उत्सव के रंग...

भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। "उत्सव के रंग" ब्लॉग का उद्देश्य पर्व-त्यौहार, संस्कृति और उसके लोकरंजक तत्वों को पेश करने के साथ-साथ इनमें निहित जीवन-मूल्यों का अहसास कराना है. आज त्यौहारों की भावना गौड़ हो गई है, दिखावटीपन प्रमुख हो गया है. ऐसे में जरुरत है कि हम अपनी उत्सवी परंपरा की मूल भावनाओं की ओर लौटें. इन पारंपरिक त्यौहारों के अलावा आजकल हर दिन कोई न कोई 'डे' मनाया जाता है. हमारी कोशिश होगी कि ऐसे विशिष्ट दिवसों के बारे में भी इस ब्लॉग पर जानकारी दी जा सके. इस उत्सवी परंपरा में गद्य व पद्य दोनों तरह की रचनाएँ शामिल होंगीं !- कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव (ब्लॉग संयोजक)

शनिवार, 1 मई 2010

श्रम की महत्ता का अहसास : मजदूर दिवस

श्रम व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। मेहनतकश मजदूरों के श्रम को श्रेष्ठ दर्जा देने और प्रोत्साहित करने के लिए 1 मई को पूरे विश्व में मजदूर दिवस के रुप में मनाया जाता है। इसके इतिहास में जाएँ तो उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दौर में श्रमिकों में हक के प्रति जागरूकता पैदा हुई । शिकागो में उन्होंने रैलियों, आमसभाओं आदि के माध्यम से अपने अधिकारों, पारिश्रमिक के लिए आग्रह करना आरंभ किया। धीरे-धीरे इन प्रयासों का असर बढ़ा और 1886 से 1889 तक आसपास के देशों में भी मजदूर और कर्मचारियों में अपने हक के प्रतिफल के लिए जागृति आ गई।

यह शिकागो विरोध काफी प्रसिध्द हुआ और 1890 में जब 1 मई को इसकी पहली वर्षगांठ मनाई गई तभी से मई दिवस मनाने का चलन आरंभ हुआ। मजदूरों ने आठ घंटे से अधिक काम लेने का विरोध करते हुए उचित पारिश्रमिक भुगतान की मांगे रखीं। इसके लिए यूनियन बनीं, धरने, भूख हड़ताल , रैलियां श्रमिकों के हथियार बन गये।अंतत: मई दिवस, श्रमिकों के लिए उत्सव का पर्याय बन गया. एक मई को सभी संस्थाओं में श्रमिकों को अवकाश दिया जाने लगा। आज श्रमिक दिवस हमें श्रम की महत्ता का अहसास कराता है !!
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