उत्सव के रंग...

भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। "उत्सव के रंग" ब्लॉग का उद्देश्य पर्व-त्यौहार, संस्कृति और उसके लोकरंजक तत्वों को पेश करने के साथ-साथ इनमें निहित जीवन-मूल्यों का अहसास कराना है. आज त्यौहारों की भावना गौड़ हो गई है, दिखावटीपन प्रमुख हो गया है. ऐसे में जरुरत है कि हम अपनी उत्सवी परंपरा की मूल भावनाओं की ओर लौटें. इन पारंपरिक त्यौहारों के अलावा आजकल हर दिन कोई न कोई 'डे' मनाया जाता है. हमारी कोशिश होगी कि ऐसे विशिष्ट दिवसों के बारे में भी इस ब्लॉग पर जानकारी दी जा सके. इस उत्सवी परंपरा में गद्य व पद्य दोनों तरह की रचनाएँ शामिल होंगीं !- कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव (ब्लॉग संयोजक)

रविवार, 20 जनवरी 2013

पृथ्वी पर सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव है कुम्भ मेला


कुम्भ मेला पृथ्वी पर सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव है । यह प्रत्येक १२वें वर्ष पवित्र गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम तट पर आयोजित किया जाता है । मेला प्रत्येक तीन वर्षो के बाद नासिक, इलाहाबाद, उज्जैन, और हरिद्वार में बारी-बारी से मनाया जाता है । इलाहाबाद में संगम के तट पर होने वाला आयोजन सबसे भव्य और पवित्र माना जाता है । इस मेले में लाखो की संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित होते है । ऐसी मान्यता है कि संगम के पवित्र जल में स्नान करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है । संगम कुम्भ और अर्धकुम्भ के दौरान नदी के किनारे विशाल शिविर लगाये जाते हैं ।
कुम्भ महोत्सव पौष मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होता है। कुम्भ महोत्सव प्रत्येक चौथे वर्ष नासिक, इलाहाबाद, उज्जैन, और हरिद्वार में बारी-बारी से मनाया जाता है। प्रयाग कुम्भ विशेष महत्व रखता है। प्रयाग कुम्भ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह १२ वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। हरिद्वार में कुम्भ गंगा के तट पर और नासिक में गोदावरी के तट पर आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर नदियों के किनारे भव्य मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री आते है।
 
प्रयाग कुम्भ अन्य कुम्भों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रकाश की ओर ले जाता है ।यह ऐसा स्थान है जहाँ बुद्धिमत्ता का प्रतीक सूर्य का उदय होता है। इस स्थान को ब्रह्माण्ड का उद्गम और पृथ्वी का केंद्र माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्माण्ड की रचना से पहले ब्रम्हाजी ने यही अश्वमेघ यज्ञ किया था। दश्व्मेघ घाट और ब्रम्हेश्वर मंदिर इस यज्ञ के प्रतीक स्वरुप अभी भी यहाँ मौजूद है। इस यज्ञ के कारण भी कुम्भ का विशेष महत्व है।
 
कुम्भ और प्रयाग एक दूसरे के पर्यायवाची है। कुम्भ का शाब्दिक अर्थ कलश होता है। कुम्भ का पर्याय पवित्र कलश से होता है। इस कलश का हिन्दू सभ्यता में विशेष महत्व है ।कलश के मुख को भगवान विष्णु, गर्दन को रूद्र, आधार को ब्रम्हा, बीच के भाग को समस्त देवियों और अंदर के जल को संपूर्ण सागर का प्रतीक माना जाता है। यह चारों वेदों का संगम है। इस तरह कुम्भ का अर्थ पूर्णतः औचित्य पूर्ण है। वास्तव में कुम्भ हमारी सभ्यता का संगम है। यह आत्म जाग्रति का प्रतीक है। यह मानवता का अनंत प्रवाह है। यह प्रकृति और मानवता का संगम है ।कुम्भ ऊर्जा का स्त्रोत है। कुम्भ मानव-जाति को पाप, पुण्य और प्रकाश, अंधकार का एहसास कराता है। नदी जीवन रूपी जल के अनंत प्रवाह को दर्शाती है। मानव शरीर पञ्चतत्वों से निर्मित है यह तत्व हैं-अग्नि, वायु, जल, प्रथ्वी और आकाश ।संत कबीर ने इस तथ्य को बड़े सुन्दर तरीके से बताया है। हिमालय को देवो का निवास स्थान माना जाता है। गंगा का उद्गम हिमालय से ही हुआ है। गंगा जंगलों, पर्वतों, और समतल मैदानों से होते हुए अंतत: सागर में मिल जाती है। यमुना भी पवित्र मानी जाती है। यमुना को त्रिपथगा, शिवपुरी आदि नामों से भी जाना जाता है। गंगा ने सूर्यवंशी राजा सागर के पुत्रों को श्राप से मुक्त किया था। गंगा के जल को अमृत माना जाता है।
 
पहले कुम्भ को एक अवसर कहा जाता था लेकिन समय बीतने के साथ इसने एक महोत्सव का आकार ले लिया है । यह एक ऐसा धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है, जो पूरी दुनिया पर एक छाप छोड़ देता है, इस तरह का पर्व जो एक धर्म और संस्कृति के बारे में सोचता है. इस तरह का एक पर्व जिसकी संस्कृति विष्णुपदी गंगा है। पहले, इस पर्व का आकार छोटा था, लेकिन अब १२वीं सदी से यह पर्व सबसे बड़े पर्व में विकसित हो गया है। इसका फैलाव परेड ग्राउंड से त्रिवेणी बांध तक, दारागंज से नागवासुकी की सीमा तक, झूंसी (प्रतिष्ठान्पुरी ) से (अलर्कपुरी ) अरैल तक फैला हुआ है ।
 
कुम्भ या अर्धकुम्भ कोई साधारण पर्व नहीं है, यह ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का पर्व है। इस पर्व में धार्मिक माहौल बड़ा ही अनुपम होता है । आप जिस भी शिविर में जायेंगे यज्ञ (धार्मिक बलिदान) के धुएं के बीच में वेद मंत्रों की आवाज सुनाई देती है । व्याख्या, पौराणिक महाकाव्य, प्रार्थना, संतों और साधु के उपदेश पर आधारित नृत्य महमोहक होते हैं । अखाड़ों की पारंपरिक जुलूस, हाथी, घोड़े, संगीत वाद्ययंत्र के बीच नागासंतों के शाही स्नान में तलवार (शाहीस्नान) , घोड़-दौड़ लाखों भक्तों को आकर्षित करती है। इस पर्व में विभिन्न धर्मों के धर्म-मुखिया हिस्सा लेते हैं । यह पर्व प्रयाग के सम्मान और गरिमा का पर्व है । यह लाखों कलाकारों के अत्यंत भक्ति का पर्व है । गरीबों और असहायों के भरण-पोषण की व्यवस्था यहाँ उचित ढंग से लिए जाती है । गंगा इस पर्व में सभी की माँ है और सभी उसके बेटे हैं।
 
" गंगेतवदर्शनातमुक्ति" इस भावना के वशीभूत होकर ही यहाँ इतनी भारी भीड़ एकत्रित होती है और इस पवित्र पर्व का आयोजन प्रयाग की पावन भूमि पर होता है । यह पर्व ईंटों और पत्थरों के घरों में नहीं बल्कि यह संगम की ठंड रेत पर आयोजित किया जाता है ।यह पर्व टैंटों के घरों के साथ मनाया जाता है। यह मानव भक्ति की एक कठिन परीक्षा है ।लोग पवित्र मन और पुण्य की भावना के साथ आते हैं. पाप का स्वतः ही अंत हो जाता है ।यहाँ गायदान, सोने का दान, गुप्तदान / भेंट, पितृ के लिए दान सहित सभी दान का प्रावधान है। यह पर्व पवित्रता का पर्व है ।विभिन्न धर्म सम्प्रदाय के साधु-संत,कलाकार इसमें सम्मिलित होते हैं ।यह स्थान एक छोटे भारत का रूप ले लेता है ।विभिन्न तरह की भाषा, वेश-भूषा, खान-पान इस पर्व पर एक साथ देखें जा सकतें हैं ।इस पर्व पर भारी संख्या में लोग बिना किसी आमंत्रण के पहुंचते हैं । साभार
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