजावट की जाती थी। आम तौर पर घरेलू महिलाएं इन गुड़ियों को तैयार किया करती थीं। इनमें दशहरे के उत्सवी माहौल की झलक देखने का प्रयास भी किया जाता था। बताया जाता है कि यह परंपरा 16वीं सदी के वाडेयार शासक राजा वाडेयार के समय में शुरू हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरुआती तौर पर गोम्बे हब्बा में देवी गौरी की आकृतियों को प्रतिमाओं में संवारने का प्रयास किया जाता था। दशहरे के नौ दिनों के दौरान इन प्रतिमाओं को देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग कल्पित रूप दिए जाते थे। लोग अपने घरों में इन्हीं प्रतिमाओं की पूजा भी किया करते थे। 18 वीं शताब्दी के अंत में यह परंपरा थोड़ी-सी बदल गई। वाडेयार शासकों ने प्रतिमाओं के स्थान पर गुड़ियों की सजावट शुरू कर दी। इसके साथ ही गोम्बे हब्बा की शुरुआत मानी जाती है। राजपरिवार के लोगों ने भी देवी दुर्गा की गुड़ियों में खासी दिलचस्पी लेने लगे। यहां तक, कि मैसूर राजमहल में ही एक खास स्थान गुड़ियों को बनाने तथा उन्हें करीने से सजाने के लिए चिह्नित कर दिया गया। इस स्थान को 'गोम्बे तोट्टी' के नाम से जाना जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले-पहल तो दशहरे का महोत्सव राज परिवार के लोगों के लिए ही हुआ करता था लेकिन आगे चलकर इसे आम लोगों के लिए भी शुरू कर दिया गया। फिर भी, एकबारगी सबको इस उत्सव में शामिल नहीं किया गया। सिर्फ राजदरबार के उच्च-पदस्थ लोगों को ही दशहरे के त्यौहार में शामिल किया गया। धीरे-धीरे कुछेक दशकों बाद इसे सार्वजनिक रूप से मनाया जाने लगा। गोम्बे हब्बा के दौरान घरों के बच्चों को (खास तौर पर कन्याओं को) जो गुड़िया सबसे अधिक पसंद होती थी वह उनकी शादी के समय माता-पिता उनके साथ दे दिया करते थे। उन दिनों विवाहित किशोरियों के बीच गुड़ियों के साथ खेलना पसंद किया जाता था। इस परंपरा ने भी गोम्बे हब्बा को पूरे राज्य में अधिक लोकप्रियता दिला दी। इसमें घरों के बच्चे बहुत ही जोश के साथ भाग लिया करते थे क्योंकि गुड़ियों के चयन तथा उनकी सजावट के मामलों में घरों के बड़े-बुजुर्ग बच्चों के साथ जरूर सलाह-मशविरा किया करते थे। इससे गोम्बे हब्बा में उनकी मस्ती दोगुनी हो जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में घरों में आयोजित किए जाने वाले इस गोम्बे हब्बा में गुड़ियों को नौ स्तरों पर सजाया जाता है। प्रत्येक दिन नई गुड़िया बनाकर उसे पिछले दिनों की गुड़ियों के साथ शामिल किया जाता है। इन्हें देवी दुर्गा के नौ नामों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिध्दिरात्रि के नामों से ही पुकारा जाता है। माना जाता है कि यह गुड़ियाएं दैवी स्वरूप धारण कर अशुभ आत्माओं से परिवारों की रक्षा करती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाडेयार शासकों का राज्यकाल समाप्त होने के बाद गुड़िया बनाने की कला को पर्याप्त पृष्ठपोषण न मिलने के कारण इनके कलात्मक पक्ष पर अब किसी की नजर लगभग नहीं के बराबर पड़ती है। गुड़िया बनाने की इस कला को प्रोत्साहन देने के लिए शहर की एक कला दीर्घा ने दशहरे के दौरान 'बोम्बे मने-2009' के नाम से एक विशेष उत्सव का आयोजन किया है। इस उत्सव में कर्नाटक के साथ ही आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के कलाकारों द्वारा बनाई गई गुड़ियों का प्रदर्शन किया गया है। इन कलाकारों ने प्रत्येक गुड़िया को खास रंग-रूप दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://dakshinbharatrashtramat.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html"&gt;साभार : दक्षिण भारत राष्ट्रमत &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-4926820902720309506?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/4926820902720309506/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=4926820902720309506' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4926820902720309506'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4926820902720309506'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html' title='मैसूर का दशहरा और &apos;गोम्बे हब्बा&apos; (गुड़ियों का उत्सव)'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TLP7dnhNZYI/AAAAAAAAAvU/ehgqF-nk2Kw/s72-c/BOMBE-MANE.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-6296765912665986144</id><published>2010-10-12T11:32:00.000+05:30</published><updated>2010-10-12T11:32:10.657+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दशहरा'/><title type='text'>हाथियों के बिना अधूरा है जगप्रसिद्ध मैसूर दशहरा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TLP5B2EIiLI/AAAAAAAAAvM/fs42AUHLGeI/s1600/mysore_dasara.png"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5527034977801767090" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 262px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TLP5B2EIiLI/AAAAAAAAAvM/fs42AUHLGeI/s400/mysore_dasara.png" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रसिध्द मैसूर दशहरे का नाम आते ही हाथियों का जिक्र होना स्वाभाविक हो जाता है। दशहरे की जंबो सवारी में इन हाथियों को शामिल किया जाता है। 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में हाथियों को विशेष सम्मान एवं स्थान प्राप्त है। दशहरे के लिए हाथियों का चुनाव कुछ दिनों पहले से प्रारंभ कर दिया जाता है। चुनाव करने से पहले वन अधिकारी इन हाथियों की शारीरिक क्षमता के साथ ही इनकी भावनात्मक, बौध्दिक क्षमता परखते हैं और इनकी शोर करने एवं शोर सहने की क्षमता का आंकलन भी किया जाता है। पशु चिकित्सक तनावपूर्ण स्थितियों में इनके धैर्य का परीक्षण और हौदा रखने की योग्यता का भी आंकलन किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद इन्हें विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। प्रशिक्षण के पश्चात् एक विशेष हाथी का चुनाव किया जाता है जो सभी मापदंडों पर खरा उतरे। इस हाथी का नामकरण अंबारी के रूप में होता है। अंबारी वह हाथी है जिस पर लगभग 750 किलो का 'स्वर्ण हौदा' रखा जाता है। इस हाथी को शोभायात्रा में सबसे अलग दिखने के लिए विशेष तरह से सजाया जाता है। आप को जानकर आश्चर्य होगा कि पिछले कई वर्षों से एक ही हाथी को 'अंबारी' हाथी होने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है, जो अब बूढ़ा हो गया है। इतिहासकारों के अनुसार इन हाथियों के चुनाव में मैसूर के राजा काफी उत्साहित रहते थे। वर्ष 1925 में राजा ने हाथियों का चुनाव करने के लिए अपने विशेष व्यक्ति को 400 रुपए के खर्च पर असम और बर्मा के क्षेत्रों की ओर रवाना किया गया था। यह व्यक्ति वहां महीनों रहने के पश्चात् कुछ हाथियों का चुनाव करके मैसूर लेकर आता था। एक बार राजा कृष्णराजा वाडेयार ने लकड़ी के एक व्यापारी से 10 हाथियों को केवल 30 हजार रुपए में खरीदने से मना कर दिया था क्योंकि उनमें से एक भी हाथी 'अंबारी हाथी' बनने की क्षमता नहीं रखते थे। फिर उन्होंने बर्मा के जंगलों में अपने एक आदमी को हाथियों के शिकार के लिए भेजाजहां से वह व्यक्ति हाथियों की तस्वीर खींचकर राजा को भेजता था। तस्वीर देखकर राजा तय करते थे कि उस हाथी को लाना है कि नहीं। इन सभी घटनाओं से 'अंबारी' हाथी की अहमियत का पता चलता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हाथियों की बढ़ती उम्र अब समस्या बनती जा रही है। जंबो सवारी के कई हाथी उम्र दराज हो गए हैं और उनकी जगह नए हाथियों की खोज जारी है। 'स्वर्ण हौदा' लेकर चलने वाले हाथी बलराम की उम्र 50 वर्ष हो चुकी है और उसके साथी श्रीराम 51, मैरीपर कांति 68, रेवती 54 और सरला 64 वर्ष के हैं। उनके स्थान पर नए हाथियों की खोज काफी मुश्किल हो रही है क्योंकि जंगल की आबोहवा से परिचित हाथियों को 'शहरी जंगल' के वातावरण से परिचित करना मुश्किल काम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://dakshinbharatrashtramat.blogspot.com/2009/09/blog-post_24.html"&gt;साभार : दक्षिण भारत राष्ट्रमत &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-6296765912665986144?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/6296765912665986144/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=6296765912665986144' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6296765912665986144'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6296765912665986144'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/10/blog-post_12.html' title='हाथियों के बिना अधूरा है जगप्रसिद्ध मैसूर दशहरा'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TLP5B2EIiLI/AAAAAAAAAvM/fs42AUHLGeI/s72-c/mysore_dasara.png' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-4444165501403148818</id><published>2010-10-08T16:16:00.001+05:30</published><updated>2011-09-29T12:17:23.783+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नवरात्रि'/><title type='text'>नवरात्रि : स्रोत की ओर एक यात्रा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TK71fxCQTGI/AAAAAAAAAr8/aUhplVtvtCM/s1600/navr_01%5B1%5D.png"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; FLOAT: left; HEIGHT: 315px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5525623718917721186" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TK71fxCQTGI/AAAAAAAAAr8/aUhplVtvtCM/s400/navr_01%5B1%5D.png" /&gt;&lt;/a&gt;नवरात्रि का त्योहार अश्विन (शरद) या चैत्र (वसंत) की शुरुआत में प्रार्थना और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह काल आत्म निरीक्षण और अपने स्रोत की ओर वापस जाने का समय है। परिवर्तन के इस काल के दौरान, प्रकृति भी पुराने को झड़ कर नवीन हो जाती है; जानवर सीतनिद्रा में चले जाते हैं और बसंत के मौसम में जीवन वापस नए सिरे से खिल उठता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विज्ञान के अनुसार, पदार्थ अपने मूल रूप में वापस आकर फिर से बार बार अपनी रचना करता है। यह सृष्टि सीधी रेखा में नहीं चल रही है बल्कि वह चक्रीय है, प्रकृति के द्वारा सभी कुछ का पुनर्नवीनीकरण हो रहा है- कायाकल्प की यह एक सतत प्रक्रिया है। तथापि सृष्टि के इस नियमित चक्र से मनुष्य का मन पीछे छूटा हुआ है। नवरात्रि का त्योहार अपने मन को वापस अपने स्रोत की ओर ले जाने के लिए है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्रोत की ओर यात्रा करता है। रात को भी रात्रि कहते हैं क्योंकि वह भी नवीनता और ताजगी लाती है। वह हमारे अस्तित्व के तीन स्तरों पर राहत देती है- स्थूल शरीर को, सूक्ष्म शरीर को, और कारण शरीर को। उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त हो जाता है, मौन के द्वारा हमारे वचनों में शुद्धता आती है और बातूनी मन शांत होता है, और ध्यान के द्वारा अपने अस्तित्व की गहराइयों में डूबकर हमें आत्मसाक्षात्कार मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह आंतरिक यात्रा हमारे बुरे कर्मों को समाप्त करती है। नवरात्रि आत्मा अथवा प्राण का उत्सव है। जिसके द्वारा ही महिषासुर (अर्थात जड़ता), शुम्भ-निशुम्भ (गर्व और शर्म) और मधु-कैटभ (अत्यधिक राग-द्वेष) को नष्ट किया जा सकता है। वे एक-दूसरे से पूर्णत: विपरीत हैं, फिर भी एक-दूसरे के पूरक हैं। जड़ता, गहरी नकारात्मकता और मनोग्रस्तियाँ (रक्तबीजासुर), बेमतलब का वितर्क (चंड-मुंड) और धुँधली दृष्टि (धूम्रलोचन्) को केवल प्राण और जीवन शक्ति ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाकर ही दूर किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवरात्रि के नौ दिन तीन मौलिक गुणों से बने इस ब्रह्मांड में आनन्दित रहने का भी एक अवसर है। यद्यपि हमारा जीवन इन तीन गुणों के द्वारा ही संचालित है, हम उन्हें कम ही पहचान पाते हैं या उनके बारे में विचार करते हैं। नवरात्रि के पहले तीन दिन तमोगुण के हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुण के और आखिरी तीन दिन सत्त्व के लिए हैं। हमारी चेतना इन तमोगुण और रजोगुण के बीच बहती हुई सतोगुण के आखिरी तीन दिनों में खिल उठती है। जब भी जीवन में सत्व बढ़ता है, तब हमें विजय मिलती है। इस ज्ञान का सारतत्व जश्न के रूप में दसवें दिन विजयादशमी द्वारा मनाया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तीन मौलिक गुण हमारे भव्य ब्रह्मांड की स्त्री शक्ति माने गए हैं। नवरात्रि के दौरान देवी माँ की पूजा करके, हम त्रिगुणों में सामंजस्य लाते हैं और वातावरण में सत्व के स्तर को बढ़ाते हैं। हालाँकि नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाई जाती है, परंतु वास्तविकता में यह लड़ाई अच्छे और बुरे के बीच में नहीं है। वेदांत की दृष्टि से यह द्वैत पर अद्वैत की जीत है। जैसा अष्टावक्र ने कहा था, बेचारी लहर अपनी पहचान को समुद्र से अलग रखने की लाख कोशिश करती है, लेकिन कोई लाभ नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालाँकि इस स्थूल संसार के भीतर ही सूक्ष्म संसार समाया हुआ है, लेकिन उनके बीच भासता अलगाव की भावना ही द्वंद का कारण है। एक ज्ञानी के लिए पूरी सृष्टि जीवंत है जैसे बच्चों को सबमें जीवन भासता है ठीक उसी प्रकार उसे भी सब में जीवन दिखता है। देवी माँ या शुद्ध चेतना ही सब नाम और रूप में व्याप्त हैं। हर नाम और हर रूप में एक ही देवत्व को जानना ही नवरात्रि का उत्सव है। अतः आखिर के तीन दिनों के दौरान विशेष पूजाओं के द्वारा जीवन और प्रकृति के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काली माँ प्रकृति की सबसे भयानक अभिव्यक्ति हैं। प्रकृति सौंदर्य का प्रतीक है, फिर भी उसका एक भयानक रूप भी है। इस द्वैत यथार्थ को मानकर मन में एक स्वीकृति आ जाती है और मन को आराम मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवी माँ को सिर्फ बुद्धि के रूप में ही नहीं जाना जाता, बल्कि भ्राँति के रूप में भी; वह न सिर्फ लक्ष्मी (समृद्धि) हैं, वह भूख (क्षुधा) भी हैं और प्यास (तृष्णा) भी हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में देवी माँ के इस दोहरे पहलू को पहचान कर एक गहरी समाधि लग जाती है। यह पच्छम की सदियों पुरानी चली आ रही धार्मिक संघर्ष का भी एक उत्तर है। ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के द्वारा अद्वैत सिद्धि प्राप्त की जा सकती है अथवा इस अद्वैत चेतना में पूर्णता की स्थिति प्राप्त की जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभार: श्रीश्री रविशंकर जी) &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-4444165501403148818?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/4444165501403148818/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=4444165501403148818' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4444165501403148818'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4444165501403148818'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/10/blog-post_08.html' title='नवरात्रि : स्रोत की ओर एक यात्रा'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TK71fxCQTGI/AAAAAAAAAr8/aUhplVtvtCM/s72-c/navr_01%5B1%5D.png' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-5826773992073316897</id><published>2010-10-01T11:19:00.000+05:30</published><updated>2010-10-01T11:19:59.431+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व वृद्ध दिवस (1 अक्टूबर)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>विश्व वृद्ध दिवस : श्रद्धा के पात्र हैं, उन्हें पलकों में जगह दें</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TKV1PFfoMoI/AAAAAAAAAuA/hehL-AvVrRc/s1600/Old+Women.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522949420073104002" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TKV1PFfoMoI/AAAAAAAAAuA/hehL-AvVrRc/s400/Old+Women.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; बढ़ती जनसंख्या के प्रति विश्वव्यापी चिंता के कारण इस समय विश्व भर में शिशु-जन्मदर में कुछ कमी हो रही है, लेकिन दूसरी ओर स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी बढ़ती सुविधाओं के कारण औसत आयु में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यह औसत आयु अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। भारत में सन 1947 में यह औसत आयु केवल 27 वर्ष थी, जो 1961 में 42 वर्ष, 1981 में 54 वर्ष और अब लगभग पैंसठ वर्ष तक पहुंच गयी है। साठ से अधिक आयु के लोगों की संख्या में वृद्धि हमारे यहां विशेष रूप में 1961 से प्रारम्भ हुई, जो चिकित्सा सुविधाओं के प्रसार के साथ-साथ निरन्तर बढ़ती चली गयी। हमारे यहां 1991 में 60 वर्ष से अधिक आयु के 5 करोड़ 60 लाख व्यक्ति थे। जो 2007 में बढ़कर 8 करोड़ 40 लाख हो गये। देश में सबसे अधिक बुजुर्ग केरल में हैं। वहां कुल जनसंख्या में 11 प्रतिशत बुजुर्ग हैं, जबकि सम्पूर्ण देश में यह औसत लगभग 8प्रतिशत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृद्धजन सम्पूर्ण समाज के लिए अतीत के प्रतीक, अनुभवों के भंडार तथा सभी की श्रद्धा के पात्र हैं। समाज में यदि उपयुक्त सम्मान मिले और उनके अनुभवों का लाभ उठाया जाए तो वे हमारी प्रगति में विशेष भागीदारी भी कर सकते हैं। इसलिए बुजुर्गों की बढ़ती संख्या हमारे लिए चिंतनीय नहीं है। चिंता केवल इस बात की होनी चाहिए कि वे स्वस्थ, सुखी और सदैव सक्रिय रहें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृद्धों की समस्या पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में सर्वप्रथम अर्जेंटीना ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया था। तब से लेकर अब तक वृद्धों के संबंध में अनेक गोष्ठियां और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो चुके हैं। वर्ष 1999 को अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग-वर्ष के रूप में भी मनाया गया। इससे पूर्व 1982 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘वृद्धावस्था को सुखी बनाइए’ जैसा नारा दिया और ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ का अभियान प्रारम्भ किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रथम अक्तूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध-दिवस’ के रूप में घोषित किया हुआ है और इस रूप में विश्वभर में इसका आयोजन भी किया जाता है। इन सब बातों से वृद्ध व्यक्तियों के प्रति लोगों में सम्मान और संवेदना के भाव जागे और उनके स्वास्थ्य तथा आर्थिक समस्याओं के समाधान पर विशेष ध्यान दिया गया। वृद्धावस्था की बीमारियों के लिए अनेक औषधियों का आविष्कार किया गया और अनेक स्थानों पर अस्पतालों में उनके लिए विशेष व्यवस्था की गयी। लगभग सभी पश्चिमी देशों में आर्थिक समस्या से जूझते वृद्धों के लिए पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था की गयी है, जिससे उनका खर्च आराम से चल जाता है। वहां के बुजुर्गों के सामने अब सामान्यत: आर्थिक संकट नहीं है। उनके सामने स्वास्थ्य के अतिरिक्त मुख्य समस्या अकेलेपन की है। वयस्क होने पर बच्चे अलग रहने लगते हैं और केवल सप्ताहान्त या अन्य विशेष अवसरों पर ही वे उनसे मिलने आते हैं। कभी-कभी उनसे मिले महीने या वर्ष भी गुजर जाते हैं। बीमारी के समय उन्हें सान्त्वना देेने वाला सामान्यत: उनका कोई भी अपना उनके पास नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहां प्राचीन भारत में बुजुर्गों के प्रति विशेष सम्मान और आदर की भावना थी। वे सदैव परिवार के मुखिया रहते और उन्हीं के मार्ग-निर्देशन में परिवार की गतिविधियां आगे बढ़तीं। छोटों के द्वारा बड़ों के चरणस्पर्श और बड़ों के द्वारा छोटों को आशीर्वाद की पंरपरा ने अपनत्व की इस भावना को सदैव मजबूत बनाये रखा। संयुक्त परिवार की प्रथा ने आबाल वृद्ध नर-नारी सभी को आपसी प्रेम की माला में पिरोये रखा। किन्तु कालान्तर में संयुक्त परिवार की प्रथा चरमराने लगी और धीरे-धीरे वह समाप्तप्राय हो गयी। चरण छूने और आशीर्वाद की परंपरा भी अब औपचारिकता बनकर रह गयी हैं। पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हमारे नवयुवक भी विवाह के उपरान्त अपना-अलग घर बसाने लगे हैं। इससे समाज में वृद्धों की स्थिति दयनीय होती चली गयी। अनेक राज्य सरकारों ने अपने यहां बेसहारा वृद्धों के लिए पेंशन की व्यवस्था की हुई है, मगर वह इतनी कम है कि उससे दो वक्त का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। फिर व्यवस्था की उलझनों के कारण उस पेंशन को प्राप्त करना भी टेढ़ी खीर है। राज्यसेवा में रहे व्यक्तियों को अवश्य ही अपनी पेंशन के कारण आर्थिक संकट की आशंका नहीं रहती, मगर बीमारी के समय उनके लिए भी किसी अपने के अभाव में भयानक परेशानी हो जाती है। अवश्य ही, जिन परिवारों में थोड़े बहुत पुराने संस्कार शेष हैं, वहां के बुजुर्ग अपने इस अकेलेपन की पीड़ा से एक सीमा तक मुक्त रह पाते हैं।&lt;br /&gt;वृद्धावस्था के अभिशाप के दो पहलू हैं। एक सामाजिक और दूसरा व्यक्तिगत। सामाजिक पहलू यह है कि समाज में उन्हें यथोचित सम्मान प्राप्त नहीं होता। उन्हें अनुपयोगी और निरर्थक माना जाता है। उनके पास समय बिताने का या मनोरंजन का कोई साधन नहीं है। नवयुवक उन्हें अपनी प्रगति के मार्ग में बाधा मानते हैं और उनके साथ किसी प्रकार का वैचारिक सामंजस्य नहीं रख पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्या का व्यक्तिगत पहलू और भी अधिक दुरूह है। समाज की उपेक्षा से वे अपने को कुंठित और निराश महसूस करते हैं। मौत अवश्यम्भावी है, यह वे भी जानते हैं। मगर वह मौत कब, कैसे और किन तकलीफों के साथ होगी, इस बारे में तरह-तरह की आशंकाएं उन्हें सदैव घेरे रहती हैं। उनकी शारीरिक और मानसिक शक्ति का निरंतर क्षय होता जाता है, जिससे वे स्वयं अपने शरीर का काम भी भली प्रकार नहीं कर पाते। दूसरों पर निर्भरता काफी अधिक बढ़ जाती है। आमदनी का कोई साधन न होने पर आर्थिक संकट उन्हें सबसे अधिक तंग करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृद्ध महिलाओं के लिए कुछ विशेष समस्याएं भी हैं। पुरुष प्रधान समाज होने के कारण हमारे यहां सामान्यत: वृद्ध पुरुष को ही परिवार का मुखिया माना जाता है और इसी रूप में परिवार से बाहर वालों के सामने उसे प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए कम से कम दिखावे के लिए वृद्ध पुरुषों के प्रति सम्मान की औपचारिक प्रथा कमोबेश रूप में बनी रहती है। यदि वह वृद्ध पुरुष पेंशन या अन्य किसी साधन से कुछ कमाता है, तब उसका सम्मान भी बढ़ जाता है। पेंशन प्राप्त करने वाली या अन्य किसी उत्पादक कार्य अथवा गृहकार्य में योगदान करने वाली महिला के साथ भी सम्मान की यह भावना कमोबेश रूप में जुड़ी रहती है। लेकिन अन्य महिलाओं की स्थिति बेहद खराब होती है। बहू-बेटे का व्यवहार अधिकांशत: उसके प्रति अभद्र और आपत्तिजनक होता है। हमारे यहां विधवाओं की स्थिति तो बेहद दयनीय है। किसी भी शुभ कार्य में उन्हें अपशकुन माना जाता है और उन्हें ऐसे कार्यों से दूर रखकर उन्हें मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न उठता है वृद्ध व्यक्तियों के सम्मुख उपस्थित समस्याओं का समाधान क्या हो? हमें सर्वप्रथम तो उन्हें आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाने पर ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में मुख्य समस्या उन लोगों की हैं, जो न तो किसी उत्पादक कार्य में लगे हैं और न उन्हें कोई पेंशन मिलती है। इनमें कुछ लोग इतने शक्तिहीन और निर्बल हो चुके हैं कि वे कोई काम कर ही नहीं सकते। ऐसे बेसहारा वृद्ध व्यक्तियों के लिए सरकार की ओर से आवश्यक रूप से और सहज रूप मे मिल सकने वाली पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था की जानी चाहिए। ऐसे वृद्ध व्यक्ति जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ हैं, उनके लिए समाज को कम परिश्रम वाले हल्के-फुल्के रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृद्धों के कल्याण के लिए इस प्रकार के कार्यक्रमों को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए, जो उनमें जीवन के प्रति उत्साह उत्पन्न करे। इसके लिए उनकी रुचि के अनुसार विशेष प्रकार की योजनाएं भी लागू की जा सकती हैं। स्वयं वृद्धजन को भी अपने तथा परिवार और समाज के हित के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरणार्थ युवा परिजनों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें और उन्हें अपने ढंग से जीवन जीने दें। उन्हें अपने खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सदैव हल्का, सादा और स्वास्थ्यवद्र्धक भोजन लेना चाहिए। अपने को सदैव तनाव से दूर रखें और यथासंभव नित्यप्रति हल्का और नियमित व्यायाम करें। प्रात: और संध्या को नित्य घूमना उनके लिए विशेष उपयोगी है। अपने को यथासंभव व्यस्त रखें और निराशा को कभी भी अपने पास न फटकने दें। सदैव शांत, संतुष्ट और संयमित जीवन बितायें। समाज के लिए कुछ उपयोगी कार्य करने का सदैव प्रयत्न करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;a href="http://dainiktribuneonline.com/2010/10/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9/"&gt;साभार : दैनिक ट्रिब्यून&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-5826773992073316897?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/5826773992073316897/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=5826773992073316897' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5826773992073316897'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5826773992073316897'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='विश्व वृद्ध दिवस : श्रद्धा के पात्र हैं, उन्हें पलकों में जगह दें'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TKV1PFfoMoI/AAAAAAAAAuA/hehL-AvVrRc/s72-c/Old+Women.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-7041563073255615293</id><published>2010-09-26T15:34:00.002+05:30</published><updated>2010-09-27T11:23:20.349+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डाटर्स -डे ( सितम्बर का चौथा रविवार)'/><title type='text'>आज 'डाटर्स -डे' यानी बेटियों का दिन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TJ8aYFS3rdI/AAAAAAAAAso/qjy4_0Y0pF8/s1600/Girls.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5521160669220023762" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 270px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TJ8aYFS3rdI/AAAAAAAAAso/qjy4_0Y0pF8/s320/Girls.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आज डाटर्स डे है, यानि बेटियों का दिन. यह सितंबर माह के चौथे रविवार को मनाया जाता है अर्थात इस साल यह 26 सितम्बर को मनाया जा रहा है. गौरतलब है कि चाईल्‍ड राइट्स एंड यू (क्राई) और यूनिसेफ ने वर्ष 2007 के सितंबर माह के चौथे रविवार यानी 23 सितंबर, 2007 को प्रथम बार 'डाटर्स-डे'   मनाया था, तभी से इसे हर वर्ष मनाया जा रहा है. इस पर एक व्यापक बहस हो सकती है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस दिन का महत्त्व क्या है, पर जिस तरह से अपने देश में लिंगानुपात कम है या भ्रूण हत्या जैसी बातें अभी भी सुनकर मन सिहर जाता है, उस परिप्रेक्ष्य में जरुर इस दिन का प्रतीकात्मक महत्त्व हो सकता है. दुर्भाग्यवश हर ऐसे दिन को हम ग्रीटिंग्स-कार्ड, गिफ्ट और पार्टियों से जोड़कर देखते हैं. कार्पोरेट कंपनियों ने ऐसे दिनों का व्यवसायीकरण कर दिया है. बच्चे उनके माया-जाल में उलझते जा रहे हैं. डाटर्स डे की महत्ता तभी होगी, जब हम यह सुनिश्चित कर सकें कि-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१- बेटियों को इस धरा पर आने से पूर्व ही गर्भ में नहीं मारा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;२- बेटियों के जन्म पर भी उतनी ही खुशियाँ होंनी चाहिए, जितनी बेटों के जन्म पर।&lt;br /&gt;३- बेटियों को घर में समान परिवेश, शिक्षा व व्यव्हार मिलना चाहिए. (ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी दोयम व्यवहार होता है)।&lt;br /&gt;४- यह कहना कि बेटियां पराया धन होती हैं, उचित नहीं प्रतीत होता. आज के दौर में तो बेटे भी भी शादियों के बाद अपना अलग घर बसा लेते हैं।&lt;br /&gt;५- बेटियों को दहेज़ के लिए प्रताड़ित करने या जिन्दा जलाने जैसी रोगी मानसिकता से समाज बाहर निकले।&lt;br /&gt;६- बेटियां नुमाइश की चीज नहीं बल्कि घर-परिवार और जीवन के साथ-साथ राष्ट्र को संवारने वाली व्यक्तित्व हैं।&lt;br /&gt;७-पिता की मृत्यु के बात पुत्र को ही अग्नि देने का अधिकार है, जैसी मान्यताएं बदलनी चाहियें. इधर कई लड़कियों ने आगे बढ़कर इस मान्यता के विपरीत शमशान तक जाकर सारे कार्य बखूबी किये हैं।&lt;br /&gt;८-वंश पुत्रों से ही चलता है. ऐसी मान्यताओं का अब कोई आधार नहीं. लड़कियां अब माता-पिता की सम्पति में हक़दार हो चुकी हैं, फिर माता-पिता का उन पर हक़ क्यों नहीं. आखिरकार बेटियां भी तो आगे बढ़कर माता-पिता का नाम रोशन कर रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....यह एक लम्बी सूची हो सकती है, जरुरत है इस विषय पर हम गंभीरता से सोचें की क्या बेटियों के बिना परिवार-समाज-देश का भविष्य है. बेटियों को मात्र बातों में दुर्गा-लक्ष्मी नहीं बनायें, बल्कि वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर उन्हें भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का दर्ज़ा दें. बात-बात पर बेटियों की अस्मिता से खिलवाड़ समाज और राष्ट्र दोनों के लिए घातक है. बेटियों को स्पेस दें, नहीं तो ये बेटियां अपना हक़ लेना भी जानती हैं. आज जीवन के हर क्षेत्र में बेटियों ने सफलता के परचम फैलाये हैं, पर देश के अधिकतर भागों में अभी भी उनके प्रति व्यवहार समान नहीं है. समाज में वो माहौल बनाना चाहिए जहाँ हर कोई नि: संकोच कह सके- अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ !!&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-7041563073255615293?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/7041563073255615293/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=7041563073255615293' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7041563073255615293'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7041563073255615293'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/09/blog-post_26.html' title='आज &apos;डाटर्स -डे&apos; यानी बेटियों का दिन'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TJ8aYFS3rdI/AAAAAAAAAso/qjy4_0Y0pF8/s72-c/Girls.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-2969001249251791666</id><published>2010-09-05T14:34:00.000+05:30</published><updated>2010-09-05T14:34:00.160+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षक दिवस (5 सितम्बर)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>गुरु-शिष्य की बदलती परम्परा (शिक्षक दिवस पर विशेष)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;गुरूब्र्रह्म गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः&lt;br /&gt;गुरूः साक्षात परब्रह्म, तस्मैं श्री गुरूवे नमः&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में गुरू-शिष्य की लम्बी परम्परा रही है। प्राचीनकाल में राजकुमार भी गुरूकुल में ही जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे और विद्यार्जन के साथ-साथ गुरू की सेवा भी करते थे। राम-वशिष्ठ, कृष्ण-संदीपनि, अर्जुन-द्रोणाचार्य से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य-चाणक्य एवं विवेकानंद-रामकृष्ण परमहंस तक शिष्य-गुरू की एक आदर्श एवं दीर्घ परम्परा रही है। उस एकलव्य को भला कौन भूल सकता है, जिसने द्रोणाचार्य की मूर्ति स्थापित कर धनुर्विद्या सीखी और गुरूदक्षिणा के रूप में द्रोणाचार्य ने उससे उसके हाथ का अंगूठा ही मांग लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के बाद गुरू-शिष्य की इस दीर्घ परम्परा में तमाम परिवर्तन आये। &lt;strong&gt;1962 में जब डाॅ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति रूप में पदासीन हुए तो उनके चाहने वालों ने उनके जन्मदिन को ‘‘शिक्षक दिवस‘‘ के रूप में मनाने की इच्छा जाहिर की। डाॅ0 राधाकृष्णन ने कहा कि-‘‘मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के निश्चय से मैं अपने को काफी गौरवान्वित महसूस करूंगा।‘‘ तब से लेकर हर 5 सितम्बर को ‘‘शिक्षक दिवस‘‘ के रूप में मनाया जाता है। &lt;/strong&gt;डाॅ0 राधाकृष्णन ने शिक्षा को एक मिशन माना था और उनके मत में शिक्षक होने के हकदार वही हैं, जो लोगों से अधिक बुद्विमान व अधिक विनम्र हों। अच्छे अध्यापन के साथ-साथ शिक्षक का अपने छात्रों से व्यवहार व स्नेह उसे योग्य शिक्षक बनाता है। मात्र शिक्षक होने से कोई योग्य नहीं हो जाता बल्कि यह गुण उसे अर्जित करना होता है। डाॅ0 राधाकृष्णन शिक्षा को जानकारी मात्र नहीं मानते बल्कि इसका उद्देश्य एक जिम्मेदार नागरिक बनाना है। शिक्षा के व्यवसायीकरण के विरोधी डाॅ0 राधाकृष्णन विद्यालयों को ज्ञान के शोध केन्द्र, संस्कृति के तीर्थ एवं स्वतंत्रता के संवाहक मानते हैं। यह राधाकृष्णन का बड़प्पन ही था कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे वेतन के मात्र चौथाई हिस्से से जीवनयापन कर समाज को राह दिखाते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो गुरू-शिष्य की परंपरा कहीं न कहीं कलंकित हो रही है। आए दिन शिक्षकों द्वारा विद्याार्थियों के साथ एवं विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के साथ दुव्र्यवहार की खबरें सुनने को मिलती हैं। जातिगत भेदभाव प्राइमरी स्तर के स्कूलों में आम बात है। यही नहीं तमाम शिक्षक अपनी नैतिक मर्यादायें तोड़कर छात्राओं के साथ अश्लील कार्यों में लिप्त पाये गये। आज न तो गुरू-शिष्य की वह परंपरा रही और न ही वे गुरू और शिष्य रहे। व्यवसायीकरण ने शिक्षा को धंधा बना दिया है। संस्कारों की बजाय धन महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में जरूरत है कि गुरू और शिष्य दोनों ही इस पवित्र संबंध की मर्यादा की रक्षा के लिए आगे आयें ताकि इस सुदीर्घ परंपरा को सांस्कारिक रूप में आगे बढ़ाया जा सके।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-2969001249251791666?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/2969001249251791666/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=2969001249251791666' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2969001249251791666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2969001249251791666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/09/blog-post_05.html' title='गुरु-शिष्य की बदलती परम्परा (शिक्षक दिवस पर विशेष)'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-2129319717720567939</id><published>2010-09-01T11:35:00.001+05:30</published><updated>2011-08-20T16:02:21.089+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण-जन्माष्टमी'/><title type='text'>श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बधाइयाँ</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THzLy_sOgeI/AAAAAAAAAp4/lYB5qnJ2ZSw/s1600/89427-krishna.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5511504120945476066" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 324px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THzLy_sOgeI/AAAAAAAAAp4/lYB5qnJ2ZSw/s400/89427-krishna.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;श्री कृष्णजन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आज के दिन मथुरापहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जाता है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकृष्णजन्माष्टमीका व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना गया है। इस दिन उपवास रखें तथा अन्न का सेवन न करें। समाज के सभी वर्ग भगवान श्रीकृष्ण के प्रादुर्भाव-महोत्सव को अपनी साम‌र्थ्य के अनुसार उत्साहपूर्वक मनाएं। गौतमीतंत्रमें यह निर्देश है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपवास: प्रकर्तव्योन भोक्तव्यंकदाचन।&lt;br /&gt;कृष्णजन्मदिनेयस्तुभुड्क्तेसतुनराधम:।&lt;br /&gt;निवसेन्नरकेघोरेयावदाभूतसम्प्लवम्॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमीर-गरीब सभी लोग यथाशक्ति-यथासंभव उपचारों से योगेश्वर कृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। जब तक उत्सव सम्पन्न न हो जाए तब तक भोजन कदापि न करें। जो वैष्णव कृष्णाष्टमी के दिन भोजन करता है, वह निश्चय ही नराधम है। उसे प्रलय होने तक घोर नरक में रहना पडता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धार्मिक गृहस्थोंके घर के पूजागृह तथा मंदिरों में श्रीकृष्ण-लीला की झांकियां सजाई जाती हैं। भगवान के श्रीविग्रहका शृंगार करके उसे झूला झुलाया जाता है। श्रद्धालु स्त्री-पुरुष मध्यरात्रि तक पूर्ण उपवास रखते हैं। अर्धरात्रिके समय शंख तथा घंटों के निनाद से श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा शालिग्राम का दूध, दही, शहद, यमुनाजल आदि से अभिषेक होता है। तदोपरांत श्रीविग्रहका षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। कुछ लोग रात के बारह बजे गर्भ से जन्म लेने के प्रतीक स्वरूप खीरा चीर कर बालगोपाल की आविर्भाव-लीला करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्मग्रंथों में जन्माष्टमी की रात्रि में जागरण का विधान भी बताया गया है। कृष्णाष्टमी की रात में भगवान के नाम का संकीर्तन या उनके मंत्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ॐनमोभगवतेवासुदेवायका जाप अथवा श्रीकृष्णावतारकी कथा का श्रवण करें। श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए रात भर जगने से उनका सामीप्य तथा अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। जन्मोत्सव के पश्चात घी की बत्ती, कपूर आदि से आरती करें तथा भगवान को भोग में निवेदित खाद्य पदार्थो को प्रसाद के रूप में वितरित करके अंत में स्वयं भी उसको ग्रहण करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जन्माष्टमी का व्रत करने वाले वैष्णव प्रात:काल नित्यकर्मो से निवृत्त हो जाने के बाद इस प्रकार संकल्प करें-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ॐविष्णुíवष्णुíवष्णु:अद्य शर्वरीनामसंवत्सरेसूर्येदक्षिणायनेवर्षतरैभाद्रपदमासेकृष्णपक्षेश्रीकृष्णजन्माष्टम्यांतिथौभौमवासरेअमुकनामाहं(अमुक की जगह अपना नाम बोलें) मम चतुर्वर्गसिद्धिद्वारा श्रीकृष्णदेवप्रीतयेजन्माष्टमीव्रताङ्गत्वेनश्रीकृष्णदेवस्ययथामिलितोपचारै:पूजनंकरिष्ये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो जन्माष्टमी के व्रत में पूरे दिन उपवास रखने का नियम है, परंतु इसमें असमर्थ फलाहार कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भविष्यपुराणके जन्माष्टमीव्रत-माहात्म्यमें यह कहा गया है कि जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सवकिया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराजके अनुष्ठान से सभी को परम श्रेय की प्राप्ति होती है। व्रतकत्र्ताभगवत्कृपाका भागी बनकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अन्त में वैकुंठ जाता है। कृष्णाष्टमी का व्रत करने वाले के सब क्लेश दूर हो जाते हैं। दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है। गृहस्थोंको पूर्वोक्त द्वादशाक्षरमंत्र से दूसरे दिन प्रात:हवन करके व्रत का पारण करना चाहिए। जिन परिवारों में कलह-क्लेश के कारण अशांति का वातावरण हो, वहां घर के लोग जन्माष्टमी का व्रत करने के साथ इस मंत्र का अधिकाधिक जप करें-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्णायवासुदेवायहरयेपरमात्मने।&lt;br /&gt;प्रणतक्लेशनाशायगोविन्दायनमोनम:॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर्युक्त मंत्र का नित्य जाप करते हुए सच्चिदानंदघनश्रीकृष्ण की आराधना करें। इससे परिवार में खुशियां वापस लौट आएंगी। घर में विवाद और विघटन दूर होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्तिहटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनिबजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A5%80"&gt;साभार : विकिपीडिया &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;!! कृष्ण जन्माष्टमी की आप सभी को बधाइयाँ !!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-2129319717720567939?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/2129319717720567939/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=2129319717720567939' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2129319717720567939'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2129319717720567939'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बधाइयाँ'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THzLy_sOgeI/AAAAAAAAAp4/lYB5qnJ2ZSw/s72-c/89427-krishna.gif' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-8095028915690725762</id><published>2010-08-24T07:30:00.000+05:30</published><updated>2010-08-24T07:30:03.121+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रक्षाबंधन'/><title type='text'>मानवीय रिश्तों को एक धागे में बांधता रक्षाबन्धन पर्व</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THETfiVzc9I/AAAAAAAAApA/KgpVZVWzNX0/s1600/rakshabandhan_rakhi_scraps20.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5508205251765957586" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 260px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THETfiVzc9I/AAAAAAAAApA/KgpVZVWzNX0/s400/rakshabandhan_rakhi_scraps20.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;रक्षाबन्धन भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख त्यौहार है जो कि श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन अपनी रक्षा के लिए भाई को राखी बाँधती है। भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। पहले रक्षा बन्धन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि- ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’- अर्थात ‘सूत्र’ अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी लोगों को जोड़ता है। गीता में ही लिखा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योर्तिलिंगम भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बाँधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राखी का सर्वप्रथम उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है जिसके अनुसार असुरों के हाथ देवताओं की पराजय पश्चात अपनी रक्षा के निमित्त सभी देवता इंद्र के नेतृत्व में गुरू वृहस्पति के पास पहुँचे तो इन्द्र ने दुखी होकर कहा- ‘‘अच्छा होगा कि अब मैं अपना जीवन समाप्त कर दूँ।’’ इन्द्र के इस नैराश्य भाव को सुनकर गुरू वृहस्पति के दिशा-निर्देश पर रक्षा-विधान हेतु इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र सहित समस्त देवताओं की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा और अंततः इंद्र ने युद्ध में विजय पाई। एक अन्य कथानुसार राजा बालि को दिये गये वचनानुसार भगवान विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बालि के राज्य की रक्षा के लिये चले गये । तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बालि की कलाई पर पवित्र धागा बाँधा और उसके लिए मंगलकामना की। इससे प्रभावित हो बालि ने देवी को अपनी बहन मानते हुए उसकी रक्षा की कसम खायी। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हो गयीं और उनके कहने से बालि ने भगवान इन्द्र से बैकुण्ठ वापस लौटने की विनती की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्रेता युग में रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक कटने के पश्चात रावण के पास पहुँची और रक्त से सनी साड़ी का एक छोर फाड़कर रावण की कलाई में बाँध दिया और कहा कि- ‘‘भैया! जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे तुम्हें अपनी बहन का अपमान याद आएगा और मेरी नाक काटनेवालों से तुम बदला ले सकोगे।’’ इसी प्रकार महाभारत काल में भगवान कृष्ण के हाथ में एक बार चोट लगने व फिर खून की धारा फूट पड़ने पर द्रौपदी ने तत्काल अपनी कंचुकी का किनारा फाड़कर भगवान कृष्ण के घाव पर बाँध दिया। कालांतर में दुःशासन द्वारा द्रौपदी-हरण के प्रयास को विफल कर उन्होंने इस रक्षा-सूत्र की लाज बचायी। द्वापर युग में ही एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि वह महाभारत के युद्ध में कैसे बचेंगे तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘‘राखी का धागा ही तुम्हारी रक्षा करेगा।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐतिहासिक युग में भी सिंकदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रूक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया। मुगल काल के दौर में जब मुगल समा्रट हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का वचन लिया। हुमायँू ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख़्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु गुजरात के बादशाह से भी युद्ध किया। इसी प्रकार न जाने कितनी मान्यतायें रक्षा बन्धन से जुड़ी हुयी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोक परम्परा में रक्षाबन्धन के दिन परिवार के पुरोहित द्वारा राजाओं और अपने यजमानों के घर जाकर सभी सदस्यों की कलाई पर मौली बाँधकर तिलक लगाने की परम्परा रही है। पुरोहित द्वारा दरवाजों, खिड़कियों, तथा नये बर्तनों पर भी पवित्र धागा बाँधा जाता है और तिलक लगाया जाता है। यही नहीं बहन-भानजों द्वारा एवं गुरूओं द्वारा शिष्यों को रक्षा सूत्र बाँधने की भी परम्परा रही है। राखी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। कई बहनों ने अपने भाईयों की कलाई पर राखी बाँधकर देश की लाज रखने का वचन लिया। 1905 में बंग-भंग आंदोलन की शुरूआत लोगों द्वारा एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बाँधकर हुयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राखी से जुड़ी एक मार्मिक घटना क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के जीवन की है। आजाद एक बार तूफानी रात में शरण लेने हेतु एक विधवा के घर पहुँचे। पहले तो उसने उन्हंे डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया पर यह पता चलने पर कि वह क्रांतिकारी आजाद है,ं ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गई। बातचीत के दौरान आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जवान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानियाँ उठानी पड़ रही हैं तो उन्होंने द्रवित होकर उससे कहा- श्मेरी गिरफ्तारी पर 5000 रूपये का इनाम है, तुम मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस इनाम से बेटी की शादी कर लो।श् यह सुन विधवा रो पड़ी व कहा- श्भैया! तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। अतः मै ऐसा हरगिज नहीं कर सकती.'' यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आजाद के हाथों में बाँधकर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखंे खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- श्अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आजाद।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के विभिन्न अंचलों में राखी पर्व को भाई-बहन के त्यौहार के अलावा भी भिन्न-भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। मुम्बई के कई समुद्री इलाकों में इसे नारियल-पूर्णिमा या कोकोनट-फुलमून के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विशेष रूप से समुद्र देवता पर नारियल चढ़ाकर उपासना की जाती है और नारियल की तीन आँखों को शिव के तीन नेत्रों की उपमा दी जाती है। बुन्देलखण्ड में राखी को कजरी-पूर्णिमा या कजरी-नवमी भी कहा जाता है। इस दिन कटोरे में जौ व धान बोया जाता है तथा सात दिन तक पानी देते हुए माँ भगवती की वन्दना की जाती है। उत्तरांचल के चम्पावत जिले के देवीधूरा में राखी-पर्व पर बाराही देवी को प्रसन्न करने के लिए पाषाणकाल से ही पत्थर युद्ध का आयोजन किया जाता रहा है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बग्वाल’ कहते हैं। सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि इस युद्ध में आज तक कोई भी गम्भीर रूप से घायल नहीं हुआ और न ही किसी की मृत्यु हुई। इस युद्ध में घायल होने वाला योद्धा सर्वाधिक भाग्यवान माना जाता है एवं युद्ध समाप्ति पश्चात पुरोहित पीले वस्त्र धारण कर रणक्षेत्र में आकर योद्धाओं पर पुष्प व अक्षत् की वर्षा कर आर्शीवाद देते हैं। इसके बाद युद्ध बन्द हो जाता है और योद्धाओं का मिलन समारोह होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रोचक घटनाक्रम में हरियाणा राज्य में अवस्थित कैथल जनपद के फतेहपुर गाँव में सन् 1857 में एक युवक गिरधर लाल को रक्षाबन्धन के दिन अंग्रेजों ने तोप से बाँधकर उड़ा दिया, इसके बाद से गाँव के लोगों ने गिरधर लाल को शहीद का दर्जा देते हुए रक्षाबन्धन पर्व मनाना ही बंद कर दिया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष पूरे होने पर सन् 2006 में जाकर इस गाँव के लोगों ने इस पर्व को पुनः मनाने का संकल्प लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रक्षाबन्धन हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय रिश्तों का अंग है। आज जरुरत है कि आडम्बरता की बजाय इस त्यौहार के पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण सम्भव होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.kkyadav.blogspot.com/"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;कृष्ण कुमार यादव&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-8095028915690725762?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/8095028915690725762/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=8095028915690725762' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8095028915690725762'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8095028915690725762'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/08/blog-post_24.html' title='मानवीय रिश्तों को एक धागे में बांधता रक्षाबन्धन पर्व'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THETfiVzc9I/AAAAAAAAApA/KgpVZVWzNX0/s72-c/rakshabandhan_rakhi_scraps20.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-3745734882458538467</id><published>2010-08-23T08:00:00.005+05:30</published><updated>2010-08-23T08:00:01.056+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ओणम'/><title type='text'>केरल, ओणम का त्यौहार और महाबली</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THEPzfwA9AI/AAAAAAAAAo4/sSu2bkJ1mn8/s1600/Onam_Festival_9834_medium.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5508201196621460482" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 313px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THEPzfwA9AI/AAAAAAAAAo4/sSu2bkJ1mn8/s400/Onam_Festival_9834_medium.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक दृष्टिकोण से केरल बहुत ही धनी राज्य है I शायद इसलिये केरल को ईश्वर का अपना देश (God’s own country) कहते है I यहां के सभी त्योहार एवं उत्सव अपने विविधतापूर्ण रंगों के लिये विख्यात है I ओणम केरल का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पर्व है I ओणम का त्योहार अपने वैभवकारी अतीत, धर्म एवं आस्था, तथा अराधना की शक्ति में विश्वास को दर्शाता है I हरेक जाति एवं धर्म के लोग इस शस्योत्सव को अति श्रद्धा एवं उल्लास से मनाते हैI दंत कथाओ के अनुसार यह त्योहार राजा महाबली के स्वागत में मनाया जाता है जो की इसी ओणम के महिने में प्रत्येक वर्ष केरल की भूमि पर भ्रमण करने आते है I&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओणम का त्योहार मलयालम कैलेंडर (कोलवर्षम) के प्रथम महिने चिंगम में मनाया जाता है I चिंगम अंग्रेजी के महिने अगस्त-सितम्बर के समतुल्य होता है I दशहरा की तरह ओणम भी दस दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है I इन दस &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THEPTiCCWJI/AAAAAAAAAow/iVW9ETmFpLc/s1600/Onamelephant%5B1%5D.png"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5508200647478106258" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 335px; CURSOR: hand; HEIGHT: 243px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THEPTiCCWJI/AAAAAAAAAow/iVW9ETmFpLc/s400/Onamelephant%5B1%5D.png" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;दिनों में प्रथम दिवस अथम और दशम दिवस थिरुओणम सबसे महत्वपूर्ण होता है I सांस्कृतिक रूप से इतना धनी होने के कारण ही ओणम उत्सव को वर्ष १९६१ में केरल का राज्यकीय त्योहार घोषित कर दिया गया I उत्कृष्त भोजन, मनभावन लोकगीत, गजनृत्य (हाथियों द्वारा किया गया नृत्य), उर्जापूर्ण खेल-कूद, नाव और फूल ये सब मिलकर इस त्योहार को मनमोहक रूप प्रदान करते है I अन्तरराष्ट्रिय स्तर पर ख्याति प्राप्त होने के कारण ही भारत सरकार द्वारा ओनम पर्व को पर्यटन सप्ताह घोषित किया जाता है I इस दौरान हजारों सैलानी पर्यटन के लिये केरल आते है I&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत मे कोई भी त्योहार हो और खाद्य सामाग्री यथा पकवान, मिठाई, और स्वादिष्ट भोजन की बात न हो तो बात कुछ अटपटी सी लगती है I इस मामले में ओणम भी अन्य त्योहारो से अलग नहीं है I ओणसद्या के बिना ओणम पर्व की बात अधूरी लगती है I ओणसद्या एक पारंपरिक भोजन है I अमीर हो या गरीब सभी के लिये यह बहुत ही महत्वपूर्ण है I मलयालम में एक कहावत है- कानम विट्टम ओणम उन्ननम अर्थात एक ओणम सद्या के लिये लोग अपनी किसी भी वस्तु को बेचने के लिये तैयार हो जाते है I ओणसद्या दक्षिण भारतीय भोजन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है I सद्या केले के पत्ते पर परोसा जाता है I कभी ओणसद्या में चौसठ तरह के पदार्थ परोसे जाते थे, पर आजकल कुल मिलाकर ग्यारह तरह की वस्तुयें हीं परोसी जाती है I&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;ओणम के त्यौहार पर आप सभी को शुभकामनायें !!&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://gulmoharkaphool.blogspot.com/2009/08/blog-post_29.html"&gt;साभार : चन्दन कुमार झा &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-3745734882458538467?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/3745734882458538467/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=3745734882458538467' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3745734882458538467'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3745734882458538467'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html' title='केरल, ओणम का त्यौहार और महाबली'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/THEPzfwA9AI/AAAAAAAAAo4/sSu2bkJ1mn8/s72-c/Onam_Festival_9834_medium.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-1777524991293157738</id><published>2010-08-15T08:05:00.000+05:30</published><updated>2010-08-15T08:05:00.451+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वतंत्रता दिवस'/><title type='text'>लोक चेतना में स्वाधीनता की लय (स्वतंत्रता दिवस पर)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/SrfVezYBDjI/AAAAAAAAAPc/eEEfXW7MFyU/s1600-h/tind2%5B1%5D.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384006604708449842" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 269px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/SrfVezYBDjI/AAAAAAAAAPc/eEEfXW7MFyU/s320/tind2%5B1%5D.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;स्वतंत्रता व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। आजादी का अर्थ सिर्फ राजनैतिक आजादी नहीं अपितु यह एक विस्तृत अवधारणा है, जिसमें व्यक्ति से लेकर राष्ट्र का हित व उसकी परम्परायें छुपी हुई हैं। कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत राष्ट्र को भी पराधीनता के दौर से गुजरना पड़ा। पर पराधीनता का यह जाल लम्बे समय तक हमें बाँध नहीं पाया और राष्ट्रभक्तों की बदौलत हम पुनः स्वतंत्र हो गये। स्वतंत्रता रूपी यह क्रान्ति करवटें लेती हुयी लोकचेतना की उत्ताल तरंगों से आप्लावित है। यह आजादी हमें यँू ही नहीं प्राप्त हुई वरन् इसके पीछे शहादत का इतिहास है। लाल-बाल-पाल ने इस संग्राम को एक पहचान दी तो महात्मा गाँधी ने इसे अपूर्व विस्तार दिया। एक तरफ सत्याग्रह की लाठी और दूसरी तरफ भगतसिंह व आजाद जैसे क्रान्तिकारियों द्वारा पराधीनता के खिलाफ दिया गया इन्कलाब का अमोघ अस्त्र अंग्रेजों की हिंसा पर भारी पड़ी और अन्ततः 15 अगस्त 1947 के सूर्योदय ने अपनी कोमल रश्मियों से एक नये स्वाधीन भारत का स्वागत किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास अपनी गाथा खुद कहता है। सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोकमानस के कंठ में, गीतों और किवदंतियों इत्यादि के माध्यम से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। लोकलय की आत्मा में मस्ती और उत्साह की सुगन्ध है तो पीड़ा का स्वाभाविक शब्द स्वर भी। कहा जाता है कि पूरे देश में एक ही दिन 31 मई 1857 को क्रान्ति आरम्भ करने का निश्चय किया गया था, पर 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे की शहादत से उठी ज्वाला वक्त का इन्तजार नहीं कर सकी और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आगाज हो गया। मंगल पाण्डे के बलिदान की दास्तां को लोक चेतना में यूँ व्यक्त किया गया है- जब सत्तावनि के रारि भइलि/ बीरन के बीर पुकार भइल/बलिया का मंगल पाण्डे के/ बलिवेदी से ललकार भइल/मंगल मस्ती में चूर चलल/ पहिला बागी मसहूर चलल/गोरनि का पलटनि का आगे/ बलिया के बाँका सूर चलल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1857 की क्रान्ति में जिस मनोयोग से पुरुष नायकों ने भाग लिया, महिलायें भी उनसे पीछे न रहीं। लखनऊ में बेगम हजरत महल तो झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई ने इस क्रान्ति की अगुवाई की। बेगम हजरत महल ने लखनऊ की हार के बाद अवध के ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर क्रान्ति की चिन्गारी फैलाने का कार्य किया- मजा हजरत ने नहीं पाई/ केसर बाग लगाई/कलकत्ते से चला फिरंगी/ तंबू कनात लगाई/पार उतरि लखनऊ का/ आयो डेरा दिहिस लगाई/आसपास लखनऊ का घेरा/सड़कन तोप धराई। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी वीरता से अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। झाँसी की रानी’ नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चैहान उनकी वीरता का बखान करती ह,ैं पर उनसे पहले ही बुंदेलखण्ड की वादियों में दूर-दूर तक लोक लय सुनाई देती है- खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी/पुरजन पुरजन तोपें लगा दई, गोला चलाए असमानी/ अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी/सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी/......छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंगाल विभाजन के दौरान 1905 में स्वदेशी-बहिष्कार-प्रतिरोध का नारा खूब चला। अंग्रेजी कपड़ों की होली जलाना और उनका बहिष्कार करना देश भक्ति का शगल बन गया था, फिर चाहे अंग्रेजी कपड़ों में ब्याह रचाने आये बाराती ही हों- फिर जाहु-फिरि जाहु घर का समधिया हो/मोर धिया रहिहैं कुंआरि/ बसन उतारि सब फेंकहु विदेशिया हो/ मोर पूत रहिहैं उघार/ बसन सुदेसिया मंगाई पहिरबा हो/तब होइहै धिया के बियाह। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता व नृशंसता का नमूना था। इस हत्याकाण्ड ने भारतीयों विशेषकर नौजवानों की आत्मा को हिलाकर रख दिया। गुलामी का इससे वीभत्स रूप हो भी नहीं सकता। सुभद्राकुमारी चैहान ने ‘जलियावाले बाग में वसंत’ नामक कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की है-कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर/कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर/आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं/अपने प्रिय-परिवार देश से भिन्न हुए हैं/कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना/करके उनकी याद अश्रु की ओस बहाना/तड़प-तड़पकर वृद्ध मरे हैं गोली खाकर/शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जाकर/यह सब करना, किन्तु बहुत धीरे-से आना/यह है शोक-स्थान, यहाँ मत शोर मचाना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी क्रान्ति बिना खून के पूरी नहीं होती, चाहे कितने ही बड़े दावे किये जायें। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक ऐसा भी दौर आया जब कुछ नौजवानों ने अंग्रेजी हुकूमत की चूल हिला दी, नतीजन अंग्रेजी सरकार उन्हें जेल में डालने के लिये तड़प उठी। उस समय अंग्रेजी सैनिकों की पदचाप सुनते ही बहनें चैकन्नी हो जाती थीं। तभी तो सुभद्राकुमारी चैहान ने ‘बिदा’ में लिखा कि- गिरतार होने वाले हैं/आता है वारंट अभी/धक्-सा हुआ हृदय, मैं सहमी/हुए विकल आशंक सभी/मैं पुलकित हो उठी! यहाँ भी/आज गिरतारी होगी/फिर जी धड़का, क्या भैया की /सचमुच तैयारी होगी। आजादी के दीवाने सभी थे। हर पत्नी की दिली तमन्ना होती थी कि उसका भी पति इस दीवानगी में शामिल हो। तभी तो पत्नी पति के लिए गाती है- जागा बलम् गाँधी टोपी वाले आई गइलैं..../राजगुरू सुखदेव भगत सिंह हो/तहरे जगावे बदे फाँसी पर चढ़ाय गइलै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरदार भगत सिंह क्रान्तिकारी आन्दोलन के अगुवा थे, जिन्होंने हँसते-हँसते फासी के फन्दों को चूम लिया था। एक लोकगायक भगत सिंह के इस तरह जाने को बर्दाश्त नहीं कर पाता और गाता है- एक-एक क्षण बिलम्ब का मुझे यातना दे रहा है/तुम्हारा फंदा मेरे गरदन में छोटा क्यों पड़ रहा है/मैं एक नायक की तरह सीधा स्वर्ग में जाऊँगा/अपनी-अपनी फरियाद धर्मराज को सुनाऊँगा/मैं उनसे अपना वीर भगत सिंह मांँग लाऊँगा। इसी प्रकार चन्द्रशेखर आजाद की शहादत पर उन्हें याद करते हुए एक अंगिका लोकगीत में कहा गया- हौ आजाद त्वौं अपनौ प्राणे कऽ /आहुति दै के मातृभूमि कै आजाद करैलहों/तोरो कुर्बानी हम्मै जिनगी भर नैऽ भुलैबे/देश तोरो रिनी रहेते। सुभाष चन्द्र बोस ने नारा दिया कि- ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हंे आजादी दूंगा, फिर क्या था पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी उनकी फौज में शामिल होने के लिए बेकरार हो उठेे- हरे रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजायी रे हारी/कड़ा-छड़ा पैंजनिया छोड़बै, छोड़बै हाथ कंगनवा रामा/ हरे रामा, हाथ में झण्डा लै के जुलूस निकलबैं रे हारी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महात्मा गाँधी आजादी के दौर के सबसे बड़े नेता थे। चरखा कातने द्वारा उन्होेंने स्वावलम्बन और स्वदेशी का रूझान जगाया। नौजवान अपनी-अपनी धुन में गाँधी जी को प्रेरणास्त्रोत मानते और एक स्वर में गाते- अपने हाथे चरखा चलउबै/हमार कोऊ का करिहैं/गाँधी बाबा से लगन लगउबै/हमार कोई का करिहैं। 1942 में जब गाँधी जी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का आह्वान किया तो ऐसा लगा कि 1857 की क्रान्ति फिर से जिन्दा हो गयी हो। क्या बूढ़े, क्या नवयुवक, क्या पुरुष, क्या महिला, क्या किसान, क्या जवान...... सभी एक स्वर में गाँधी जी के पीछे हो लिये। ऐसा लगा कि अब तो अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही होगा। गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ ने इस ज्वार को महसूस किया और इस जन क्रान्ति को शब्दों से यूँ सँवारा- बीसवीं सदी के आते ही, फिर उमड़ा जोश जवानों में/हड़कम्प मच गया नए सिरे से, फिर शोषक शैतानों में/सौ बरस भी नहीं बीते थे सन् बयालीस पावन आया/लोगों ने समझा नया जन्म लेकर सन् सत्तावन आया/आजादी की मच गई धूम फिर शोर हुआ आजादी का/फिर जाग उठा यह सुप्त देश चालीस कोटि आबादी का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत माता की गुलामी की बेड़ियाँ काटने में असंख्य लोग शहीद हो गये, बस इस आस के साथ कि आने वाली पीढ़ियाँ स्वाधीनता की बेला में साँस ले सकें। इन शहीदों की तो अब बस यादें बची हैं और इनके चलते पीढ़ियाँ मुक्त जीवन के सपने देख रही हैं। कविवर जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ इन कुर्बानियों को व्यर्थ नहीं जाने देते- शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले/वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा/कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे/जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमाँ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश आजाद हुआ। 15 अगस्त 1947 के सूर्योदय की बेला में विजय का आभास हो रहा था। फिर कवि लोकमन को कैसे समझाता। आखिर उसके मन की तरंगें भी तो लोक से ही संचालित होती हैं। कवि सुमित्रानन्दन पंत इस सुखद अनुभूति को यूँ सँजोते हैं-चिर प्रणम्य यह पुण्य अहन्, जय गाओ सुरगण/आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन/नव भारत, फिर चीर युगों का तमस आवरण/तरुण-अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन/सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन/आज खुले भारत के संग भू के जड़ बंधन/शांत हुआ अब युग-युग का भौतिक संघर्षण/मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण! देश आजाद हो गया, पर अंग्रेज इस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। एक तरफ आजादी की उमंग, दूसरी तरफ गुलामी की छायाओं का डर......गिरिजाकुमार माथुर ‘पन्द्रह अगस्त’ की बेला पर उल्लास भी व्यक्त करते हैं और सचेत भी करते हैं-आज जीत की रात, पहरुए, सावधान रहना/खुले देश के द्वार, अचल दीपक समान रहना/ऊँची हुई मशाल हमारी, आगे कठिन डगर है/शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है/शोषण से मृत है समाज, कमजोर हमारा घर है/किन्तु आ रही नई जिंदगी, यह विश्वास अमर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्रता की कहानी सिर्फ एक गाथा भर नहीं है बल्कि एक दास्तान है कि क्यों हम बेड़ियों में जकड़े, किस प्रकार की यातनायें हमने सहीं और शहीदों की किन कुर्बानियों के साथ हम आजाद हुये। यह ऐतिहासिक घटनाक्रम की मात्र एक शोभा यात्रा नहीं अपितु भारतीय स्वाभिमान का संघर्ष, राजनैतिक दमन व आर्थिक शोषण के विरूद्ध लोक चेतना का प्रबुद्ध अभियान एवं सांस्कृतिक नवोन्मेष की दास्तान है। जरूरत है हम अपनी कमजोरियों का विश्लेषण करें, तद्नुसार उनसे लड़ने की चुनौतियाँ स्वीकारें और नए परिवेश में नए जोश के साथ आजादी के नये अर्थों के साथ एक सुखी व समृद्ध भारत का निर्माण करें।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-1777524991293157738?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/1777524991293157738/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=1777524991293157738' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1777524991293157738'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/1777524991293157738'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2009/08/blog-post_15.html' title='लोक चेतना में स्वाधीनता की लय (स्वतंत्रता दिवस पर)'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/SrfVezYBDjI/AAAAAAAAAPc/eEEfXW7MFyU/s72-c/tind2%5B1%5D.gif' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-4259407125920949328</id><published>2010-08-14T10:54:00.000+05:30</published><updated>2010-08-14T10:54:53.100+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नागपंचमी'/><title type='text'>नागपंचमी पर भिन्न-भिन्न परम्पराएँ</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TGYoALl-IHI/AAAAAAAAAnQ/XoWgREoxHIE/s1600/india_snake_charmer%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5505131578084171890" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 281px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TGYoALl-IHI/AAAAAAAAAnQ/XoWgREoxHIE/s400/india_snake_charmer%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आज नागपंचमी का दिन है. इस दिन ब्रम्ह मुहूर्त में स्नान कर घर के दरवाजे पर या पूजा के स्थान पर गोबर से नाग बनाया जाता है। दूध, दुबी, कुशा, चंदन, अक्षत, पुष्प आदि से नाग देवता की पूजा की जाती है लड्डू और मालपुआ का भोग बनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सर्प को दूध से स्नान कराने से सांप का भय नहीं रहता । आज के दिन सपेरे भी घूम-घूम कर नाग देवता के दर्शन कराते हैं.ऐसा माना जाता है कि जिनके कुंडली में कालसर्प का योग रहता है उसे विशेषकर इस दिन नागदेवता की पूजा करनी चाहिए। पश्चिम बंगाल और असम तथा उड़ीसा के कुछ भागों में इस दिन नागों की देवी मां मनसा की अराधना की जाती है। केरला के मंदिरों में इस दिन शेषनाग की विशेष पूजा अर्चना होती है। इस दिन कुछ प्रान्तों में सरस्वती देवी की भी पूजा की जाती है और बौद्धिक कार्य किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि अगर इस दिन घर की महिलाएं उपवास रखें और विधि विधान से नाग देवता की पूजा करें तो परिवार को सर्पदंश का भय नहीं रहता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नागपंचमी का त्योहार यूँ तो हर वर्ष देश के विभिन्न भागों में मनाया जाता है लेकिन उत्तरप्रदेश में इसे मनाने का ढंग कुछ अनूठा है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को इस त्योहार पर राज्य में गुडि़या को पीटने की अनोखी परम्परा है. नागपंचमी को महिलाएँ घर के पुराने कपडों से गुड़िया बनाकर चौराहे पर डालती हैं और बच्चे उन्हें कोड़ो और डंडों से पीटकर खुश होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस परम्परा की शुरूआत के बारे में एक कथा प्रचलित है। तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। समय बीतने पर तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में ब्याही गई। उस कन्या ने ससुराल में एक महिला को यह रहस्य बताकर उससे इस बारे में किसी को भी नहीं बताने के लिए कहा लेकिन उस महिला ने दूसरी महिला को यह बात बता दी और उसने भी उससे यह राज किसी से नहीं बताने के लिए कहा। लेकिन धीरे-धीरे यह बात पूरे नगर में फैल गई।&lt;br /&gt;तक्षक के तत्कालीन राजा ने इस रहस्य को उजागर करने पर नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया। वह इस बात से क्रुद्ध हो गया था कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती है। तभी से नागपंचमी पर गुड़िया को पीटने की परम्परा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दिन लोग अपने घरों की दीवारों पर नागों और साँपों की आकृति बनाकर उनकी पूजा करते हैं और घर में सुख-शांति और समृद्धि के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं। नाग का दर्शन करना इस दिन शुभ माना जाता है। सपेरे नाग लेकर घर-घर जाते हैं और लोगों को उनके दर्शन करवा कर अच्छी खासी आमदनी करते हैं। इसके अलावा इस त्योहार पर जगह- जगह मेले लगते है और दंगल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। जिसमें पहलवान अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;नागपंचमी पर्व पर आप सभी को शुभकामनायें !!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-4259407125920949328?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/4259407125920949328/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=4259407125920949328' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4259407125920949328'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4259407125920949328'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html' title='नागपंचमी पर भिन्न-भिन्न परम्पराएँ'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TGYoALl-IHI/AAAAAAAAAnQ/XoWgREoxHIE/s72-c/india_snake_charmer%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-5556142003207733663</id><published>2010-08-01T07:55:00.000+05:30</published><updated>2010-08-01T07:55:00.785+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ्रेंडशिप-डे (अगस्त का प्रथम रविवार)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>फ्रेण्डशिप-डे: ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TE7J4oD9rUI/AAAAAAAAAlc/yOO3hoBS5SU/s1600/Friendship+Day.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5498554169729854786" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 285px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TE7J4oD9rUI/AAAAAAAAAlc/yOO3hoBS5SU/s320/Friendship+Day.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; मित्रता किसे नहीं भाती। यह अनोखा रिश्ता ही ऐसा है जो जाति, धर्म, लिंग, हैसियत कुछ नहीं देखता, बस देखता है तो आपसी समझदारी और भावों का अटूट बन्धन। कृष्ण-सुदामा की मित्रता को कौन नहीं जानता। ऐसे ही तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं जहाँ मित्रता ने हार जीत के अर्थ तक बदल दिये। सिकन्दर-पोरस का संवाद इसका जीवंत उदाहरण है। मित्रता या दोस्ती का दायरा इतना व्यापक है कि इसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। दोस्ती वह प्यारा सा रिश्ता है जिसे हम अपने विवेक से बनाते हैं। अगर दो दोस्तों के बीच इस जिम्मेदारी को निभाने में जरा सी चूक हो जाए तो दोस्ती में दरार आने में भी ज्यादा देर नहीं लगती। सच्चा दोस्त जीवन की अमूल्य निधि होता है। दोस्ती को लेकर तमाम फिल्में भी बनी और कई गाने भी मशहूर हुए-ये तेरी मेरी यारी/ये दोस्ती हमारी/भगवान को पसन्द है/अल्लाह को है प्यारी। ऐसे ही एक अन्य गीत है-ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे/छोड़ेंगे दम मगर/तेरा साथ न छोड़ेंगे। हाल ही में रिलीज हुई एक अन्य फिल्म के गीतों पर गौर करें- आजा मैं हवाओं में बिठा के ले चलूँ/ तू ही-तू ही मेरा दोस्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्ती की बात पर याद आया कि &lt;strong&gt;अगस्त माह का प्रथम रविवार फ्रेंडशिप डे के रूप में&lt;/strong&gt; मनाया जाता है. आज 1अगस्त को ‘फ्रेण्डशिप-डे‘ है। फ्रेण्डशिप कार्ड, क्यूट गिफ्ट्स और फ्रेण्डशिप बैण्ड से इस समय सारा बाजार पटा पड़ा है। हर कोई एक अदद अच्छे दोस्त की तलाश में है, जिससे वह अपने दिल की बातें शेयर कर सके। पर अच्छा दोस्त मिलना वाकई एक मुश्किल कार्य है। दोस्ती की कस्में खाना तो आसान है पर निभाना उतना ही कठिन। आजकल तो लोग दोस्ती में भी गिरगिटों की तरह रंग बदलते रहते हैं। पर किसी शायर ने भी खूब लिखा है-दुश्मनी जमकर करो/लेकिन ये गुंजाइश रहे/कि जब कभी हम दोस्त बनें/तो शर्मिन्दा न हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल, फ्रेण्डशिप-डे की बात करें तो यह अगस्त माह के प्रथम रविवार को सेलीबे्रट किया जाता है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा 1935 में अगस्त माह के प्रथम रविवार को दोस्तों के सम्मान में ‘राष्ट्रीय मित्रता दिवस‘ के रूप में मनाने का फैसला लिया गया था। इस अहम दिन की शुरूआत का उद्देश्य प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उपजी कटुता को खत्म कर सबके साथ मैत्रीपूर्ण भाव कायम करना था। पर कालान्तर में यह सर्वव्यापक होता चला गया। दोस्ती का दायरा समाज और राष्ट्रों के बीच ज्यादा से ज्यादा बढ़े, इसके मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र संघ ने बकायदा 1997 में लोकप्रिय कार्टून कैरेक्टर विन्नी और पूह को पूरी दुनिया के लिए दोस्ती के राजदूत के रूप में पेश किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फ्रेण्डशिप-डे पर बस यही कहूंगी कि सच्चा दोस्त वही होता है जो अपने दोस्त का सही मायनों में विश्वासपात्र होता है। अगर आप सच्चे दोस्त बनना चाहते हैं तो अपने दोस्त की तमाम छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी बातों को उसके साथ तो शेयर करो लेकिन लोगों के सामने उसकी कमजोरी या कमी का बखान कभी न करो। नही तो आपके दोस्त का विश्वास उठ जाएगा क्योंकि दोस्ती की सबसे पहली शर्त होती है विश्वास। हाँ, एक बात और। उन पुराने दोस्तों को विश करना न भूलें जो हमारे दिलों के तो करीब हैं, पर रहते दूरियों पर हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-5556142003207733663?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/5556142003207733663/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=5556142003207733663' title='19 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5556142003207733663'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5556142003207733663'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='फ्रेण्डशिप-डे: ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TE7J4oD9rUI/AAAAAAAAAlc/yOO3hoBS5SU/s72-c/Friendship+Day.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-6415826661677456030</id><published>2010-07-27T10:02:00.000+05:30</published><updated>2010-07-27T10:03:09.652+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रावण मास'/><title type='text'>सावन आया झूम के...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE5hK1OEGjI/AAAAAAAAAn0/J5MIBahA0PQ/s1600/shanker-iv[1].jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5498439033778608690" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 115px; CURSOR: hand; HEIGHT: 129px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE5hK1OEGjI/AAAAAAAAAn0/J5MIBahA0PQ/s400/shanker-iv%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; सावन मास आज 27 जुलाई से आरंभ हो गया और 24 अगस्त तक रहेगा। सावन मास को श्रावण भी कहा जाता है। यह महीना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान भक्ति, आराधना तथा प्रकृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। यह महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए विशेष माना जाता है। ऐसा मन जाता है कि इस मास में विधिपूर्वक शिव उपासना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। सावन मास कि अपनी महत्ता है. इसी सावन मास के दौरान ही कई प्रमुख त्योहार जैसे- हरियाली अमावस्या, नागपंचमी तथा रक्षा बंधन आदि भी आते हैं। सावन में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है इसलिए यह भी कहा जाता कि यह महीना प्रकृति को समझने व उसके निकट जाने का है। सावन की रिमझिम बारिश और प्राकृतिक वातावरण बरबस में मन में उल्लास व उमंग भर देती है। सावन में ही महिलाएं कजरी-गायन कर खूब रंग बिखेरती हैं। सावन का महीना पूरी तरह से शिव तथा प्रकृति को समर्पित है.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे देव उमा पतिम् सुरगुरुम् ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे जगत कारणम् ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे पन्नग भूषणम्मृगधरम् ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे पशुनाम पतिम ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे सूर्य शशांक वन्हिनयनम् ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे मुकन्द प्रियम् ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे भक्तजनाश्रयन्चवर्धम् ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वन्दे शिवम् शंकरम् ।। ।। जय शंकर ।।।। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जय भोले नाथ ।।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;भगवान शिव का नमन करते हुए आपको श्रावण मास के इस पावन पर्व पर हार्दिक बधाई। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-6415826661677456030?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/6415826661677456030/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=6415826661677456030' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6415826661677456030'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6415826661677456030'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/07/blog-post_27.html' title='सावन आया झूम के...'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TE5hK1OEGjI/AAAAAAAAAn0/J5MIBahA0PQ/s72-c/shanker-iv%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-6423359568797714125</id><published>2010-07-25T23:59:00.000+05:30</published><updated>2010-07-26T09:09:58.826+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गुरु पूर्णिमा'/><title type='text'>गुरु गोविन्द दोऊ खड़े (गुरु पूर्णिमा पर विशेष)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TE0CwZ0sk5I/AAAAAAAAAlE/euQgNHWquKg/s1600/470_111834%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5498053750678131602" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 221px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TE0CwZ0sk5I/AAAAAAAAAlE/euQgNHWquKg/s320/470_111834%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; "गुरुतर महत्ता का प्रतीयमान 'गुरु' शब्द स्वयं में ही अलौकिक श्रद्धा का प्रतीक है । विश्वगुरु भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परम्परा पर समय समय पर अपसंस्कृति की धूल जमने का प्रयास करती रही है किंतु इसकी शाश्वत उज्ज्वलता आज भी विद्यमान है। अब तो गुरु-वंदना में अखिल विश्व भारत का अनुसरण कर रहा है। जो अखंड ब्रह्माण्ड रूप में चर और अचर सब में व्याप्त है, जो ब्रह्मा, विष्णु और देवाधि देव महेश हैं, उन्हें हमरा सत सत नमन ! "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाय।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;बलिहारीगुरु&lt;/span&gt; आपकी गोविन्द दियो मिलाय।।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संत कबीर दास की ये पंक्तियां हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति में गुरु के महत्व को अभिव्यक्त करती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी बात मैं उपनिशद की एक कहानी से शुरु करता हूं। एक राजा का बेटा रास्ता भूल-भटक कर एक जंगल में पहुंच गया। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। जंगली पशुओं के बीच रह कर वह दीन-हीन जीवन बिता रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयोग से उधर रहते एक साधु की नज़र उस पर पड़ी। उस साधु ने उसे राजा का बेटा होने की बात याद दिलाई। और उसे उसके पिता के राज्य तक लौटने का रास्ता बता दिया। बस क्या था! वह पूछते-पाछते अपने पिता के राज्य में पहुंच गया और पिता का उत्तराधिकार राज्य के रूप में पाकर सुखी जीवन बिताने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कहानी से यह स्पष्ट है कि भूला-भटका भी यदि समुचित मार्ग-दर्शन पा ले तो सही गंतव्य तक पहुंच सकता है। आज का मानव दुखी-दीन बना हुआ है। उसे अपने स्थान तक पहुँचाने वाला कोई मर्गदर्शक नहीं मिला है, अगर मिला है तो उस गुरु की वाणी पर सत्यनिष्ठा का अभाव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन्त कबीरदास ने गुरु को कुम्हार और शिष्य को घड़ा का प्रतिरूप बताते हुए कहा है –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;गुरु कुम्हार सिख कुंभ है, गढ़ि- गढ़ि काढय खोट।&lt;br /&gt;अन्तर हाथ-सहार दय, बाहर- बाहर चोट॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अर्थात सद्गुरु अपनी कृपा से सर्वथा तुच्छ और तिरस्कारपात्र व्यक्ति को भी आदर का पात्र बना देते हैं, जिस प्रकार कुम्हार घड़ा बनाते समय बांया हाथ घड़े के पेट में लगाए रहता है और दाएं हाथ से थापी पीट-पीट कर उसे सुडौल-सुघड़ गढ डालता है, ठीक उसी प्रकार गुरु करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे गुरु को यदि सामान्य जन न समझे तो कबीर उसे अंधा मानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कबिरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और।&lt;br /&gt;हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहि ठौर॥&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरु की प्राप्ति सबसे बड़ी उपलब्धि है और गुरु के लिए कुछ भी अदेय नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।&lt;br /&gt;शीश दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस संसार के विष से भरे जीवन को अपनी सिद्धि और करुणा के सहारे गुरु अमृतमय बनाकर हमें हमारे लक्ष्य तक पहुंचा देता है। इसीलिए हर साधक गुरु को ब्रह्मा, गुरु को ही विष्णु और गुरु को ही सदा शिव, बल्कि यहां तक कि गुरु को ही परब्रह्म के रूप में नमन करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।&lt;br /&gt;गुरुः साक्षातपरंब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;गुरु की महिमा अपरंपार है। उसे मैं तुच्छ क्या समेट सकता हूं इस आलेख के द्वारा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;सब धरती कागद करूं, लेखनि सब बन राय।&lt;br /&gt;सात समुद की मसि करूं गुरु गुन लिखा न जाए॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;गुरु के अलावा साधक का पथ-प्रदर्शक कोई नहीं होता। सिद्धि दिलाना तो गुरु के हाथों में होता है। गुरु वही है जो शिष्यों को समझाने में दक्ष है। “गु” शब्द का अर्थ है, “अज्ञान” और “गुफा” और “रु” शब्द का अर्थ है “प्रकाश”। गुरु शिष्य के हृदय के अज्ञान के अंधकार को ज्ञान-रूपी प्रकाश से उज्ज्वल बनता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो दिव्यात्मा हमें मनुष्यत्व से देवत्व में परिवर्तित कराने में सामर्थ्यवान होता है वही गुरु है। यदि शिष्य गुरु की आवश्यकता को सही प्रकार से समझता है और उसकी पूर्ति के लिए प्राणपण से संलग्न रहता है तो उसकी कोई विशेष अनुष्ठान व साधना की आवश्यकता नहीं पड़ती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;ध्यानमूलं गुरोर्मूर्त्ति पूजामूलं गुरोःपदम।&lt;br /&gt;मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥&lt;br /&gt;हे गुरु आपको बार-बार नमस्कार है।&lt;br /&gt;अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम।&lt;br /&gt;तत्पददर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://manojiofs.blogspot.com/2010/07/blog-post_25.html"&gt;&lt;strong&gt;(साभार : मनोज )&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-6423359568797714125?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/6423359568797714125/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=6423359568797714125' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6423359568797714125'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6423359568797714125'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='गुरु गोविन्द दोऊ खड़े (गुरु पूर्णिमा पर विशेष)'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TE0CwZ0sk5I/AAAAAAAAAlE/euQgNHWquKg/s72-c/470_111834%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-3410494902096883879</id><published>2010-06-26T18:45:00.005+05:30</published><updated>2011-06-24T13:22:33.824+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस (26 जून)'/><title type='text'>अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस : स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TCX-TBslDAI/AAAAAAAAAjM/SEwCg9tPMc0/s1600/300px-Smoking_Crack%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; FLOAT: left; HEIGHT: 225px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487071323847199746" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TCX-TBslDAI/AAAAAAAAAjM/SEwCg9tPMc0/s320/300px-Smoking_Crack%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;मादक पदार्थों व नशीली वस्तुओं के निवारण हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसंबर, 1987 को प्रस्ताव संख्या 42/112 पारित कर हर वर्ष 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस मानाने का निर्णय लिया. यह एक तरफ लोगों में चेतना फैलाता है, वहीँ नशे के लती लोगों के उपचार की दिशा में भी सोचता है.इस वर्ष का विषय है- ''स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें." आजकी पोस्ट इसी विषय पर-&lt;br /&gt;**********************************************************************&lt;br /&gt;मादक पदार्थों के नशे की लत आज के युवाओं में तेजी से फ़ैल रही है. कई बार फैशन की खातिर दोस्तों के उकसावे पर लिए गए ये मादक पदार्थ अक्सर जानलेवा होते हैं. कुछ बच्चे तो फेविकोल, तरल इरेज़र, पेट्रोल कि गंध और स्वाद से आकर्षित होते हैं और कई बार कम उम्र के बच्चे आयोडेक्स, वोलिनी जैसी दवाओं को सूंघकर इसका आनंद उठाते हैं. कुछ मामलों में इन्हें ब्रेड पर लगाकर खाने के भी उदहारण देखे गए हैं. मजाक-मजाक और जिज्ञासावश किये गए ये प्रयोग कब कोरेक्स, कोदेन, ऐल्प्राजोलम, अल्प्राक्स, कैनेबिस जैसे दवाओं को भी घेरे में ले लेते हैं, पता ही नहीं चलता. फिर स्कूल-कालेजों य पास पड़ोस में गलत संगति के दोस्तों के साथ ही गुटखा, सिगरेट, शराब, गांजा, भांग, अफीम और धूम्रपान सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं के सेवन की ओर अपने आप कदम बढ़ जाते हैं. पहले उन्हें मादक पदार्थ फ्री में उपलब्ध कराकर इसका लती बनाया जाता है और फिर लती बनने पर वे इसके लिए चोरी से लेकर अपराध तक करने को तैयार हो जाते हैं.नशे के लिए उपयोग में लाई जानी वाली सुइयाँ HIV का कारण भी बनती हैं, जो अंतत: एड्स का रूप धारण कर लेती हैं. कई बार तो बच्चे घर के ही सदस्यों से नशे की आदत सीखते हैं. उन्हें लगता है कि जो बड़े कर रहे हैं, वह ठीक है और फिर वे भी घर में ही चोरी आरंभ कर देते हैं. चिकित्सकीय आधार पर देखें तो अफीम, हेरोइन, चरस, कोकीन, तथा स्मैक जैसे मादक पदार्थों से व्यक्ति वास्तव में अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है एवं पागल तथा सुप्तावस्था में हो जाता है। ये ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ है जिनकी लत के प्रभाव में व्यक्ति अपराध तक कर बैठता है। मामला सिर्फ स्वास्थ्य से नहीं अपितु अपराध से भी जुड़ा हुआ है. कहा भी गया है कि जीवन अनमोल है। नशे के सेवन से यह अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में भारत हेरोइन का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है और ऐसा लगता है कि वह खुद भी अफीम पोस्त का उत्पादन करता है. गौरतलब है कि अफीम से ही हेरोइन बनती है. अपने देश के कुछ भागों में धड़ल्ले से अफीम की खेती की जाती है और पारंपरिक तौर पर इसके बीज 'पोस्तो' से सब्जी भी बने जाती है. पर जैसे-जैसे इसका उपयोग एक मादक पदार्थ के रूप में आरंभ हुआ, यह खतरनाक रूप अख्तियार करता गया. वर्ष 2001 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में भारतीय पुरुषों में अफीम सेवन की उच्च दर 12 से 60 साल की उम्र तक के लोगों में 0.7 प्रतिशत प्रति माह देखी गई. इसी प्रकार 2001 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार ही 12 से 60 वर्ष की पुरुष आबादी में भांग का सेवन करने वालों की दर महीने के हिसाब से तीन प्रतिशत मादक पदार्थ और अपराध मामलों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय [यूएनओडीसी] की रिपोर्ट के ही अनुसार भारत में जिस अफीम को हेरोइन में तब्दील नहीं किया जाता उसका दो तिहाई हिस्सा पांच देशों में इस्तेमाल होता है। ईरान 42 प्रतिशत, अफगानिस्तान सात प्रतिशत, पाकिस्तान सात प्रतिशत, भारत छह प्रतिशत और रूस में इसका पांच प्रतिशत इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2008 में 17 मीट्रिक टन हेरोइन की खपत की और वर्तमान में उसकी अफीम की खपत अनुमानत: 65 से 70 मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। कुल वैश्विक उपभोग का छह प्रतिशत भारत में होने का मतलब कि भारत में 1500 से 2000 हेक्टेयर में अफीम की अवैध खेती होती है, जो वाकई चिंताजनक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नशे से मुक्ति के लिए समय-समय पर सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएं पहल करती रहती हैं. पर इसके लिए स्वयं व्यक्ति और परिवार जनों की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है. अभिभावकों को अक्सर सुझाव दिया जाता है कि वे अपने बच्चों पर नजर रखें और उनके नए मित्र दिखाई देने, क्षणिक उत्तेजना या चिडचिडापन होने, जेब खर्च बढने, देर रात्रि घर लौटने, थकावट, बेचैनी, अर्द्धनिद्राग्रस्त रहने, बोझिल पलकें, आँखों में चमक व चेहरे पर भावशून्यता, आँखों की लाली छिपाने के लिए बराबर धूप के चश्मे का प्रयोग करते रहने, उल्टियाँ होने, निरोधक शक्ति कम हो जाने के कारण अक्सर बीमार रहने, परिवार के सदस्यों से दूर-दूर रहने, भूख न लगने व वजन के निरंतर गिरने, नींद न आने, खांसी के दौरे पड़ने, अल्पकालीन स्मृति में ह्रास, त्वचा पर चकते पड़ जाने, उंगलियों के पोरों पर जले का निशान होने, बाँहों पर सुई के निशान दिखाई देने, ड्रग न मिलने पर आंखों-नाक से पानी बहने-शरीर में दर्द-खांसी-उल्टी व बेचैनी होने, व्यक्तिगत सफाई पर ध्यान न देने, बाल-कपड़े अस्त व्यस्त रहने, नाखून बढे रहने, शौचालय में देर तक रहने, घरेलू सामानों के एक-एक कर गायब होते जाने आदत के तौर पर झूठ बोलने, तर्क-वितर्क करने, रात में उठकर सिगरेट पीने, मिठाईयों के प्रति आकर्षण बढ जाने, शैक्षिक उपलब्धियों में लगातार गिरावट आते जाने, स्कूल कालेज में उपस्थिति कम होते जाने, प्रायः जल्दबाजी में घर से बाहर चले जाने एवं कपडों पर सिगरेट के जले छिद्र दिखाई देने जैसे लक्षणों के दिखने पर सतर्क हो जाएँ. यह बच्चों के मादक-पदार्थों का व्यसनी होने की निशानी है. यही नहीं यदि उनके व्यक्तिगत सामान में अचानक माचिस,मोमबत्ती,सिगरेट का तम्बाकू, 3 इंच लम्बी शीशे की ट्यूब,एल्मूनियम फॉयल, सिरिंज, हल्का भूरा सफेद पाउडर मिलता है तो निश्चित जान लें कि वह ड्रग्स का शिकार है और तत्काल इस सम्बन्ध में कदम उठाने की जरुरत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मादक पदार्थों और नशा के सम्बन्ध में जागरूकता के लिए तमाम दिवस, मसलन- 31 मई को अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध दिवस, 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस, गाँधी जयंती पर 2 से 8 अक्टूबर मद्यनिषेध सप्ताह और 18दिसम्बर को मद्य निषेध दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है. मादक पदार्थों का नशा सिर्फ स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि सामाजिक-आर्थिक-पारिवारिक- मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है. जरुरत इससे भागने की नहीं इसे समझने व इसके निवारण की है. मात्र दिवसों पर ही नहीं हर दिन इसके बारे में सोचने की जरुरत है अन्यथा देश की युवा पीढ़ी को यह दीमक की तरह खोखला कर देगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(इस लेख को &lt;a href="http://shabdshikhar.blogspot.com/2010/06/blog-post_26.html"&gt;शब्द-शिखर &lt;/a&gt;पर भी पढ़ें)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-3410494902096883879?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/3410494902096883879/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=3410494902096883879' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3410494902096883879'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3410494902096883879'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_26.html' title='अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस : स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/TCX-TBslDAI/AAAAAAAAAjM/SEwCg9tPMc0/s72-c/300px-Smoking_Crack%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-8971161592261959509</id><published>2010-06-21T16:26:00.000+05:30</published><updated>2010-06-28T13:48:20.227+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व संगीत दिवस (21 जून )'/><title type='text'>सात सुर..एक कायनात..एक सी लय-ताल (विश्व संगीत दिवस)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChZxJC8LlI/AAAAAAAAAmg/IoZCKmqPBnE/s1600/Music.bmp"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; FLOAT: left; HEIGHT: 144px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487734846727663186" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChZxJC8LlI/AAAAAAAAAmg/IoZCKmqPBnE/s320/Music.bmp" /&gt;&lt;/a&gt; संगीत भला किसे अच्छा नहीं लगता. कहते हैं कि संगीत प्राचीन काल से ही विभिन्न संस्कृतियों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम बखूबी कर रही है। वास्तव में देखा जय तो हर जगह भाषा, पहनावा और खानपान भले ही अलग हो, लेकिन हर देश के संगीत में सभी सात सुर एक जैसे ही होते हैं और लय-ताल भी एक सी होती है। इसी भावना को समाहित करते हुए सभी देशों के बीच संगीत के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए 1982 से हर वर्ष 21 जून को विश्व संगीत दिवस मनाया जाता है. सबसे पहले फ्रांस से इसकी शुरुआत फेटे डी ला म्यूजिके के रूप में हुई। धीरे-धीरे इसके सुर हर देश में अपने रंग बिखेरने लगे. भारत के मशहूर सरोद वादक अयान अली खान की मानें तो -''पूरी दुनिया सात बुनियादी सुर और कुल 12 सुरों तथा एक ही जैसी लय-ताल की मौसिकी को सुनती-सुनाती है। चाहे कोई भी देश हो, हमने इसमें फर्क नहीं देखा।''&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अजीम सरोद नवाज उस्ताद अमजद अली खान के पुत्र और शिष्य अयान सही फरमाते हैं कि-'' अर्थशास्त्र की भाषा में आजकल ग्लोबल विलेज अवधारणा की बात की जाती है, लेकिन मौसिकी के लिहाज से तो दुनिया बरसों से ग्लोबल विलेज थी।'' दुनिया भर में संगीत की यही खासियत है कि आप कहीं भी चलें जाएं या कोई भी संगीत सुनें तो आपको उसकी बुनियाद एक सी मिलेगी। अयान बताते हैं, हालिया वर्र्षो में बड़े-बड़े फनकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को दूसरे देशों के संगीत के साथ जोड़ने के लिए पहल की है। इस तरह मौसिकी के मामले में दूसरे देशों से भारत का आदान-प्रदान भी बढ़ा है। क्या भारतीय शास्त्रीय संगीत के मुरीदों के पश्चिमी संगीत को आसानी से स्वीकार नहीं करने के चलन में बदलाव आया है, इस पर उन्होंने कहा, भारतीय शास्त्रीय संगीत पहले से ही एक वर्ग विशेष की पसंद रहा है। काफी वक्त पहले यह बंद महफिलों से निकलकर ज्यादा लोगों तक पहुंचा। इस तरह लोगों के रूझान में बदलाव आया है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हाल ही में ब्रिटेन का दौरा कर लौटीं देश की गिनी-चुनीं महिला पखावज वादकों में से एक चित्रांगना आगले बताती हैं, साजों की आवाज भले ही अलग-अलग हो, गायन शैली भी अलग हो लेकिन दुनिया भर में संगीत बुनियादी रूप से एक सा है। चित्रांगना कोरियाई साजों के संगीत और अपने साज पखावज में काफी समानता पाती हैं। उन्होंने कहा कि कोरियाई बैंड के ड्रमों को सुनने के बाद उन्होंने वादन की शैली में समानता देखी। इसी तरह गिटार और कुछ भारतीय साजों से निकलने वाले सुरों में भी समानता है। चित्रांगना ने बताया कि कोरिया के शास्त्रीय संगीतज्ञ भारतीय संगीत में काफी दिलचस्पी रखते हैं। इस तरह देशों के बीच संगीत के क्षेत्र में काम करने के लिए काफी अवसर मौजूद हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-8971161592261959509?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/8971161592261959509/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=8971161592261959509' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8971161592261959509'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8971161592261959509'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html' title='सात सुर..एक कायनात..एक सी लय-ताल (विश्व संगीत दिवस)'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChZxJC8LlI/AAAAAAAAAmg/IoZCKmqPBnE/s72-c/Music.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-5868381742551293526</id><published>2010-06-20T09:05:00.003+05:30</published><updated>2010-06-28T12:53:12.872+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फादर्स-डे (जून का तीसरा रविवार)'/><title type='text'>पापा लोगों का दिन :  फादर्स-डे के 100 साल पूरे</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChNqnGxueI/AAAAAAAAAlA/1VXVgdfapwc/s1600/795431%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 213px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487721540398201314" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChNqnGxueI/AAAAAAAAAlA/1VXVgdfapwc/s320/795431%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; आज फादर्स डे है. माँ और पिता ये दोनों ही रिश्ते समाज में सर्वोपरि हैं. इन रिश्तों का कोई मोल नहीं है. पिता द्वारा अपने बच्चों के प्रति प्रेम का इज़हार कई तरीकों से किया जाता है, पर बेटों-बेटियों द्वारा पिता के प्रति इज़हार का यह दिवस अनूठा है. भारतीय परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि स्त्री-शक्ति का एहसास करने हेतु तमाम त्यौहार और दिन आरंभ हुए पर पित्र-सत्तात्मक समाज में फादर्स डे की कल्पना अजीब जरुर लगती है.पाश्चात्य देशों में जहाँ माता-पिता को ओल्ड एज हाउस में शिफ्ट कर देने की परंपरा है, वहाँ पर फादर्स-डे का औचित्य समझ में आता है. पर भारत में कही इसकी आड़ में लोग अपने दायित्वों से छुटकारा तो नहीं चाहते हैं. इस पर भी विचार करने की जरुरत है. जरुरत फादर्स-डे की अच्छी बातों को अपनाने की है, न कि पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य में उसे अपनाने की जरुरत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना जाता है कि &lt;strong&gt;फादर्स डे सर्वप्रथम 19 जून 1910 को वाशिंगटन में मनाया गया।&lt;/strong&gt; अर्थात इस साल 2010 में फादर्स-डे के 100 साल पूरे हो गए. इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है- सोनेरा डोड की। सोनेरा डोड जब नन्हीं सी थी, तभी उनकी माँ का देहांत हो गया। पिता विलियम स्मार्ट ने सोनेरो के जीवन में माँ की कमी नहीं महसूस होने दी और उसे माँ का भी प्यार दिया। एक दिन यूँ ही सोनेरा के दिल में ख्याल आया कि आखिर एक दिन पिता के नाम क्यों नहीं हो सकता? ....इस तरह 19 जून 1910 को पहली बार फादर्स डे मनाया गया। 1924 में अमेरिकी राष्ट्रपति कैल्विन कोली ने फादर्स डे पर अपनी सहमति दी। फिर 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जानसन ने जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाने की आधिकारिक घोषणा की।1972 में अमेरिका में फादर्स डे पर स्थायी अवकाश घोषित हुआ। फ़िलहाल पूरे विश्व में जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है.भारत में भी धीरे-धीरे इसका प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है.इसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बढती भूमंडलीकरण की अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है और पिता के प्रति प्रेम के इज़हार के परिप्रेक्ष्य में भी. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-5868381742551293526?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/5868381742551293526/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=5868381742551293526' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5868381742551293526'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5868381742551293526'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_935.html' title='पापा लोगों का दिन :  फादर्स-डे के 100 साल पूरे'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChNqnGxueI/AAAAAAAAAlA/1VXVgdfapwc/s72-c/795431%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-2548965194039235382</id><published>2010-05-31T11:39:00.004+05:30</published><updated>2011-05-30T11:06:40.259+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई )'/><title type='text'>विश्व तम्बाकू निषेध दिवस</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChOs7v7NWI/AAAAAAAAAlI/U01KvL3l8Cs/s1600/World%2520No%2520Tobacco%2520Day%5B1%5D%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 223px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487722679810864482" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChOs7v7NWI/AAAAAAAAAlI/U01KvL3l8Cs/s320/World%2520No%2520Tobacco%2520Day%5B1%5D%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;आज ३१ मई को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस है।&lt;/strong&gt; मई माह की भी अपनी महिमा है. मजदूर दिवस से आरंभ होकर यह तम्बाकू निषेध दिवस पर ख़त्म हो जाता है. दुनिया के 170 राष्ट्रों ने व्यापक तम्बाकू नियंत्रण संधि पर हस्ताक्षर तो किये हैं पर वास्तव में इस सम्बन्ध में कोई ठोस पहल नहीं की जाती है. इसके पीछे राजस्व नुकसान से लेकर कार्पोरेट जगत के निहित तत्व तक शामिल हैं, जिनकी सरकारों में जबरदस्त घुसपैठ होती है. ऐसे में तम्बाकू के धुँए का यह जहर धीरे-धीरे सुरसा के मुँह की तरह पूरी दुनिया को निगलने पर आमदा है. 450 ग्राम तम्बाकू में निकोटीन की मात्रा लगभग 22.8 ग्राम होती है। इसकी 6 ग्राम मात्रा से एक कुत्ता 3 मिनट में मर जाता है। तम्बाकू के प्रयोग से अनेक दंत रोग, मंदाग्नि रोग हो जाता है। आंखों की ज्योति कम हो सकती है तो दुष्प्रभाव रूप में व्यक्ति बहरा व अन्धा तक हो जाता है। तम्बाकू के निकोटीन से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, रक्त संचार मंद पड़ जाता है।फेफड़ों की टीबी तो इसका सीधा प्रभाव देखा जा सकता है. यही नहीं तम्बाकू के सेवन से व्यक्ति नपुंसक भी हो सकता है। कहना गलत न होगा कि तम्बाकू का नियमित सेवन धीरे-धीरे व्यक्ति को मृत्यु के करीब ला देता है और वह असमय ही काल-कवलित हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अकेले भारत में हर साल लगभद आठ लाख मौतें तम्बाकू से होने वाली बीमारियों के कारण होती हैं।आज बच्चे-बूढ़े-जवान से लेकर पुरुष-नारी तक सभी वर्गों में तम्बाकू की लत देखी जा सकती है. कभी फैशन में तो,कभी नशे के चस्के में और कई बार थकान मिटाने या गम भुलाने की आड़ में भी इसे लिया जा रहा है. घर में बड़ों द्वारा लिए जा रहा तम्बाकू कब छोटों के पास पहुँच जाता है, पता ही नहीं चलता. दुर्भाग्यवश भारत में धर्म की आड में भी तम्बाकू का स्वाद लेने वालों की कमी नहीं है. गौरतलब है कि आयुर्वेद के चरक तथा सुश्रुत जैसे हजारों वर्ष पूर्व रचे गए ग्रन्थों में धूम्रपान का विधान है। वैसे, वहाँ पर उसका वर्णन औषधि के रूप में हुआ है, जैसे कहा गया है कि आम के सूखे पत्ते को चिलम जैसी किसी उपकरण में रखकर धुआं खींचने से गले के रोगों में आराम होता है। दमा तथा श्वास संबंधी रोगों में वासा (अडूसा) के सूखे पत्तों को चिलम में रखकर पीना एक प्रभावशाली उपाय माना गया है। आज भी ऐसे लोग मिल जायेंगे जो तम्बाकू को दवा बताते हैं. पवित्र तीर्थस्थलों पर धूनी पर बैठकर सुलफा, गांजा अथवा तम्बाकू के दम लगाने वालों तथाकथित बाबाओं की तो पूरी फ़ौज ही भरी पड़ी है. सरकारी दफ्तरों में तम्बाकू या धूम्रपान का सेवन करते पकड़े गए तमाम लोगों ने इसे अपने पक्ष में उपयोग किया है. पर ऐसे लोग उस पक्ष को भूल जाते हैं, जहाँ स्कन्दपुराण में कहा गया है कि-"स्वधर्म का आचरण करके जो पुण्य प्राप्त किया जाता है, वह धूम्रपान से नष्ट हो जाता है। इस कारण समस्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि को इसका सेवन कदापि नहीं करना चाहिए।''&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इधर हाल के वर्षों में जिस तरह से इसने तेजी से महिलाओं को चंगुल में लेना आरंभ किया है, वह पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक बन चुका है. अधिकतर महिलाओं का यह नशा उनकी अगली पीढ़ी में भी जा रहा है क्योंकि मातृत्व की स्थिति में इसका बुरा असर बच्चों पर पड़ना तय है. अब तो महिलाओं के लिए बाकायदा अलग से तम्बाकू उत्पाद भी बनने लगे हैं. स्कूल जाते लड़के-लड़कियां कम उम्र में ही इनका लुत्फ़ उठाने लगे हैं. उस पर से विज्ञापनों की चकाचौंध भी उन्हें इसका स्वाद लेने की तरफ अग्रसर करती है. फिल्मों-धारावाहिकों में जिस धड़ल्ले से नायक-नायिकाएं तम्बाकू वाले सिगरेट या सिगार को स्टाइल में पीते नजर आते हैं, वह नवयुवकों-नवयुवतियों पर गहरा असर डालता है. ऐसे में यह पता होते हुए भी कि यह स्वस्थ्य के अनुकूल नहीं है, यह स्टेट्स सिम्बल या फैशन का प्रतीक बन जाता है. प्रथम विश्व युद्ध के बाद घाटे की भरपाई और बदलते मूल्यों के चक्कर में पहली बार व्यावसायिक कंपनियों ने तम्बाकू उत्पादों की बिक्री के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करना आरंभ किया. लारीवार्ड कंपनी ने पहल करते हुए पहली बार तम्बाकू उत्पादों के विज्ञापन हेतु सर्वप्रथम 1919 में महिलाओं के चित्रों का उपयोग किया। इसके अगले साल ही सिगरेट को नारी- स्वतंत्रता के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया। 1927 के दौर में तो बाकायदा मार्लबोरो ब्रांड में सिगरेट को फैशन व दुबलेपन से जोड़ कर पेश किया गया. इसी के साथ ही कई नामी-गिरामी कंपनियों ने तमाम अभिनेत्रियों को तम्बाकू उत्पादों के कैम्पेन से जोड़ना आरंभ किया। बाद के वर्षों में जैसे -जैसे नारी-स्वातंत्र्य के नारे बुलंद होते गए, स्लिम होने को फैशन-स्टेटमेंट माना जाने लगा, इन कंपनियों ने भी इसे भुनाना आरंभ कर दिया. फिलिप मौरिस कंपनी ने 60 के दशक में बाकायदा वर्जिनिया स्लिम्स नाम से मार्केटिंग अभियान आरंभ किया,जिसकी पंच लाइन थी -'यू हैव कम ए लांग वे बेबी.' इसके बाद तो लगभग हर कंपनी ही तम्बाकू उत्पादों के प्रचार के लिए नारी माडलों व फ़िल्मी नायिकाओं का इस्तेमाल कर रही है. ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस वर्ष तम्बाकू निषेध दिवस पर महिलाओं पर फोकस किया जाना महत्वपूर्ण व प्रासंगिक भी है. गौरतलब है कि भारत कि कुल जितनी आबादी है, लगभग उतने ही लोग दुनिया में धुम्रपान करने वाले भी हैं, अर्थात 1 अरब से ज्यादा. इस 1 अरब में धूम्रपान करने वाली करीब 20 फीसदी महिलाएं भी शामिल हैं. आज महिलाओं में धूम्रपान का यह शौक भारत में भी बखूबी देखने को मिलता है. यह अक्सर या तो हाई सोसाईटी में या समाज के निचले तबके में बखूबी देखने को मिलता है. आंकड़े गवाह हैं कि भारत में करीब 1.4 फीसदी महिलायें धूम्रपान और करीब 8.4 फीसदी महिलायें खाने योग्य तम्बाकू का सेवन करती है। ऐसे में तम्बाकू सेवन से उनमें तमाम रोग व विकार उत्पन्न होते हैं. इनमें श्वांस सम्बन्धी बीमारी, फेफड़े का कैंसर, दिल का दौरा, निमोनिया, माहवारी सम्बंधित समस्याएं एवं प्रजनन विकार जैसी बीमारियाँ शामिल हैं. यही नहीं तम्बाकू का नियमित सेवन करने वाली महिलाओं में अक्सर पूर्व-प्रसव भी देखा गया हाई तथा पैदा होने वाले बच्चे औसत वजन से लगभग 400-500 ग्राम कम के पैदा होते हैं. इसके साथ ही तम्बाकू सेवन करने वाली महिलाओं में गर्भपात की दर भी सामान्य महिलाओं की तुलना में 95 फीसदी ज्यादा होती है।वाकई आज जरुरत है कि इस ओर गंभीर पहल की जाय. इन्हीं सबके चलते विश्व स्वास्थ्य संगठन अब तम्बाकू-उत्पादों का भ्रामक बाजारीकरण, जिसमें परोक्ष-अपरोक्ष रूप में तम्बाकू कंपनियों द्वारा प्रायोजित किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम पर प्रतिबन्ध लगाना भी शामिल है, के बारे में भी सोच रहा है. जानकर आश्चर्य होगा कि तम्बाकू कंपनियाँ हर साल विज्ञापन पर करीब दस अरब रूपये खर्च करतीं हैं. पर बेहतर होगा कि सरकारों और संगठनों की बजाय इस सम्बन्ध में अपने घर और उससे पहले खुद से शुरुआत की जाय ताकि तम्बाकू की यह विषबेल समय से पहले ही सभ्यताओं को न लील ले. क्योंकि Active रूप में जहाँ यह खुद के लिए घातक है, वही Passive रूप में हमारे परिवेश, परिवार, समाज और अंतत: पूरी सभ्यता को लीलने के लिए तैयार बैठी है !!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-2548965194039235382?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/2548965194039235382/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=2548965194039235382' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2548965194039235382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2548965194039235382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_7767.html' title='विश्व तम्बाकू निषेध दिवस'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChOs7v7NWI/AAAAAAAAAlI/U01KvL3l8Cs/s72-c/World%2520No%2520Tobacco%2520Day%5B1%5D%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-8554407373184405359</id><published>2010-05-10T08:30:00.001+05:30</published><updated>2010-06-28T13:10:57.846+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वतंत्रता दिवस'/><title type='text'>10 मई 1857 की याद में</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChR3-go2nI/AAAAAAAAAlw/ilsxQVMX_xk/s1600/image005-765320%5B1%5D%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 214px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487726168065497714" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChR3-go2nI/AAAAAAAAAlw/ilsxQVMX_xk/s320/image005-765320%5B1%5D%5B2%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; 10 मई का भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इसी दिन आरंभ हुआ था। 1857 वह वर्ष है, जब भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी चुनौती देकर उसकी जडे़ं हिला दी थीं। 1857 का वर्ष वैसे भी उथल-पुथल वाला रहा है। इसी वर्ष कैलिफोर्निया के तेजोन नामक स्थान पर 7.9 स्केल का भूकम्प आया था तो टोकियो में आये भूकम्प में लगभग एक लाख लोग और इटली के नेपल्स में आये 6.9 स्केल के भूकम्प में लगभग 11,000 लोग मारे गये थे। 1857 की क्रान्ति इसलिये और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त कर राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकांे ने इसकी अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्यायें की हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- ‘‘यह केवल एक विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था।’’ बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे ‘‘राष्ट्रीय विद्रोह’’ बताया। प्रखर विचारक बी0डी0सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे ”भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम”, जाॅन विलियम ने ”सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला मामूली संघर्ष“ व जाॅन ब्रूस नाॅर्टन ने ‘‘जन-विद्रोह’’ कहा। माक्र्सवादी विचारक डा0 राम विलास शर्मा ने इसे संसार की प्रथम साम्राज्य विरोधी व सामन्त विरोधी क्रान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी क्रान्तियों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम महत्वपूर्ण कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और उनके अनुसार इसका असर तत्कालीन इटली, हंगरी व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की नीतियाँ भी बदलेंगी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;1857 की क्रान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किये गये हैं। इसके पीछे राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा-प्रजा, हिन्दू-मुसलमान, जमींदार-किसान, पुरूष-महिला सभी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। 1857 की क्रान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस तथ्य की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे, जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध क्रान्ति हुयी। इसी प्रकार वे यह भूल जाते है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान थे और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का सीधा तात्पर्य था कि किसी-न-किसी सैनिक के अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक तथ्य है कि अंगे्रजी हुकूमत द्वारा लागू नये भू-राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर से 15,000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं। डाॅ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में- ‘‘सन् 1857 की क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि क्रान्ति सफल न हो तो इसे ‘विप्लव’ या ‘विद्रोह’ ही कहा जाता है।’’ यह क्रान्ति कोई यकायक घटित घटना नहीं थी, वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनायें थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं। एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति सुदृढ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति, भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं, सैनिकों व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इसमें कोई शक नहीं कि 1757 से 1856 के मध्य देश के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न वर्गों द्वारा कई विद्रोह किये गये। यद्यपि अंग्रेजी सेना बार-बार इन विद्रोहों को कुचलती रही पर उसके बावजूद इन विद्रोहों का पुनः सर उठाकर खड़ा हो जाना भारतीय जनमानस की जीवटता का ही परिचायक कहा जायेगा। 1857 के विद्रोह को इसी पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है। अंग्रेज इतिहासकार फॅारेस्ट ने एक जगह सचेत भी किया है कि- ‘‘1857 की क्रान्ति हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमारा साम्राज्य एक ऐसे पतले छिलके के ऊपर कायम है, जिसके किसी भी समय सामाजिक परिवर्तनों और धार्मिक क्रान्तियों की प्रचण्ड ज्वालाओं द्वारा टुकडे़-टुकडे़ हो जाने की सम्भावना है।’’ अंग्रेजी हुकूमत को भी 1757 से 1856 तक चले घटनाक्रमों से यह आभास हो गया था कि वे अब अजेय नहीं रहे। तभी तो लाॅर्ड केनिंग ने फरवरी 1856 में गर्वनर जनरल का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व कहा था कि - ‘‘मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शान्तिपूर्ण हो। मैं नहीं भूल सकता कि भारत के गगन में, जो अभी शान्त है, कभी भी छोटा सा बादल, चाहे वह एक हाथ जितना ही क्यों न हो, निरन्तर विस्तृत होकर फट सकता है, जो हम सबको तबाह कर सकता है।’’ लाॅर्ड केनिंग की इस स्वीकारोक्ति में ही 1857 की क्रान्ति के बीज छुपे हुये थे। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;1857 की क्रान्ति की सफलता-असफलता के अपने-अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम महत्वपूर्ण संघर्ष था। अमरीकी विद्वान प्रो0 जी0 एफ0 हचिन्स के शब्दों में-‘‘1857 की क्रान्ति को अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा क्योंकि वे इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था। परन्तु आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ, परन्तु शीघ्र ही इसमें लोकप्रिय विद्रोह का रूप धारण कर लिया।’’ वस्तुतः इस क्रान्ति को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया हो, लेकिन लोगों में आजादी का जज्बा जरूर पैदा कर गया। 1857 की इस क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस गर्वीले उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो गयी। 1857 के संग्राम की विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद जंगे-आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही और अंतत: 15 अगस्त, 1947 को हम आजाद हुए !! &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-8554407373184405359?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/8554407373184405359/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=8554407373184405359' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8554407373184405359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8554407373184405359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/10-1857.html' title='10 मई 1857 की याद में'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChR3-go2nI/AAAAAAAAAlw/ilsxQVMX_xk/s72-c/image005-765320%5B1%5D%5B2%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-3335958279950649247</id><published>2010-05-09T07:33:00.003+05:30</published><updated>2011-05-06T17:51:23.173+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मदर्स डे (मई का दूसरा रविवार)'/><title type='text'>मदर्स डे पर : माँ की याद में</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChPaOAzdyI/AAAAAAAAAlQ/HQnjaOMH2_0/s1600/bi_mothersday_08_may_09_162509%5B1%5D%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 214px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487723457807611682" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChPaOAzdyI/AAAAAAAAAlQ/HQnjaOMH2_0/s320/bi_mothersday_08_may_09_162509%5B1%5D%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; आज सुबह कुछ पहले ही नींद खुल गई. मन किया कि बाहर जाकर बैठूं. अभी सूर्य देवता ने दर्शन नहीं दिए थे पर ढेर सारी चिड़िया कलरव कर रही थीं. मौसम में हलकी सी ठण्ड थी, शायद रात में बारिश हुई थी. अचानक दिमाग में ख्याल आया कि हम लोग भी घर से कितने दूर हैं. एक ऐसी जगह जहाँ सारे रिश्ते बेगाने हैं. एक-दो साल बाद हम लोग भी यहाँ से चले जायेंगे. इन सबके बीच घर की याद आई तो मम्मी का चेहरा आँखों के सामने घूम गया. कभी सोचा भी ना था की मम्मी से एक दिन इतने दूर जायेंगे, पर दुनिया का रिवाज है. शादी के बाद सबको अपनी नई दुनिया में जाना होता है, बस रह जाती हैं यादें. पर यादें जीवन भर नहीं छूटतीं , हमें अपने आगोश में लिए रहती हैं. ..पर आज पता नहीं क्यों सुबह-सुबह मम्मी की खूब याद आ रही थी. सोचा कि फोन करूँ तो याद आया कि वहाँ तो अभी सभी लोग सो रहे होंगे. सामने नजर दौडाई तो पतिदेव &lt;a href="http://www.kkyadav.blogspot.com/"&gt;कृष्ण कुमार जी&lt;/a&gt; का काव्य-संग्रह 'अभिलाषा' दिखी. पहला पन्ना पलटते ही 'माँ' कविता पर निगाहें ठहर गईं. एक बार नहीं कई बार पढ़ा. वाकई यह कविता दिल के बहुत करीब लगी. अंतर्मन के मनोभावों को बखूबी संजोया गया है इस अनुपम कविता में. सौभाग्यवश &lt;strong&gt;आज मई माह का दूसरा रविवार है और इसे दुनिया में मदर्स डे के रूप में मनाया जाता है. &lt;/strong&gt;तो आज इस विशिष्ट दिवस पर माँ को समर्पित यही कविता आप लोगों के साथ शेयर कर रही हूँ-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मेरा प्यारा सा बच्चा&lt;br /&gt;गोद में भर लेती है बच्चे को&lt;br /&gt;चेहरे पर नजर न लगे&lt;br /&gt;माथे पर काजल का टीका लगाती है&lt;br /&gt;कोई बुरी आत्मा न छू सके&lt;br /&gt;बाँहों में ताबीज बाँध देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चा स्कूल जाने लगा है&lt;br /&gt;सुबह से ही माँ जुट जाती है&lt;br /&gt;चैके-बर्तन में&lt;br /&gt;कहीं बेटा भूखा न चला जाये।&lt;br /&gt;लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से&lt;br /&gt;माँ के आँचल में छुप जाता है&lt;br /&gt;अब उसे कुछ नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चा बड़ा होता जाता है&lt;br /&gt;माँ मन्नतें माँगती है&lt;br /&gt;देवी-देवताओं से&lt;br /&gt;बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर&lt;br /&gt;बेटा कामयाबी पाता है&lt;br /&gt;माँ भर लेती है उसे बाँहों में&lt;br /&gt;अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एक दिन आता है&lt;br /&gt;शहनाईयाँ गूँज उठती हैं&lt;br /&gt;माँ के कदम आज जमीं पर नहीं&lt;br /&gt;कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर&lt;br /&gt;बहू के कदमों का इंतजार है उसे&lt;br /&gt;आशीर्वाद देती है दोनों को&lt;br /&gt;एक नई जिन्दगी की शुरूआत के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ सिखाती है बहू को&lt;br /&gt;परिवार की परम्परायें व संस्कार&lt;br /&gt;बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख&lt;br /&gt;बोलती है&lt;br /&gt;बहुत नाजों से पाला है इसे&lt;br /&gt;अब तुम्हें ही देखना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ की खुशी भरी आँखों से&lt;br /&gt;आँसू की एक गरम बूँद&lt;br /&gt;गिरती है बहू की हथेली पर।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-3335958279950649247?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/3335958279950649247/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=3335958279950649247' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3335958279950649247'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3335958279950649247'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_1738.html' title='मदर्स डे पर : माँ की याद में'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChPaOAzdyI/AAAAAAAAAlQ/HQnjaOMH2_0/s72-c/bi_mothersday_08_may_09_162509%5B1%5D%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-5825084889965175321</id><published>2010-05-01T10:24:00.001+05:30</published><updated>2010-06-28T13:12:50.400+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मई दिवस/ मजदूर दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>श्रम की महत्ता का अहसास : मजदूर दिवस</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChSUcPl98I/AAAAAAAAAl4/bTWHkZt1BQQ/s1600/38817%5B1%5D%5B1%5D.png"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 307px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487726657083406274" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChSUcPl98I/AAAAAAAAAl4/bTWHkZt1BQQ/s320/38817%5B1%5D%5B1%5D.png" /&gt;&lt;/a&gt; श्रम व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। मेहनतकश मजदूरों के श्रम को श्रेष्ठ दर्जा देने और प्रोत्साहित करने के लिए 1 मई को पूरे विश्व में मजदूर दिवस के रुप में मनाया जाता है। इसके इतिहास में जाएँ तो उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दौर में श्रमिकों में हक के प्रति जागरूकता पैदा हुई । शिकागो में उन्होंने रैलियों, आमसभाओं आदि के माध्यम से अपने अधिकारों, पारिश्रमिक के लिए आग्रह करना आरंभ किया। धीरे-धीरे इन प्रयासों का असर बढ़ा और 1886 से 1889 तक आसपास के देशों में भी मजदूर और कर्मचारियों में अपने हक के प्रतिफल के लिए जागृति आ गई।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह शिकागो विरोध काफी प्रसिध्द हुआ और 1890 में जब 1 मई को इसकी पहली वर्षगांठ मनाई गई तभी से मई दिवस मनाने का चलन आरंभ हुआ। मजदूरों ने आठ घंटे से अधिक काम लेने का विरोध करते हुए उचित पारिश्रमिक भुगतान की मांगे रखीं। इसके लिए यूनियन बनीं, धरने, भूख हड़ताल , रैलियां श्रमिकों के हथियार बन गये।अंतत: मई दिवस, श्रमिकों के लिए उत्सव का पर्याय बन गया. एक मई को सभी संस्थाओं में श्रमिकों को अवकाश दिया जाने लगा। आज श्रमिक दिवस हमें श्रम की महत्ता का अहसास कराता है !!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-5825084889965175321?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/5825084889965175321/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=5825084889965175321' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5825084889965175321'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/5825084889965175321'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_3583.html' title='श्रम की महत्ता का अहसास : मजदूर दिवस'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChSUcPl98I/AAAAAAAAAl4/bTWHkZt1BQQ/s72-c/38817%5B1%5D%5B1%5D.png' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-3403678473992797741</id><published>2010-04-29T07:26:00.002+05:30</published><updated>2010-06-28T13:03:06.522+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व नृत्य दिवस(29 अप्रैल)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>विश्व नृत्य दिवस</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChQAuUFoRI/AAAAAAAAAlY/M0irsEuwDaQ/s1600/Manisha.jpg%5B1%5D.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 144px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487724119313457426" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChQAuUFoRI/AAAAAAAAAlY/M0irsEuwDaQ/s320/Manisha.jpg%5B1%5D.JPG" /&gt;&lt;/a&gt; आज विश्व नृत्य दिवस है. गौरतलब है कि &lt;strong&gt;अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस की शुरुआत 29 अप्रैल 1982 से हुई।&lt;/strong&gt; यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय थिएटर इंस्टिट्यूट की अंतरराष्ट्रीय डांस कमेटी ने 29 अप्रैल को नृत्य दिवस के रूप में स्थापित किया। एक महान रिफॉर्मर जीन जार्ज नावेरे के जन्म की स्मृति में यह दिन अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस को पूरे विश्व में मनाने का उद्देश्य जनसाधारण के बीच नृत्य की महत्ता का अलख जगाना है.आज इस विशिष्ट दिवस पर चर्चा करते हैं कि कैसे शास्त्रीय नृत्य से रोग भी भाग जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शास्त्रीय नृत्य से आप सभी वाकिफ होंगे। इसके बारे में सुनते ही जेहन में कत्थक करती किसी नृत्यांगना की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आपको इस बात का इल्म है कि यह शास्त्रीय नृत्य मात्र एक कला नहीं बल्कि दवा भी है। इस बात पर अपनी सहमति की मोहर लगाती हैं राष्ट्रीय स्तर की शास्त्रीय नृत्यांगना मनीषा महेश यादव। मुम्बई विश्वविद्यालय से नृत्य में विशारद की डिग्री हासिल कर मनीषा ने कई मंचों पर शास्त्रीय नृत्य का प्रदर्शन किया। अपनी काबिलियत के चलते उन्हें फिल्म ’दिल क्या करे’ में कोरियोग्राफी करने का भी मौका मिला। मुम्बई में मनीषा हर प्रकार के लोक और शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा भी देती हैं। मनीषा यादव की मानें तो म्यूजिक थेरेपी जहाँ मानसिक समस्याओं को दूर करने में सक्षम है वहीं शास्त्रीय नृत्य शारीरिक समस्याओं को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रीय स्तर के श्रंृगारमणि पुरस्कार से नवाजी जा चुकी मनीषा की यह बात उन्हीं के एक किस्से से साबित हो जाती है। वह बताती हैं कि-'मेरी एक छात्रा को दमा की शिकायत थी। सभी डाॅक्टरों ने उसे ज्यादा थकावट लाने वाले काम करने से मना कर दिया था। लेकिन वह फिर भी मुझसे कत्थक सीखने आती थी। और यह सीखते-सीखते उसे इस समस्या से निजात मिल गई।’ दरअसल बात यह है कि दमा के मरीजों को लम्बी साँस लेने में परेशानी होती है। लेकिन कत्थक के हर स्टेप को लम्बी साँस लेकर ही पूरा किया जा सकता है। कत्थक सीखते समय दमा के मरीजों को शुरूआत में तो कुछ दिक्कतें आती हैं लेकिन जब उन्हें लम्बी साँस खींचने का अभ्यास हो जाता है तो उनकी साँस फूलने की शिकायत भी दूर हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दमा ही नहीं कत्थक से तीव्र स्मरण शक्ति की समस्या को भी हल किया जा सकता है। बकौल मनीषा ’कत्थक की कुछ खास गिनतियाँ होती हैं जिन्हें याद रखना बेहद कठिन होता है। इसके लिए हम अपने छात्रों को कुछ विशेष तकनीकों से गिनतियाँ याद करवाते हैं।’ बस यही वे तकनीकें हैं जो कत्थक के स्टेप सीखने के साथ ही बच्चों को उनके किताबी पाठ याद करने में भी मददगार बन जाती हैं। वैसे अगर आपकी हड्डियाँ कमजोर हैं और इस वजह से आप कत्थक सीखने से हिचक रही हैं तो इस भ्रम को अपने मन से निकाल दीजिए। बकौल मनीषा कत्थक में वोंर्म-अप व्यायाम भी करवाए जाते हैं। जिससे हाथ-पाँव में लचीलापन आ जाता है। इन व्यायामों से हड्डियाँ भी मजबूत होती हैं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सबके अलावा कत्थक दिल के मरीजों के लिए भी एक सटीक दवा है। एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए मनीषा इस बात का पक्ष लेती हैं, ’मेरी डांस क्लास में एक 50 वर्ष की वृद्ध महिला कत्थक सीखने आती थीं। वह दिल की मरीज थीं। डाॅक्टरों के मुताबिक उनके शरीर में रक्त सही गति से नहीं दौड़ता था।’ लेकिन कत्थक सीखने के उनके शौक ने उनकी इस समस्या को जड़ से मिटा दिया। आज वह स्वस्थ जीवन बिता रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो वाकई आज की व्यस्त जिंदगी में यदि शास्त्रीय नृत्य कत्थक में स्वस्थ रहने का राज छुपा है, तो भारतीय नृत्य की इस अद्भुत धरोहर से नई पीढ़ी को परिचित कराने की जरुरत है जो पाश्चात्य संस्कृति में ही अपना भविष्य खोज रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;विश्व नृत्य दिवस की शुभकामनायें.....!!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-3403678473992797741?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/3403678473992797741/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=3403678473992797741' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3403678473992797741'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3403678473992797741'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_21.html' title='विश्व नृत्य दिवस'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChQAuUFoRI/AAAAAAAAAlY/M0irsEuwDaQ/s72-c/Manisha.jpg%5B1%5D.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-3017405004959050927</id><published>2010-04-23T08:34:00.002+05:30</published><updated>2010-06-28T13:15:52.283+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>पुस्तकों के प्रति आकर्षण जरुरी (विश्व पुस्तक दिवस पर)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChS-_gOmUI/AAAAAAAAAmA/u_GdslTCzvQ/s1600/Akshita+school+017%5B1%5D.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 240px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487727388102924610" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChS-_gOmUI/AAAAAAAAAmA/u_GdslTCzvQ/s320/Akshita+school+017%5B1%5D.JPG" /&gt;&lt;/a&gt; पढना किसे अच्छा नहीं लगता। बचपन में स्कूल से आरंभ हुई पढाई जीवन के अंत तक चलती है. पर दुर्भाग्यवश आजकल पढ़ने की प्रवृत्ति लोगों में कम होती जा रही है. पुस्तकों से लोग दूर भाग रहे हैं. हर कुछ नेट पर ही खंगालना चाहते हैं. शोध बताते हैं कि इसके चलते लोगों की जिज्ञासु प्रवृत्ति और याद करने की क्षमता भी ख़त्म होती जा रही है. बच्चों के लिए तो यह विशेष समस्या है. पुस्तकें बच्चों में अध्ययन की प्रवृत्ति, जिज्ञासु प्रवृत्ति, सहेजकर रखने की प्रवृत्ति और संस्कार रोपित करती हैं. पुस्तकें न सिर्फ ज्ञान देती हैं, बल्कि कला-संस्कृति, लोकजीवन, सभ्यता के बारे में भी बताती हैं. नेट पर लगातार बैठने से लोगों की आँखों और मस्तिष्क पर भी बुरा असर पड़ रहा है. ऐसे में पुस्तकों के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा करना जरुरी हो गया है. इसके अलावा तमाम बच्चे गरीबी के चलते भी पुस्तकें नहीं पढ़ पाते, इस ओर भी ध्यान देने की जरुरत है. 'सभी के लिए शिक्षा कानून' को इसी दिशा में देखा जा रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस है।&lt;/strong&gt; यूनेसको ने 1995 में इस दिन को मनाने का निर्णय लिया, कालांतर में यह हर देश में व्यापक होता गया. लोगों में पुस्तक प्रेम को जागृत करने के लिए मनाये जाने वाले इस दिवस पर जहाँ स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई की आदत डालने के लिए सस्ते दामों पर पुस्तकें बाँटने जैसे अभियान चलाये जा रहे हैं, वहीँ स्कूलों या फिर सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शनियां लगाकर पुस्तक पढ़ने के प्रति लोगों को जागरूक किया जा रहा है. स्कूली बच्चों के अलावा उन लोगों को भी पढ़ाई के लिए जागरूक किया जाना जरुरी है जो किसी कारणवश अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं। बच्चों के लिए विभिन्न जानकारियों व मनोरंजन से भरपूर पुस्तकों की प्रदर्शनी जैसे अभियान से उनमें पढ़ाई की संस्कृति विकसित की जा सकती है. पुस्तकालय इस सम्बन्ध में अहम् भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते उनका रख-रखाव सही ढंग से हो और स्तरीय पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं वहाँ उपलब्ध कराई जाएँ। वाकई आज पुस्तकों के प्रति ख़त्म हो रहे आकर्षण के प्रति गंभीर होकर सोचने और इस दिशा में सार्थक कदम उठाने की जरुरत है. विश्व पुस्तक दिवस पर अपना एक बाल-गीत भी प्रस्तुत कर रहा हूँ-&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;प्यारी पुस्तक, न्यारी पुस्तक&lt;br /&gt;ज्ञानदायिनी प्यारी पुस्तक&lt;br /&gt;कला-संस्कृति, लोकजीवन की&lt;br /&gt;कहती है कहानी पुस्तक।&lt;br /&gt;अच्छी-अच्छी बात बताती&lt;br /&gt;संस्कारों का पाठ पढ़ाती&lt;br /&gt;मान और सम्मान बड़ों का&lt;br /&gt;सुन्दर सीख सिखाती पुस्तक।&lt;br /&gt;सीधी-सच्ची राह दिखाती&lt;br /&gt;ज्ञान पथ पर है ले जाती&lt;br /&gt;कर्म और कर्तव्य हमारे&lt;br /&gt;सदगुण हमें सिखाती पुस्तक।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-3017405004959050927?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/3017405004959050927/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=3017405004959050927' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3017405004959050927'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3017405004959050927'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_5379.html' title='पुस्तकों के प्रति आकर्षण जरुरी (विश्व पुस्तक दिवस पर)'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChS-_gOmUI/AAAAAAAAAmA/u_GdslTCzvQ/s72-c/Akshita+school+017%5B1%5D.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-3382257351953242245</id><published>2010-04-22T08:36:00.003+05:30</published><updated>2010-06-28T13:13:18.127+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>विश्व पृथ्वी दिवस : प्रलय का इंतजार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChQ7f8JC-I/AAAAAAAAAlg/KRgwud3nhuQ/s1600/WhenNightFalls%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 229px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487725129067203554" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChQ7f8JC-I/AAAAAAAAAlg/KRgwud3nhuQ/s320/WhenNightFalls%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; आज की यह पोस्ट माँ पर, पर वो माँ जो हर किसी की है। जो सभी को बहुत कुछ देती है, पर कभी कुछ माँगती नहीं। पर हम इसी का नाजायज फायदा उठाते हैं और उसका ही शोषण करने लगते हैं। जी हाँ, यह हमारी धरती माँ है। हमें हर किसी के बारे में सोचने की फुर्सत है, पर धरती माँ की नहीं. यदि धरती ही ना रहे तो क्या होगा... कुछ नहीं। ना हम, ना आप और ना ये सृष्टि. पर इसके बावजूद हम नित उसी धरती माँ को अनावृत्त किये जा रहे हैं. जिन वृक्षों को उनका आभूषण माना जाता है, उनका खात्मा किये जा रहे हैं. विकास की इस अंधी दौड़ के पीछे धरती के संसाधनों का जमकर दोहन किये जा रहे हैं. हम जिसकी छाती पर बैठकर इस प्रगति व लम्बे-लम्बे विकास की बातें करते हैं, उसी छाती को रोज घायल किये जा रहे हैं. पृथ्वी, पर्यावरण, पेड़-पौधे हमारे लिए दिनचर्या नहीं अपितु पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनकर रह गए हैं. सौभाग्य से आज विश्व पृथ्वी दिवस है. लम्बे-लम्बे भाषण, दफ्ती पर स्लोगन लेकर चलते बच्चे, पौधारोपण के कुछ सरकारी कार्यक्रम....शायद कल के अख़बारों में पृथ्वी दिवस को लेकर यही कुछ दिखेगा और फिर हम भूल जायेंगे. हम कभी साँस लेना नहीं भूलते, पर स्वच्छ वायु के संवाहक वृक्षों को जरुर भूल गए हैं। यही कारण है की नित नई-नई बीमारियाँ जन्म ले रही हैं. इन बीमारियों पर हम लाखों खर्च कर डालते हैं, पर अपने परिवेश को स्वस्थ व स्वच्छ रखने के लिए पाई तक नहीं खर्च करते.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आज आफिस के लिए निकला तो बिटिया &lt;a href="http://pakhi-akshita.blogspot.com/"&gt;अक्षिता&lt;/a&gt; बता रही थी कि पापा आपको पता है आज विश्व पृथ्वी दिवस है। आज स्कूल में टीचर ने बताया कि हमें पेड़-पौधों की रक्षा करनी चाहिए। पहले तो पेड़ काटो नहीं और यदि काटना ही पड़े तो एक की जगह दो पेड़ लगाना चाहिए। पेड़-पौधे धरा के आभूषण हैं, उनसे ही पृथ्वी की शोभा बढती है। पहले जंगल होते थे तो खूब हरियाली होती, बारिश होती और सुन्दर लगता पर अब जल्दी बारिश भी नहीं होती, खूब गर्मी भी पड़ती है...लगता है भगवान जी नाराज हो गए हैं. इसलिए आज सभी लोग संकल्प लेंगें कि कभी भी किसी पेड़-पौधे को नुकसान नहीं पहुँचायेंगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे, अपने चारों तरफ खूब सारे पौधे लगायेंगे और उनकी नियमित देख-रेख भी करेंगे.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://pakhi-akshita.blogspot.com/"&gt;अक्षिता&lt;/a&gt; के नन्हें मुँह से कही गई ये बातें मुझे देर तक झकझोरती रहीं. आखिर हम बच्चों में धरती और पर्यावरण की सुरक्षा के संस्कार क्यों नहीं पैदा करते. मात्र स्लोगन लिखी तख्तियाँ पकड़ाने से धरा का उद्धार संभव नहीं है. इस ओर सभी को तन-माँ-धन से जुड़ना होगा. अन्यथा हम रोज उन अफवाहों से डरते रहेंगे कि पृथ्वी पर अब प्रलय आने वाली है. पता नहीं इस प्रलय के क्या मायने हैं, पर कभी ग्लोबल वार्मिंग, कभी सुनामी, कभी कैटरिना चक्रवात तो कभी बाढ़, सूखा, भूकंप, आगजनी और अकाल मौत की घटनाएँ ..क्या ये प्रलय नहीं है. गौर कीजिये इस बार तो चिलचिलाती ठण्ड के तुरंत बाद ही चिलचिलाती गर्मी आ गई, हेमंत, शिशिर, बसंत का कोई लक्षण ही नहीं दिखा..क्या ये प्रलय नहीं है. अभी भी वक़्त है, हम चेतें अन्यथा धरती माँ कब तक अनावृत्त होकर हमारे अनाचार सहती रहेंगीं. जिस प्रलय का इंतजार हम कर रहे हैं, वह इक दिन इतने चुपके से आयेगी कि हमें सोचने का मौका भी नहीं मिलेगा !! &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-3382257351953242245?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/3382257351953242245/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=3382257351953242245' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3382257351953242245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/3382257351953242245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_5167.html' title='विश्व पृथ्वी दिवस : प्रलय का इंतजार'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChQ7f8JC-I/AAAAAAAAAlg/KRgwud3nhuQ/s72-c/WhenNightFalls%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-8906066873679871624</id><published>2010-04-22T08:08:00.002+05:30</published><updated>2010-06-28T13:17:36.364+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>विश्व पृथ्वी दिवस : आज धरती माँ की सोचें</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChTg5UIiOI/AAAAAAAAAmI/O2R9G1jzkSk/s1600/savetrees-savetheearth%5B1%5D%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 214px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487727970557135074" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChTg5UIiOI/AAAAAAAAAmI/O2R9G1jzkSk/s320/savetrees-savetheearth%5B1%5D%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस है. वैसे आजकल हर दिन का फैशन है, पर पृथ्वी दिवस की महत्ता इसलिए बढ़ जाती है कि यह पृथ्वी और पर्यावरण के बारे में लोगों को जागरूक करता है. यदि पृथ्वी ही नहीं रहेगी तो फिर जीवन का अस्तित्व ही नहीं रहेगा. हम कितना भी विकास कर लें, पर पर्यावरण की सुरक्षा को ललकार किया गया कोई भी कार्य समूची मानवता को खतरे में डाल सकता है. सर्वप्रथम पृथ्वी दिवस का विचार अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में पर्यावरण शिक्षा के अभियान रूप में की गयी, पर धीरे-धीरे यह पूरे विश्व में प्रचारित हो गया. आज हम अपने आसपास प्रकृति को न सिर्फ नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि भावी पीढ़ियों से प्रकृति को दूर भी कर रहे हैं. ऐसे परिवेश में कल वास्तविक पार्क की बजाय हमें ई-पार्क देखने को मिले, तो कोई बड़ी बात नहीं.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-8906066873679871624?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/8906066873679871624/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=8906066873679871624' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8906066873679871624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8906066873679871624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_9983.html' title='विश्व पृथ्वी दिवस : आज धरती माँ की सोचें'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChTg5UIiOI/AAAAAAAAAmI/O2R9G1jzkSk/s72-c/savetrees-savetheearth%5B1%5D%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-6636964764624104343</id><published>2010-03-20T08:12:00.002+05:30</published><updated>2010-06-28T13:20:45.310+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व गौरैया दिवस (२० मार्च)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>अब गौरैया दिवस भी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChT8df24PI/AAAAAAAAAmQ/MD819o204M0/s1600/180px-House_Sparrow_(M)_I_IMG_7881%5B1%5D%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 180px; FLOAT: left; HEIGHT: 134px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487728444126454002" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChT8df24PI/AAAAAAAAAmQ/MD819o204M0/s320/180px-House_Sparrow_(M)_I_IMG_7881%5B1%5D%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span&gt;गौरैया&lt;/span&gt; भला किसे नहीं भाती. कहते हैं कि लोग जहाँ भी घर बनाते हैं देर सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं। पर यही गौरैया अब खतरे में है. पिछले कई सालों से इसके विलुप्त होने की बात कही जा रही है. कंक्रीटों के शहर में गौरैया कहाँ घर बनाये, उस पर से मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है। हम जिस मोबाइल पर गौरैया की चूं-चूं कलर ट्यून के रूप में सेट करते हैं, उसी मोबाइल की तंरगें इसकी दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही है और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ता है. यही नहीं आज की पीढ़ी भी गौरैया को नेट पर ही खंगाल रही है. उसके पास गौरैयाके पीछे दौड़ने के लिए समय भी नहीं है, फिर गौरैया कहाँ जाये..किससे अपना दुखड़ा रोये..यदि इसे आज नहीं सोचा गया तो कल गौरैया वाकई सिर्फ गीतों-किताबों और इन्टरनेट पर ही मिलेगी. इसी चिंता के मद्देनजर इस वर्ष से दुनिया भर में &lt;strong&gt;प्रति वर्ष 20 मार्च को ''विश्व गौरैया दिवस'' &lt;/strong&gt;मनाने का निर्णय लिया गया है. देर से ही सही पर इस ओर कुछ ठोस कदम उठाने की जरुरत है, तभी यह दिवस सार्थक हो सकेगा. इस अवसर पर अपने पतिदेव &lt;a href="http://www.kkyadav.blogspot.com/"&gt;कृष्ण कुमार यादव जी&lt;/a&gt; की एक कविता उनके ब्लॉग शब्द सृजन की ओर से साभार-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;चाय की चुस्कियों के बीच&lt;br /&gt;सुबह का अखबार पढ़ रहा था&lt;br /&gt;अचानक&lt;br /&gt;नजरें ठिठक गईं&lt;br /&gt;गौरैया शीघ्र ही विलुप्त पक्षियों में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही गौरैया,&lt;br /&gt;जो हर आँगन में&lt;br /&gt;घोंसला लगाया करती&lt;br /&gt;जिसकी फुदक के साथ&lt;br /&gt;हम बड़े हुये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हमारे बच्चे&lt;br /&gt;इस प्यारी व नन्हीं-सी चिड़िया को&lt;br /&gt;देखने से वंचित रह जायेंगे!&lt;br /&gt;न जाने कितने ही सवाल&lt;br /&gt;दिमाग में उमड़ने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर देखा&lt;br /&gt;कंक्रीटों का शहर नजर आया&lt;br /&gt;पेड़ों का नामोनिशां तक नहीं&lt;br /&gt;अब तो लोग घरों में&lt;br /&gt;आँगन भी नहीं बनवाते&lt;br /&gt;एक कमरे के फ्लैट में&lt;br /&gt;चार प्राणी ठुंसे पड़े हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे प्रकृति को&lt;br /&gt;निहारना तो दूर&lt;br /&gt;हर कुछ इण्टरनेट पर ही&lt;br /&gt;खंगालना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर&lt;br /&gt;इन सबके बीच&lt;br /&gt;गौरैया कहाँ से आयेगी?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-6636964764624104343?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/6636964764624104343/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=6636964764624104343' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6636964764624104343'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/6636964764624104343'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_5628.html' title='अब गौरैया दिवस भी'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChT8df24PI/AAAAAAAAAmQ/MD819o204M0/s72-c/180px-House_Sparrow_(M)_I_IMG_7881%5B1%5D%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-8404010682338994722</id><published>2010-03-16T10:40:00.001+05:30</published><updated>2010-06-28T13:09:09.913+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नव संवत्सर'/><title type='text'>नव संवत्सर से जुडी हैं कई महत्वपूर्ण घटनाएँ</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChRRHq9rXI/AAAAAAAAAlo/EHO3AHiGqIE/s1600/00002%5B1%5D%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; FLOAT: left; HEIGHT: 265px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487725500509826418" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChRRHq9rXI/AAAAAAAAAlo/EHO3AHiGqIE/s320/00002%5B1%5D%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span&gt;भारत&lt;/span&gt; के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। भारत में नव वर्ष का शुभारम्भ वर्षा का संदेशा देते मेघ, सूर्य और चंद्र की चाल, पौराणिक गाथाओं और इन सबसे ऊपर खेतों में लहलहाती फसलों के पकने के आधार पर किया जाता है। इसे बदलते मौसमों का रंगमंच कहें या परम्पराओं का इन्द्रधनुष या फिर भाषाओं और परिधानों की रंग-बिरंगी माला, भारतीय संस्कृति ने दुनिया भर की विविधताओं को संजो रखा है। असम में नववर्ष बीहू के रुप में मनाया जाता है, केरल में पूरम विशु के रुप में, तमिलनाडु में पुत्थंाडु के रुप में, आन्ध्र प्रदेश में उगादी के रुप में, महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा के रुप में तो बांग्ला नववर्ष का शुभारंभ वैशाख की प्रथम तिथि से होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लगभग सभी जगह नववर्ष मार्च या अप्रैल माह अर्थात चैत्र या बैसाख के महीनों में मनाये जाते हैं। पंजाब में नव वर्ष बैशाखी नाम से 13 अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलेण्डर के अनुसार 14 मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिल नव वर्ष भी आता है। तेलगू नव वर्ष मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्र प्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग$आदि का अपभ्रंश) के रूप मंे मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नव वर्ष विशु 13 या 14 अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल 15 जनवरी को नव वर्ष के रुप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेण्डर नवरेह 19 मार्च को आरम्भ होता है। महाराष्ट्र में गुडी पड़वा के रुप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड़ नव वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुडी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरुविजा नव वर्ष के रुप में मनाया जाता है। मारवाड़ी और गुजराती नव वर्ष दीपावली के दिन होता है, जो अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नव वर्ष पोहेला बैसाखी 14 या 15 अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नव वर्ष होता है। वस्तुतः भारत वर्ष में वर्षा ऋतु की समाप्ति पर जब मेघमालाओं की विदाई होती है और तालाब व नदियाँ जल से लबालब भर उठते हैं तब ग्रामीणों और किसानों में उम्मीद और उल्लास तरंगित हो उठता है। फिर सारा देश उत्सवों की फुलवारी पर नववर्ष की बाट देखता है। इसके अलावा भारत में विक्रम संवत, शक संवत, बौद्ध और जैन संवत, तेलगु संवत भी प्रचलित हैं, इनमें हर एक का अपना नया साल होता है। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम और शक संवत हैं। विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की खुशी में 57 ईसा पूर्व शुरू किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारतीय नव वर्ष नव संवत्सर का आरंभ आज हो रहा है. ऐसी मान्यता है कि जगत की सृष्टि की घड़ी (समय) यही है। इस दिन भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना हुई तथा युगों में प्रथम सत्ययुग का प्रारंभ हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि।&lt;br /&gt;शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति।।‘&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात ब्रह्मा पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के प्रथम दिन, प्रथम सूर्योदय होने पर की। इस तथ्य की पुष्टि सुप्रसिद्ध भास्कराचार्य रचित ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि‘ से भी होती है, जिसके श्लोक में उल्लेख है कि लंका नगर में सूर्योदय के क्षण के साथ ही, चैत्र मास, शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस से मास, वर्ष तथा युग आरंभ हुए। अतः नव वर्ष का प्रारंभ इसी दिन से होता है, और इस समय से ही नए विक्रम संवत्सर का भी आरंभ होता है, जब सूर्य भूमध्य रेखा को पार कर उत्तरायण होते हैं। इस समय से ऋतु परिवर्तन होनी शुरू हो जाती है। वातावरण समशीतोष्ण होने लगता है। ठंडक के कारण जो जड़-चेतन सभी सुप्तावस्था में पड़े होते हैं, वे सब जाग उठते हैं, गतिमान हो जाते हैं। पत्तियों, पुष्पों को नई ऊर्जा मिलती है। समस्त पेड़-पौधे, पल्लव रंग-विरंगे फूलों के साथ खिल उठते हैं। ऋतुओं के एक पूरे चक्र को संवत्सर कहते हैं। इस वर्ष नया विक्रम संवत 2067, मार्च 16, 2010 को प्रारंभ हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;संवत्सर, सृष्टि के प्रारंभ होने के दिवस के अतिरिक्त, अन्य पावन तिथियों, गौरवपूर्ण राष्ट्रीय, सांस्कृतिक घटनाओं के साथ भी जुड़ा है। रामचन्द्र का राज्यारोहण, धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म, आर्य समाज की स्थापना तथा चैत्र नवरात्र का प्रारंभ आदि जयंतियां इस दिन से संलग्न हैं। इसी दिन से मां दुर्गा की उपासना, आराधना, पूजा भी प्रारंभ होती है। यह वह दिन है, जब भगवान राम ने रावण को संहार कर, जन-जन की दैहिक-दैविक-भौतिक, सभी प्रकार के तापों से मुक्त कर, आदर्श रामराज्य की स्थापना की। सम्राट विक्रमादित्य ने अपने अभूतपूर्व पराक्रम द्वारा शकों को पराजित कर, उन्हें भगाया, और इस दिन उनका गौरवशाली राज्याभिषेक किया गया।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आप सभी को भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2067 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें. आप सभी के लिए यह नववर्ष अत्यन्त सुखद हो, शुभ हो, मंगलकारी व कल्याणकारी हो, नित नूतन उँचाइयों की ओर ले जाने वाला हो !!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-8404010682338994722?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/8404010682338994722/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=8404010682338994722' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8404010682338994722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8404010682338994722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_991.html' title='नव संवत्सर से जुडी हैं कई महत्वपूर्ण घटनाएँ'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/TChRRHq9rXI/AAAAAAAAAlo/EHO3AHiGqIE/s72-c/00002%5B1%5D%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-7219099159580133794</id><published>2010-03-08T08:00:00.003+05:30</published><updated>2011-03-08T12:23:58.729+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के 100 साल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरूआत 1900 के आरंभ में हुई थी। वर्ष 1908 में न्यूयार्क की एक कपड़ा मिल में काम करने वाली करीब 15 हजार महिलाओं ने काम के घंटे कम करने, बेहतर तनख्वाह और वोट का अधिकार देने के लिए प्रदर्शन किया था। इसी क्रम में 1909 में अमेरिका की ही सोशलिस्ट पार्टी ने पहली बार ''नेशनल वुमन-डे'' मनाया था। &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का फैसला किया गया और 1911 में पहली बार 19 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; इसे सशक्तिकरण का रूप देने हेतु ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैलियों में हिस्सा लिया. बाद में वर्ष 1913 में महिला दिवस की तारीख 8 मार्च कर दी गई। तब से हर 8 मार्च को विश्व भर में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;***अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें *** &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-7219099159580133794?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/7219099159580133794/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=7219099159580133794' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7219099159580133794'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7219099159580133794'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post_8390.html' title='अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के 100 साल'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-247707264033178133</id><published>2010-03-05T07:21:00.000+05:30</published><updated>2010-06-21T21:01:33.925+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>त्यौहारों की कड़ी में अब विशिष्ट दिवस भी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span class=""&gt;आजकल &lt;/span&gt; भूमंडलीकरण का दौर है. जो त्यौहार कल तक देश की सीमाओं से आबद्ध थे, आज उनका भी भूमंडलीकरण हो गया है. पारंपरिक त्यौहारों से परे तमाम दिन किसी विशिष्ट विषय को लेकर सेलिब्रेट किये जा रहे हैं. इनमें आपसी रिश्तों से लेकर हमारे परिवेश तक के विषय शामिल हैं. मसलन-नारी दिवस, पर्यावरण दिवस, मदर्स डे, फादर्स डे, गौरैया दिवस इत्यादि. इनका उद्देश्य हमारी नित्य व्यस्त होती दिनचर्या में ठहरकर किसी चीज पर विचार करना है. अब 'उत्सव के रंग' में हम ऐसे भी विशिष्ट दिवसों के बारे में चर्चा करेंगे. इन दिवसों के पीछे छुपे जीवन-मूल्यों को समझने की कोशिश करेंगें. आवश्यकतानुसार इन विषयों से सम्बंधित रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगें !!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-247707264033178133?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/247707264033178133/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=247707264033178133' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/247707264033178133'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/247707264033178133'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='त्यौहारों की कड़ी में अब विशिष्ट दिवस भी'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-2893613804395060589</id><published>2010-03-02T08:24:00.000+05:30</published><updated>2010-03-02T08:24:00.845+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होली'/><title type='text'>कानपुर में होली की मस्ती</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;कानपुर में होली का अपना अलग ही इतिहास है। यहाँ अवस्थित जाजमऊ और उससे लगे बारह गाँवों में पाँच दिन बाद होली खेली जाती है। बताया जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक की हुकुमत के दौरान ईरान के शहर जंजान के शहर काजी सिराजुद्दीन के शिष्यों के जाजमऊ पहुँचने पर तत्कालीन राजा ने उन्हें जाजमऊ छोड़ने का हुक्म दिया तो दोनो पक्षों में जंग आरम्भ हो गइ। इसी जंग के बीच राजा जाज का किला पलट गया और किले के लोग मारे गये। संयोग से उस दिन होली थी पर इस दुखद घटना के चलते नगरवासियों ने निर्णय लिया कि वे पाँचवें दिन होली खेलेंगे, तभी से यहाँ होली के पाँचवें दिन पंचमी का मेला लगता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इसी प्रकार वर्ष 1923 के दौरान होली मेले के आयोजन को लेकर कानपुर के हटिया में चन्द बुद्धिजीवियों व्यापारियों और साहित्यकारों (गुलाबचन्द्र सेठ, जागेश्वर त्रिवेदी, पं0 मुंशीराम शर्मा सोम, रघुबर दयाल, बाल कृष्ण शर्मा नवीन, श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’, बुद्धूलाल मेहरोत्रा और हामिद खाँ) की एक बैठक हो रही थी। तभी पुलिस ने इन आठों लोगों को हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफतार करके सरसैया घाट स्थित जिला कारागार में बन्द कर दिया। इनकी गिरफ्तारी का कानपुर की जनता ने भरपूर विरोध किया। आठ दिनों पश्चात् जब उन्हें रिहा किया गया, तो उस समय ‘अनुराधा-नक्षत्र’ लगा हुआ था। जैसे ही इनके रिहा होने की खबर लोगों तक पहुँची, लोग कारागार के फाटक पर पहुँच गये। उस दिन वहीं पर मारे खुशी के पवित्र गंगा जल में स्नान करके अबीर-गुलाल और रंगों की होली खेली। देखते ही देखते गंगा तट पर मेला सा लग गया। तभी से परम्परा है कि होली से अनुराधा नक्षत्र तक कानपुर में होली की मस्ती छायी रहती है और आठवें दिन प्रतिवर्ष गंगा तट पर गंगा मेले का आयोजन किया जाता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.kkyadav.blogspot.com/"&gt;कृष्ण कुमार यादव&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-2893613804395060589?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/2893613804395060589/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=2893613804395060589' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2893613804395060589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2893613804395060589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/03/blog-post_02.html' title='कानपुर में होली की मस्ती'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-7541960066556330444</id><published>2010-03-01T08:07:00.000+05:30</published><updated>2010-03-01T08:07:00.499+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होली'/><title type='text'>बरसाने की लट्ठमार होली</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eW17_rXhI/AAAAAAAAAd4/mmEZiQ-lpgo/s1600-h/t3%5B1%5D.png"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5442484528082542098" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 234px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eW17_rXhI/AAAAAAAAAd4/mmEZiQ-lpgo/s320/t3%5B1%5D.png" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुक्ल नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। सखागण मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं। बरसाने की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसी प्रकार बनारस की होली का भी अपना अलग अन्दाज है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा गया है। यहाँ होली को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाते हैं और बाबा विश्वनाथ के विशिष्ट श्रृंगार के बीच भक्त भांग व बूटी का आनन्द लेते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-7541960066556330444?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/7541960066556330444/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=7541960066556330444' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7541960066556330444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/7541960066556330444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='बरसाने की लट्ठमार होली'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eW17_rXhI/AAAAAAAAAd4/mmEZiQ-lpgo/s72-c/t3%5B1%5D.png' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-4275046819333557016</id><published>2010-02-28T08:00:00.000+05:30</published><updated>2010-02-28T08:00:00.238+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होली'/><title type='text'>विविधता में एकता की प्रतीक : होली</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eYIiMgf1I/AAAAAAAAAeA/p0SvhBAIsys/s1600-h/s9%5B1%5D.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5442485947086176082" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 288px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eYIiMgf1I/AAAAAAAAAeA/p0SvhBAIsys/s320/s9%5B1%5D.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; होली को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में तमाम मान्यतायें हैं और शायद यही विविधता में एकता की भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर पूर्व भारत में होलिका दहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस से जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न हो देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत में अग्नि प्रज्जवलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहाँ गन्ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित धूंधड़का गाँव में होली तो बिना रंगों के खेली जाती है और होलिकादहन के दूसरे दिन ग्रामवासी अमल कंसूबा (अफीम का पानी) को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन घरों में जाते हैं जहाँ बीते वर्ष में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती है। उस परिवार को सांत्वना देने के साथ होली की खुशी में शामिल किया जाता है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-4275046819333557016?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/4275046819333557016/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=4275046819333557016' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4275046819333557016'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/4275046819333557016'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/02/blog-post_28.html' title='विविधता में एकता की प्रतीक : होली'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eYIiMgf1I/AAAAAAAAAeA/p0SvhBAIsys/s72-c/s9%5B1%5D.gif' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-2028192492680288414</id><published>2010-02-27T09:03:00.001+05:30</published><updated>2010-02-27T09:03:00.132+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होली'/><title type='text'>बच्चों के उत्पात से आरंभ हुआ होलिका-दहन का</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;होलिका-दहन पीछे कई मान्यताएं हैं. उनमें से एक यह भी है. भविष्य पुराण में वर्णन आता है कि राजा रघु के राज्य में धुंधि नामक राक्षसी को भगवान शिव द्वारा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न ही देवताओं, न ही मनुष्यों, न ही हथियारों, न ही सदी-गर्मी-बरसात से होगी। इस वरदान के बाद उसकी दुष्टतायें बढ़ती गयीं और अंतत: भगवान शिव ने ही उसे यह शाप दे दिया कि उसकी मृत्यु बालकों के उत्पात से होगी। धुंधि की दुष्टताओं से परेशान राजा रघु को उनके पुरोहित ने सुझाव दिया कि फाल्गुन मास की 15वीं तिथि को जब सर्दियों पश्चात गर्मियाँ आरम्भ होती हैं, बच्चे घरों से लकड़ियाँ व घास-फूस इत्यादि एकत्र कर ढेर बनायें और इसमें आग लगाकर खूब हल्ला-गुल्ला करें। बच्चों के ऐसा ही करने से भगवान शिव के शाप स्वरूप राक्षसी धुंधि ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। ऐसा माना जाता है कि होली का पंजाबी स्वरूप ‘धुलैंडी’ धुंधि की मृत्यु से ही जुड़ा हुआ है। आज भी इसी याद में होलिकादहन किया जाता है और लोग अपने हर बुरे कर्म इसमें भस्म कर देते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-2028192492680288414?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/2028192492680288414/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=2028192492680288414' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2028192492680288414'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/2028192492680288414'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/02/blog-post_27.html' title='बच्चों के उत्पात से आरंभ हुआ होलिका-दहन का'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-9197390192742800663</id><published>2010-02-26T14:20:00.003+05:30</published><updated>2010-02-26T15:03:19.594+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होली'/><title type='text'>यूँ आरंभ हुआ होलिका-दहन व होली</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eMEuyHQ6I/AAAAAAAAAdw/_kEZhNabHQY/s1600-h/holi%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5442472687606121378" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 208px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eMEuyHQ6I/AAAAAAAAAdw/_kEZhNabHQY/s320/holi%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;होली भारतीय समाज का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसका लोग बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में होली मनाई जाती है। रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त पर्व में मादकता के अनुभवों के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व उत्साह और उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल व रंगों के बीच भांग की मस्ती में फगुआ गाते इस दिन क्या बूढे व क्या बच्चे, सब एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नारद पुराण के अनुसार दैत्य राज हिरण्यकश्यप को यह घमंड था कि उससे श्रेष्ठ दुनिया में कोई नहीं, अत: लोगों को ईश्वर की पूजा करने की बजाय उसकी पूजा करनी चाहिए। पर उसका बेटा प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था, ने हिरण्यकश्यप की इच्छा के विरूद्ध ईश्वर की पूजा जारी रखी। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को प्रताड़ित करने हेतु कभी उसे ऊंचे पहाड़ों से गिरवा दिया, कभी जंगली जानवरों से भरे वन में अकेला छोड़ दिया पर प्रहलाद की ईश्वरीय आस्था टस से मस न हुयी और हर बार वह ईश्वर की कृपा से सुरक्षति बच निकला। अंतत: हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसके पास एक चमत्कारी चुनरी थी, जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था, की गोद में प्रहलाद को चिता में बिठा दिया ताकि प्रहलाद भस्म हो जाय। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था, ईश्वरीय वरदान के गलत प्रयोग के चलते चुनरी ने उड़कर प्रहलाद को ढक लिया और होलिका जल कर राख हो गयी और प्रहलाद एक बार फिर ईश्वरीय कृपा से सकुशल बच निकला। दुष्ट होलिका की मृत्यु से प्रसन्न नगरवासियों ने उसकी राख को उड़ा-उड़ा कर खुशी का इजहार किया। मान्यता है कि आधुनिक होलिका दहन और उसके बाद अबीर-गुलाल को उड़ाकर खेले जाने वाली होली इसी पौराणिक घटना का स्मृति प्रतीक है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.kkyadav.blogspot.com/"&gt;कृष्ण कुमार यादव&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-9197390192742800663?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/9197390192742800663/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=9197390192742800663' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/9197390192742800663'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/9197390192742800663'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/02/blog-post_26.html' title='यूँ आरंभ हुआ होलिका-दहन व होली'/><author><name>KK Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05702409969031147177</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/Sxs5tSPyaVI/AAAAAAAAAWg/dcOIzP3SxWk/S220/DSC05812.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2K8UDLclYQE/S4eMEuyHQ6I/AAAAAAAAAdw/_kEZhNabHQY/s72-c/holi%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-8459537340542046194</id><published>2010-02-14T07:29:00.005+05:30</published><updated>2010-06-21T22:44:31.167+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वेलेण्टाइन-डे (14 फरवरी)'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><title type='text'>वसंती हवाओं में चढ़ने लगा वेलेण्टाइन-डे का खुमार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/S3dZU2EMtvI/AAAAAAAAAWU/6Kazd3bmkgM/s1600-h/00074%5B1%5D%5B1%5D.png"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5437913289718544114" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 172px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/S3dZU2EMtvI/AAAAAAAAAWU/6Kazd3bmkgM/s320/00074%5B1%5D%5B1%5D.png" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;वसंत का मौसम आ गया है। मौसम में रूमानियत छाने लगी है। हर कोई चाहता है कि अपने प्यार के इजहार के लिए उसे अगले वसंत का इंतजार न करना पड़े। सारी तैयारियां आरम्भ हो गई हैं। प्यार में खलल डालने वाले भी डंडा लेकर तैयार बैठे हैं। भारतीय संस्कृति में ऋतुराज वसंत की अपनी महिमा है। वेदों में भी प्रेम की महिमा गाई गई है। यह अलग बात है कि हम जब तक किसी चीज पर पश्चिमी सभ्यता का ओढ़ावा नहीं ओढ़ा लेते, उसे मानने को तैयार ही नहीं होते। ‘योग‘ की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘योगा‘ होकर आयातित हुआ। ऋतुराज वसंत और इनकी मादकता की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘वेलेण्टाइन‘ के पंखों पर सवार होकर अपनी खुमारी फैलाने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम एक बेहद मासूम अभिव्यक्ति है। मशहूर दार्शनिक ख़लील जिब्रान एक जगह लिखते हैं&lt;strong&gt;-‘‘जब पहली बार प्रेम ने अपनी जादुई किरणों से मेरी आंखें खोली थीं और अपनी जोशीली अंगुलियों से मेरी रूह को छुआ था, तब दिन सपनों की तरह और रातें विवाह के उत्सव की तरह बीतीं।‘‘ &lt;/strong&gt;अथर्ववेद में समाहित प्रेम गीत भला किसको न बांध पायेंगे। जो लोग प्रेम को पश्चिमी चश्मे से देखने का प्रयास करते हैं, वे इन प्रेम गीतों को महसूस करें और फिर सोचें कि भारतीय प्रेम और पाश्चात्य प्रेम का फर्क क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल वेलेण्टाइन-डे का खुमार युवाओं पर चढ़कर बोल रहा है। कोई इसी दिन पण्डित से कहकर अपना विवाह-मुहूर्त निकलवा रहा है तो कोई इसे अपने जीवन का यादगार लम्हा बनाने का दूसरा बहाना ढूंढ रहा है। एक तरफ नैतिकता की झंडाबरदार सेनायें वेलेण्टाइन-डे का विरोध करने और इसी बहाने चर्चा में आने का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं-‘करोगे डेटिंग तो करायेंगे वेडिंग।‘ तो अब वेलेण्टाइन डे के बहाने पण्डित जी की भी बल्ले-बल्ले है। जब सबकी बल्ले-बल्ले हो तो भला बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कैसे पीछे रह सकती हैं। ‘प्रेम‘ रूपी बाजार को भुनाने के लिए उन्होंने ‘वेलेण्टाइन-उत्सव‘ को बकायदा 11 दिन तक मनाने की घोषणा कर दी है। हर दिन को अलग-अलग नाम दिया है और उसी अनुरूप लोगों की जेब के अनुरूप गिट भी तय कर लिये हैं। यह उत्सव 5 फरवरी को ‘फ्रैगरेंस डे‘ से आरम्भ हुआ जो कि 15 फरवरी को ‘फारगिव थैंक्स फारेवर योर्स डे‘ के रूप में खत्म होगा। यह भी अजूबा ही लगता है कि शाश्वत प्रेम को हमने दिनों की चहरदीवारी में कैद कर दिया है। वेलेण्टाइन-डे के बहाने वसंत की मदमदाती फिजा में अभी से ‘फगुआ‘ खेलने की तैयारियां आरम्भ हो चुकी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5 फरवरी - फ्रैगरेंस डे&lt;br /&gt;6 फरवरी - टैडीबियर डे&lt;br /&gt;7 फरवरी - प्रपोज एण्ड स्माइल डे&lt;br /&gt;8 फरवरी - रोज स्माइल प्रपोज डे&lt;br /&gt;9 फरवरी - वेदर चॉकलेट डे&lt;br /&gt;10 फरवरी - चॉकलेट मेक ए फ्रेंड टैडी डे&lt;br /&gt;11 फरवरी - स्लैप कार्ड प्रामिस डे&lt;br /&gt;12 फरवरी - हग चॉकलेट किस डे&lt;br /&gt;13 फरवरी - किस स्वीट हर्ट हग डे&lt;br /&gt;14 फरवरी - वैलेण्टाइन डे&lt;br /&gt;15 फरवरी - फारगिव थैंक्स फारेवर योर्स डे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.shabdshikhar.blogspot.com/"&gt;&lt;strong&gt;आकांक्षा यादव&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1159709045004684486-8459537340542046194?l=utsavkerang.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://utsavkerang.blogspot.com/feeds/8459537340542046194/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1159709045004684486&amp;postID=8459537340542046194' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8459537340542046194'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1159709045004684486/posts/default/8459537340542046194'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://utsavkerang.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='वसंती हवाओं में चढ़ने लगा वेलेण्टाइन-डे का खुमार'/><author><name>Akanksha Yadav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10606407864354423112</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-mQ5pbtPeVJ0/Tb-4R8Ntv8I/AAAAAAAAA84/0VUt1DplPOY/s220/Akanksha.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KOWXNS-gPCM/S3dZU2EMtvI/AAAAAAAAAWU/6Kazd3bmkgM/s72-c/00074%5B1%5D%5B1%5D.png' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1159709045004684486.post-4847794796890544435</id><published>2010-02-03T11:54:00.001+05:30</published><updated>2010-06-21T22:48:20.301+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विशिष्ट दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वेडिंग-रिंग्स डे (३ फरवरी)'/><title type='text'>भारत में भी फैल रहा है ''वेडिंग-रिंग्स डे''</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;संसार में कई चीजें ऐसी होती हैं, जो हमें यूँ ही भाने लगती हैं। भारतीय संस्कृति में अधिकतर चीजें हमारे रीति-रिवाजों एवं संस्कारों से उद्गारित हैं तो पाश्चात्य संस्कृति में बाजार के प्रादुर्भाव से। ऋतुराज वसंत के आगमन के साथ ही चारो तरफ प्यार का खुमार चढ़ने लगता है। देवी सरस्वती की आराधना से लेकर होली की तैयारियों का इंतजाम देखते ही बनता है। पाश्चात्य संस्कृति का वैलेन्टाइन डे भी बहुत कुछ ऋतुराज वसंत से प्रभावित लगता है। फर्क मात्र इतना है कि भारतीय संस्कृति में जो चीजें संस्कारों के तहत होती हैं, पाश्चात्य संस्कृति में वही खुल्लम-खुल्ला होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाश्चात्य संस्कृति की ही देन है- सगाई की अंगूठी या इंगेजमेंट रिंग। किसी भी जोड़े के लिए इस रिंग का विशेष महत्व होता है। ईसाई धर्म में इस रिंग की खास पहचान होती है। वहाँ इसे मैरिज रिंग के तौर पर जाना जाता है और यह इस बात का परिचायक होता है कि विवाह हो चुका है। हिन्दू धर्म में रिंग पहनाना धार्मिक रिवाज तो नहीं है, पर रीति अवश्व बन चुकी है। ऐसी मान्यता है कि अनामिका उंगली में इंगेजमेंट/वेडिंग रिंग पहनने की शुरूआत मिस्र और रोम से हुई। मिस्र की सभ्यता में इसका चलन 4800 साल पहले से माना जाता है। तब अनामिका में पहनी जानी वाली इस रिंग को धार्मिक नजरिये से देखा जाता था। अनामिका के बारे में कहा जाता है कि यह दिल से जुड़ी होती है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में अनामिका में इंगेजमेंट/वेडिंग रिंग पहनने का चलन है। कालान्तर में यह रिवाज भारत में आ गया। हिंदुओं में इंगेजमेंट के समय रिंग पहनाने का चलन है। शादी की अंगूठी अनामिका में ही पहने जाने के पीछे दिलचस्प मान्यता है कि अंगूठा माता-पिता, तर्जनी भाई-बहन, मध्यमा खुद का एवं अनामिका उंगली जीवनसाथी का प्रतिनिधित्व करती है। वैदिक धर्म में अनामिका सूर्य की उंगली मानी जाती है। इसमें सूर्य की रेखा होती है। अगर किसी की कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो उसे इसमें सोने की अंगूठी पहनना चाहिए। सूर्य का रंग पीला होता है, इसलिए सोने से फायदा होता है। एक्यूप्रेशर विधि को अपनाने वालों के अनुसार वैवाहिक जीवन में मानसिक तनाव के दौरान भी यह रिंग फायदा देती है। इस उंगली में प्रेशर-प्वाइंट होता है, जिससे रिंग पहनने से आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल देश और धर्म की बात छोड़ दे तो इंगेजमेंट/वेडिंग रिंग लोगों की भावनाओं और प्यार से जुड़ी होती है। यह प्यारा अहसास विवाहित लोगों की जिंदगी में ताउम्
