उत्सव के रंग...

भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। "उत्सव के रंग" ब्लॉग का उद्देश्य पर्व-त्यौहार, संस्कृति और उसके लोकरंजक तत्वों को पेश करने के साथ-साथ इनमें निहित जीवन-मूल्यों का अहसास कराना है. आज त्यौहारों की भावना गौड़ हो गई है, दिखावटीपन प्रमुख हो गया है. ऐसे में जरुरत है कि हम अपनी उत्सवी परंपरा की मूल भावनाओं की ओर लौटें. इन पारंपरिक त्यौहारों के अलावा आजकल हर दिन कोई न कोई 'डे' मनाया जाता है. हमारी कोशिश होगी कि ऐसे विशिष्ट दिवसों के बारे में भी इस ब्लॉग पर जानकारी दी जा सके. इस उत्सवी परंपरा में गद्य व पद्य दोनों तरह की रचनाएँ शामिल होंगीं !- कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव (ब्लॉग संयोजक)

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

त्यौहारों की कड़ी में अब विशिष्ट दिवस भी

आजकल भूमंडलीकरण का दौर है. जो त्यौहार कल तक देश की सीमाओं से आबद्ध थे, आज उनका भी भूमंडलीकरण हो गया है. पारंपरिक त्यौहारों से परे तमाम दिन किसी विशिष्ट विषय को लेकर सेलिब्रेट किये जा रहे हैं. इनमें आपसी रिश्तों से लेकर हमारे परिवेश तक के विषय शामिल हैं. मसलन-नारी दिवस, पर्यावरण दिवस, मदर्स डे, फादर्स डे, गौरैया दिवस इत्यादि. इनका उद्देश्य हमारी नित्य व्यस्त होती दिनचर्या में ठहरकर किसी चीज पर विचार करना है. अब 'उत्सव के रंग' में हम ऐसे भी विशिष्ट दिवसों के बारे में चर्चा करेंगे. इन दिवसों के पीछे छुपे जीवन-मूल्यों को समझने की कोशिश करेंगें. आवश्यकतानुसार इन विषयों से सम्बंधित रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगें !!
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