उत्सव के रंग...

भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। "उत्सव के रंग" ब्लॉग का उद्देश्य पर्व-त्यौहार, संस्कृति और उसके लोकरंजक तत्वों को पेश करने के साथ-साथ इनमें निहित जीवन-मूल्यों का अहसास कराना है. आज त्यौहारों की भावना गौड़ हो गई है, दिखावटीपन प्रमुख हो गया है. ऐसे में जरुरत है कि हम अपनी उत्सवी परंपरा की मूल भावनाओं की ओर लौटें. इन पारंपरिक त्यौहारों के अलावा आजकल हर दिन कोई न कोई 'डे' मनाया जाता है. हमारी कोशिश होगी कि ऐसे विशिष्ट दिवसों के बारे में भी इस ब्लॉग पर जानकारी दी जा सके. इस उत्सवी परंपरा में गद्य व पद्य दोनों तरह की रचनाएँ शामिल होंगीं !- कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव (ब्लॉग संयोजक)

सोमवार, 20 जून 2011

शरणार्थियों के लिए कुछ करने का दिन : विश्व शरणार्थी दिवस

दुनिया के कई देश आज भी हिंसा की लपटों में जल रहे हैं. आंतरिक कलह और हिंसा का ऐसा मंजर है कि इन देशों के नागरिकों को दूसरे देशों में जाकर पनाह लेनी पड़ती है. बढ़ती आबादी और कम होते संसाधनों की वजह से कई गरीब देशों की जनता को पलायन करना पड़ रहा है. आज विश्व के कई देशों में पलायन का दौर बदस्तूर जारी है लेकिन अपना देश छोड़कर किसी और देश की पनाह लेना आसान काम नहीं है.

कोई भी इंसान अपने घर में किसी दूसरे को पसंद नहीं करता तो भला एक देश किसी दूसरे देश के नागरिकों को अपने देश में कैसे रहने दे? अपनेपन की कमी और विदेश नीतियों की कमी की वजह से रिफ्यूजी(Refugee) लोगों को कई तरह के अत्याचारों का सामना करना पड़ता है. किसी दूसरे के घर में पनाह लेने की रिफ्यूजियों(Refugee) को भारी कीमत चुकानी पड़ती है. कभी कभी तो जानमाल,रेप और हत्या तक हो जाती है और अक्सर रिफ्यूजी(Refugee) लोगों को जासूस समझ जेलों में ठूंस दिया जाता है. म्यांमार, मलेशिया, सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान, युनान, ट्युनिशिया आदि की जनता ने हाल ही में भारी संख्या में अपने देश से पलायन किया है लेकिन जिन जगह इन्होंने पनाह ली वह भी इनके लिए मुसीबत की जगह ही बनें.

भारी मात्रा में पलायन और कम संसाधनों की वजह से कई बार आश्रय देने वाले देश अतिरिक्त बोझ लेने से बचने के लिए रिफ्यूजियों को पनाह देने से कतराते हैं और जब रिफ्यूजी नहीं मानते तो उन पर जो अत्याचार होते हैं वह सभी मानवाधिकारों(Human Rights) की धज्जियां उड़ा देते हैं. हाल ही में कांगो(Democratic Republic of the Congo) नामक देश से हुए पलायन में 500,000 लोगों ने दूसरी जगह जाकर शरण ली लेकिन वहां पर भी आर्मी और कुछ असामाजिक तत्वों ने ऐसा घिनौना खेल खेला कि इंसानियत शर्मसार हो गई. एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां हजारों की तादाद में महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्याओं की बात सामने आई.

उपरोक्त उस घटना और दर्द का अंशमात्र है जो रिफ्यूजियों के साथ होता है. संयुक्त राष्ट्र(United Nations) ने इस विषय की गंभीरता को समझते हुए हर वर्ष 20 जून को विश्व रिफ्यूजी दिवस(World Refugee Day) मनाने का निर्णय किया. 04 दिसम्बर 2000 को यह घोषणा की गई जिसे 20 जून, 2001 से लागू कर दिया गया. इस दिन को मनाने का मुख्य कारण लोगों में जागरुकता फैलानी है कि कोई भी इंसान “अमान्य” नहीं होता फिर चाहे वह किसी भी देश का हो. एकता और समंवय की भावना रखते हुए हमें सभी को मान्यता देनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र की संस्था युएनएचसीआर(United Nations High Commissioner for Refugees) रिफ्यूजी लोगों की सहायता करती है.

अगर विश्व ने जल्द ही इस तरफ अपना ध्यान आकर्षित नहीं किया तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे वैसे अभी भी हालात कोई खास अच्छे नहीं हैं. कागजी स्तर पर तो काफी काम हुआ है अब जरुरत है कुछ जमीनी स्तर पर काम करने की.

साभार : जागरण junction
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