उत्सव के रंग...

भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। "उत्सव के रंग" ब्लॉग का उद्देश्य पर्व-त्यौहार, संस्कृति और उसके लोकरंजक तत्वों को पेश करने के साथ-साथ इनमें निहित जीवन-मूल्यों का अहसास कराना है. आज त्यौहारों की भावना गौड़ हो गई है, दिखावटीपन प्रमुख हो गया है. ऐसे में जरुरत है कि हम अपनी उत्सवी परंपरा की मूल भावनाओं की ओर लौटें. इन पारंपरिक त्यौहारों के अलावा आजकल हर दिन कोई न कोई 'डे' मनाया जाता है. हमारी कोशिश होगी कि ऐसे विशिष्ट दिवसों के बारे में भी इस ब्लॉग पर जानकारी दी जा सके. इस उत्सवी परंपरा में गद्य व पद्य दोनों तरह की रचनाएँ शामिल होंगीं !- कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव (ब्लॉग संयोजक)

रविवार, 5 जुलाई 2009

कृषि एवम् मौसम के साथ त्यौहारों का अटूट सम्बन्ध

सामान्यतः त्यौहारों का सम्बन्ध किसी न किसी मिथक, धार्मिक मान्यताओं, परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा होता है। प्रसिद्ध दार्शनिक लाओत्से के अनुसार-‘‘इसकी फिक्र मत करो कि रीति-रिवाज का क्या अर्थ है? रीति-रिवाज मजा देता है, बस काफी है। जिन्दगी को सरल और नैसर्गिक रहने दो, उस पर बड़ी व्याख्यायें मत थोपो।’’ मानवीय सभ्यता के आरम्भ से ही मनुष्य ऐसे क्षणों की खोज करता रहा है, जहाँ वह सभी दुख, कष्ट व जीवन के तनाव को भूल सके। आदिम युगीन समाज में शिकार करना केवल भय को शांत करने की आवश्यकता मात्र नहीं था वरन् उत्साह एवं प्रसन्नता का प्रतीक भी था। शिकार के बाद समूचा कबीला उसके चारों ओर घूम-घूम कर नाचकर जश्न मनाता था। निश्चिततः वह क्षण उनके लिए किसी पर्व या उत्सव से कमतर नहीं था।
अपने देश भारत में तो कृषि एवम् मौसम के साथ त्यौहारों का अटूट सम्बन्ध देखा जा सकता है। रबी और खरीफ फसलों की कटाई के साथ ही साल के दो सबसे सुखद मौसमों वसंत और शरद में तो मानों उत्सवों की बहार आ जाती है। वसंत में वसंतोत्सव, सरस्वती पूजा, होली, चैत्र नवरात्र व रामनवमी तो शरद में शारदीय नवरात्र के साथ दुर्गा पूजा, दशहरा, दीपावली, करवा चैथ, गोवर्धन पूजा इत्यादि की रंगत रहती है। ये पर्व सिर्फ एक अनुष्ठान ही नहीं हैं, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता और नृत्य-संगीत का अद्भुत दृश्य भी जुड़ा हुआ है। वसंत ऋतु में चैती, होरी, धमार जैसे लोक संगीत तो शारदीय नवरात्र में माँ के जगराता के बीच दुर्गा पूजा पंडालों के मनोरंजक कार्यक्रम और रामलीला के साथ-साथ गरबा और डांडिया की धूम रहती है। चूँकि इस दौरान खेतों में कटाई हो चुकी होती है अतः दूर-दराज के अंचलों से लोग सपरिवार सज-धजकर बाजारों एवं मेलो में आते हैं और लजीज व्यजंनों का लुत उठाते हुए खूब खरीददारी करते हैं । इसी समय मेलों के बहाने दूर-दराज के मित्रों और रिश्तेदारों से भी मुलाकातें हो जाती हंै। घर की चहरदीवारियों में कैद महिलाएं भी इस अवसर पर बाहर निकलकर त्यौहारों व उत्सवों का पूरा लुत उठाती हैं। त्यौहारों को केवल फसल एवं ऋतुओं से ही नहीं वरन् दैवी घटनाओं से जोड़कर धार्मिक व पवित्र भी बनाया गया है।। यही कारण है कि भारतीय पर्व और त्यौहारों में धार्मिक देवी-देवताओं, सामाजिक घटनाओं व विश्वासों का अद्भुत संयोग प्रदर्शित होता है।
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